-1.31 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का सपना चकनाचूर; 2022 में पूरा होने वाला प्रोजेक्ट 2026 तक खींचा, प्यासे खेतों के बीच हजारों किसान बेहाल
-काम में फिसड्डी साबित हुई हैदराबाद की ‘GVPR’, फिर भी विभाग ने बिना कोई जुर्माना लगाए दिया 1,143 दिनों का ‘फ्री अभयदान’
-अफसरों की जुगलबंदी: पैनल्टी की काटी गई रकम लौटाई, ठेकेदार की गंभीर लापरवाहियों पर पर्दा डालने के लिए ‘तकनीकी’ बहाने
जयपुर। हाड़ौती अंचल (कोटा, बारां और झालावाड़) के लाखों अन्नदाताओं की तकदीर बदलने के नाम पर शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘परवन वृहद बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना’ आज भ्रष्टाचार, विभागीय लापरवाही और ठेका कंपनी की मनमानी का जीता-जागता स्मारक बन चुकी है। ‘Expose Now’ की विशेष जांच-पड़ताल (Research-Based Investigation) में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 2,170.08 करोड़ रुपये के इस विशालकाय प्रोजेक्ट में ठेका कंपनी मैसर्स GVPR इंजीनियर्स लिमिटेड (हैदराबाद) को फायदा पहुंचाने के लिए जल संसाधन विभाग के आला अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रख दिया है। जिस कंपनी को कार्य में देरी के लिए करोड़ों रुपये की पैनल्टी(LD) लगाई जानी थी, उसे विभागीय संरक्षण देकर न केवल 3 साल से अधिक (1,143 दिन) का अंतरिम समय विस्तार (Time Extension) थमा दिया गया, बल्कि रोकी गई पैनल्टी की राशि भी मेहरबानी दिखाते हुए वापस कर दी गई।
परियोजना का कच्चा-चिट्ठा, आंकड़ों के आईने में बड़ा खेल:
- कुल स्वीकृत अनुबंध राशि: 2,170.08 करोड़ रुपये
- मुख्य लक्ष्य: बारां, झालावाड़ व कोटा के 1,31,750 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रेशराइज्ड पाइप प्रणाली से सिंचाई सुविधा देना।
- कार्य शुरू होने की तिथि: 28 मई 2018
- अनुबंध के अनुसार काम पूरा करने की मूल तिथि: 27 मई 2022
- विभाग द्वारा दी गई नई समय-सीमा: 13 जुलाई 2025 (बिना किसी पैनल्टी/हर्जाने के)
- विस्तारित समय (Hindrance Days): कुल 1,143 दिन (प्रथम विस्तार में 583 दिन + द्वितीय विस्तार में 560 दिन)।
-कंपनी के माइनस प्वॉइंट्स: साइट खाली होने पर भी नहीं लगाए संसाधन, काम में लगातार ढिलाई
Expose Now द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों और प्रोजेक्ट के हिन्डरेंस (प्रतिबाधा) रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि कंपनी की मंशा कभी काम को समय पर पूरा करने की थी ही नहीं। जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड में दर्जनों बार दर्ज किया गया कि विभाग द्वारा जमीन और साइट उपलब्ध कराने के बावजूद ठेकेदार कंपनी ने पर्याप्त मशीनरी और मैनपॉवर (Less Resources Deployed) तैनात नहीं की। प्रोजेक्ट में 200 हेक्टेयर चक और राइजिंग मेन पाइपलाइन (DI बनाम HDPE पाइप) को लेकर कंपनी महीनों तक तकनीकी पेंच फंसाती रही और तय समय पर संशोधित डिजाइन सबमिट नहीं किया।
माइलस्टोन लक्ष्यों में भारी विफलता:
माइलस्टोन-1: 261.25 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले कंपनी सिर्फ 28.38 करोड़ (मात्र 10.86%) का काम कर पाई। इसमें 217 दिनों की सीधी देरी कंपनी के खाते में दर्ज हुई।
माइलस्टोन-2: 783.75 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले केवल 325.91 करोड़ (41.58%) का काम हुआ।
माइलस्टोन-3: 1,307.10 करोड़ के लक्ष्य के सामने महज 688.44 करोड़ (52.67%) ही खर्च हो सके।
WRD के माइनस प्वॉइंट्स: लेटलतीफी, आपसी समन्वय की कमी और बहानेबाजी:-
