-नए अकाउंटेंट ने खोला भ्रष्टाचार का ‘पैंडोरा बॉक्स’, सीनियर अधिकारियों ने दबाने की कोशिश की, लेकिन ‘Expose Now’ ने खोल दी पोल
-ठेकेदारों से कैश और फोन-पे पर वसूली, बदले में थमाए एडिटेड और फर्जी GRN चालान, विभागीय इंजीनियर्स की मिलीभगत आई सामने
-“नया लड़का है, उसे समझ नहीं है…” – सच सामने आने पर संदिग्धों की बेशर्म दलील, अब जयपुर मुख्यालय तक पहुंची जांच की आंच
कोटा / जयपुर। सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) के क्वालिटी कंट्रोल विंग में एक ऐसा सनसनीखेज और बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने विभाग के आला अफसरों की नींद उड़ा दी है। हाड़ौती संभाग (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़) में सरकारी निर्माण कार्यों के मटेरियल की टेस्टिंग करने वाली कोटा स्थित संभागीय लैब में पिछले कई सालों से बड़े फर्जीवाड़े का खेल चल रहा था। लैब कर्मचारियों व इंजीनियर्स ने ठेकेदारों से मटेरियल टेस्टिंग का पैसा तो पूरा वसूला, लेकिन उसे सरकारी खाते में जमा कराने के बजाय आपस में ही खुर्द-बुर्द कर दिया। शुरुआती जांच में ही 15 लाख से ज्यादा का राजस्व गबन सामने आया है, लेकिन कोटा संभाग के इंजीनियर्स इस मामले को दबाने में जुटे हैं।
ऐसे खुला संभागीय लैब में भ्रष्टाचार का ‘सरकारी खेल’:-
नियमों के मुताबिक, ठेकेदारों को ई-ग्रास (e-GRAS) पोर्टल पर ऑनलाइन शुल्क जमा करवाकर गवर्नमेंट रिसीप्ट नंबर (GRN) चालान जनरेट करना होता है। इसके बाद ही लैब में मटेरियल की टेस्टिंग की जाती है।
कुछ दिन पहले विभाग में आए एक नए जूनियर अकाउंटेंट ने जब रिकॉर्ड खंगाला, तो उसके होश उड़ गए। सितंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच जमा हुए 59 चालानों का ई-ग्रास पोर्टल पर कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। जब इस मामले की रिपोर्ट उच्च स्तर पर भेजी गई और जयपुर मुख्यालय स्तर पर जांच कराई गई, तो यह साफ हो गया कि 15 लाख रुपये सरकारी खजाने में पहुंचे ही नहीं।
कैश और फोन-पे पर वसूली, कंप्यूटर से ‘एडिटेड’ फर्जी चालान का धंधा:-
इस पूरे खेल में विभाग के ही कुछ अंदरूनी अधिकारियों, कैशियर, असिस्टेंट टेस्टिंग ऑफिसर और ठेके पर कार्यरत एक कंप्यूटर ऑपरेटर की गहरी मिलीभगत सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, ये लोग ठेकेदारों से कैश या फोन-पे (PhonePe) के जरिए पूरी रकम खुद ले लेते थे और अपनी आईडी से कंप्यूटर पर ‘एडिटेड’ (फर्जी) चालान प्रिंट करके उन्हें थमा देते थे। इतना ही नहीं, इस ‘विशेष वीआईपी सुविधा’ के बदले ठेकेदारों से प्रति चालान 200 रुपये अतिरिक्त कमीशन भी वसूला जाता था। ठेकेदारों को उनकी जांच रिपोर्ट मिल जाती थी और लैब में टेस्टिंग भी हो जाती थी, लेकिन सरकार के खाते में एक धेला भी नहीं जा रहा था।
चोरी ऊपर से सीनाजोरी: “अकाउंटेंट नया लड़का है…”
चौंकाने वाली बात यह है कि सालाना मूल्यांकन करने वाले अधीक्षण अभियंता (SE) और अतिरिक्त मुख्य अभियंता (ACE) जैसे बड़े अधिकारी भी 2 साल तक इस गंभीर चूक या कहें कि खुली डकैती को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम रहे। जब ‘Expose Now’ ने इस मामले में पड़ताल की, तो संदिग्धों की बेशर्मी भी सामने आई। वर्तमान असिस्टेंट टेस्टिंग ऑफिसर विनय सक्सेना का कहना है, “यह मामला तत्कालीन टेस्टिंग ऑफिसर कुशल जैन और आकाश चौधरी के समय का है। यहां जो नया अकाउंटेंट लगा है, वह प्रोबेशन पीरियड पर है और कम समझता है।” यानी खुद को बचाने के लिए ईमानदारी से घोटाला पकड़ने वाले नए अकाउंटेंट की समझ पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।
तकनीकी खामी बताकर घोटाले को रफा-दफा करने की थी कोशिश:-
मामला उजागर होने के बाद PWD के आला अफसरों में हड़कंप मचा हुआ है। शुरुआत में इस महाघोटाले को ‘तकनीकी खामी’ (Technical Error) बताकर दबाने और रफा-दफा करने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन सच की आवाज को दबाया नहीं जा सका। अब सवाल उठता है कि आखिर 2 साल तक बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे यह धंधा कैसे फलता-फूलता रहा? क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े मगरमच्छों को बचाने का खेल खेला जा रहा है?
विभागीय बयान:-
“वेरिफिकेशन के लिए पूरा रिकॉर्ड जयपुर मुख्यालय भेजा हुआ है। वहां उच्च स्तरीय जांच चल रही है। जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई होगी और संबंधित ठेकेदारों से भी रिकवरी की जाएगी।”
– आर.के. मीना, XEN, पीडब्ल्यूडी, कोटा
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now