विभाग का काम केवल टेंडर जारी करना नहीं, बल्कि समय पर साइट उपलब्ध कराना था, जिसमें अफसर पूरी तरह नाकाम रहे:
-अवाप्ति में घोर विफलता: राइट मेन कैनाल (RMC) के कई हिस्सों में जमीन का राजस्व रिकॉर्ड समय पर अपडेट नहीं हुआ, जिससे सालों तक जमीन अधिग्रहित नहीं हो सकी।
-मुआवजा वितरण में सुस्ती: भू-अवाप्ति अधिकारी (LAO) बारां द्वारा किसानों को डिग्गी और नहर भूमि के चेक समय पर वितरित नहीं किए गए, जिससे कई डिग्गियों का निर्माण वर्षों तक अटका रहा।
-बिजली लाइन और वन भूमि की अड़चनें: 595 बिजली के खंभे और 41 ट्रांसफार्मर शिफ्ट करने के लिए 9.92 करोड़ की डिमांड पर समय पर बजट जारी नहीं किया गया। वहीं, लेफ्ट मेन कैनाल (LMC) में वन भूमि की पूर्व मंजूरी न होने के कारण बाद में छह सदस्यीय कमेटी बनाकर अलाइनमेंट ही बदलना पड़ा।
मिलीभगत का सबसे बड़ा खेल, करोड़ों की पैनल्टी से कंपनी को बचाया:-
नियमों के मुताबिक यदि ठेकेदार की लापरवाही से काम रुकता है, तो भारी लिक्विडेटेड डैमेज (LD) और पैनल्टी वसूली जाती है। लेकिन जल संसाधन विभाग के अफसरों ने खेल रचते हुए कंपनी को “Without Compensation” (बिना किसी हर्जाने के) 13 जुलाई 2025 तक का समय विस्तार दे दिया। यही नहीं, अनुबंध के तहत काटी गई लगभग 9.84 करोड़ की लिक्विडेटेड डैमेज राशि भी रिलीज/वापस कर दी गई और यह दलील दी गई कि “पैनल्टी का अंतिम फैसला कार्य पूरा होने पर मेरिट के आधार पर किया जाएगा”—यानी जब तक प्रोजेक्ट खिंचता रहेगा, तब तक कंपनी पर कोई वित्तीय भार नहीं आने दिया जाएगा। 65.10 करोड़ की सुरक्षा राशि (Security Deposit) के मामले में भी कंपनी को पूरी राहत दी गई।
हजारों किसानों की उम्मीदों को बना दिया मजाक:-
परवन परियोजना का मूल उद्देश्य झालावाड़, बारां और कोटा के सूखाग्रस्त इलाकों के 1.31 लाख हेक्टेयर खेतों तक फव्वारा/प्रेशराइज्ड पद्धति से पानी पहुंचाना था। 2022 में जिस पानी से किसानों के खेत लहलहाने चाहिए थे, वह 2026 तक भी कागजों और फाइलों की टेबल पर ही घूम रहा है। रबी और खरीफ की फसलों में आज भी किसान पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि प्रोजेक्ट की लागत और समयावधि लगातार बढ़ाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है। जब कंपनी लगातार माइलस्टोन फेल कर रही थी और साइट पर संसाधनों की कमीं थी, तो उस पर सख्त पैनल्टी लगाने के बजाय अफसरों ने समय-सीमा बढ़ाने की फाइलें क्यों दौड़ाईं?
जनता के पैसे की खुली लूट और जवाबदेही से भागते जिम्मेदार:-
हाड़ौती के किसानों के हक पर डाका डालकर ठेका कंपनी की तिजोरी भरने का यह खेल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। 2,170 करोड़ की इस महापरियोजना में जिस तरह से नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनी को बार-बार ‘अभयदान’ दिया गया, वह साफ करता है कि यह महज प्रशासनिक लेटलतीफी नहीं, बल्कि गहरी मिलीभगत का नतीजा है। जब तक इस पूरे नेक्सस की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच और फोरेंसिक ऑडिट नहीं होती, तब तक न तो किसानों को उनका हक मिलेगा और न ही सरकारी खजाने की बर्बादी रुकेगी। अब सवाल उठता है कि क्या सरकार इस पूरे खेल की निष्पक्ष विजिलेंस व तकनीकी ऑडिट जांच कराकर दोषी अधिकारियों और कंपनी मैसर्स GVPR के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करेगी या फिर परवन वृहद सिंचाई परियोजना ऐसे की भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगी।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now