-बिना जमीन मालिकाना हक के ही बांट दिया टेंडर, 3 साल बाद खुली पोल तो कबाड़ होने लगा करोड़ों का पेयजल इंफ्रास्ट्रक्चर
जयपुर। जल जीवन मिशन (JJM) के तहत ग्रामीण इलाकों में पानी पहुंचाने के सरकारी दावों की भरतपुर में हवा निकल गई है। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के आला अधिकारियों की एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर लापरवाही सामने आई है। विभाग ने बिना जमीन का मालिकाना हक सुनिश्चित किए और बिना ग्रामीणों के विवादों को सुलझाए ही करोड़ों रुपये के कार्यों के वर्क ऑर्डर जारी कर दिए। नतीजा यह हुआ कि 9 गांवों की योजनाएं बीच में ही ठप हो गईं, और अब वहां पहले से खर्च हो चुके 249.69 लाख (करीब ढाई करोड़ रुपये) के बेकार (Futile) होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
इस गंभीर मामले का खुलासा PHED वित्त समिति (FC) की बैठक में हुआ, जिसके बाद महकमे में हड़कंप मच गया है। समिति ने इस लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए प्रस्ताव को टाल (Defer) दिया है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी करने के आदेश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
साल 2021-22 में PHED सिटी डिवीजन भरतपुर के तहत 34 गांवों में ‘फंक्शनल हाउसहोल्ड टैप कनेक्शन’ (FHTC) देने के लिए मैसर्स डारा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. को 2922.16 लाख का ठेका दिया गया था। ठेकेदार कंपनी ने 25 गांवों में तो काम पूरा कर लिया, लेकिन 9 गांवों (योजनाओं) में आकर सरकारी तंत्र की लापरवाही की वजह से पहिया जाम हो गया।
कागजों में दौड़ती रही योजना, जमीन पर मिले अतिक्रमण और विवाद:-
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, जिन 9 गांवों में काम अधूरा पड़ा है, वहां अनुमानित लागत 770.88 लाख थी, जिसमें से 249.69 लाख पहले ही फूंक दिए गए। काम रुकने की वजहें अधिकारियों की अदूरदर्शिता को साफ बयां करती हैं:
-पीरनगर, गामरी और नगला बिलोठी: इन 3 गांवों में आवंटित जमीन पर भू-माफियाओं और स्थानीय लोगों का अतिक्रमण है, जिसे विभाग 3 साल में भी नहीं हटा पाया।
-सूती, सहनावली, बराखुर और नगला लोधा: इन 4 गांवों में विभाग के पास जमीन ही उपलब्ध नहीं है। तहसीलदार ने बकायदा जमीन न होने का सर्टिफिकेट भी थमा दिया है।
-घुसियारी और खैमरा: इन 2 गांवों में ग्रामीणों के भारी विवाद और विरोध के चलते काम शुरू ही नहीं हो सका। अब इन गांवों को चंबल-अलवर-भरतपुर मेजर प्रोजेक्ट में जोड़ने की लीपापोती की जा रही है।
ठेकेदार कंपनी ने साफ कह दिया है कि जब 3 साल में सरकार जमीन ही उपलब्ध नहीं करा पाई, तो वे अब इस काम को करने में असमर्थ हैं।
FC की सख्त टिप्पणी “जनता के पैसे की बर्बादी बर्दाश्त नहीं”:-
इस मामले को रफा-दफा करने के लिए मुख्य अभियंता (CE) ने इन 9 योजनाओं के बचे हुए काम को वापस लेने (Withdrawal) का प्रस्ताव रखा था। लेकिन वित्त समिति ने अधिकारियों की इस ‘एस्केप स्ट्रेटजी’ (बचने के रास्ते) को भांप लिया। जब जमीन का आवंटन ही तय नहीं था, तो अधिकारियों ने अन्य संबंधित निर्माण कार्य क्यों शुरू करवाए? जो इंफ्रास्ट्रक्चर 249 लाख खर्च करके खड़ा किया गया है, वह जमीन न मिलने से पूरी तरह कबाड़ और बेकार हो जाएगा। इसके लिए जिम्मेदार अफसरों को बख्शा नहीं जाएगा। बिना जमीन सुनिश्चित किए काम शुरू कराने वाले और सरकारी खजाने को जोखिम में डालने वाले संबंधित अधिकारियों को शो-कॉज नोटिस थमाया जा रहा है।
प्रस्ताव खारिज, जिला प्रशासन के पाले में गेंद: वित्त समिति ने प्रस्ताव को फिलहाल रोकते हुए निर्देश दिए हैं कि इस मामले को ‘जिला जल एवं स्वच्छता मिशन’ (DWSM) की बैठक में रखा जाए। अब जिला प्रशासन के स्तर पर युद्ध स्तर पर जमीन तलाशने के प्रयास किए जाएंगे ताकि खर्च हो चुका ढाई करोड़ रुपया बर्बाद होने से बच सके।
बड़ा सवाल: सवाल यह उठता है कि जब जल जीवन मिशन केंद्र और राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है, तब भरतपुर PHED के इंजीनियरों ने बिना जमीन की क्लीयरेंस के वर्क ऑर्डर कैसे जारी कर दिए? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या इसके पीछे बजट ठिकाने लगाने का कोई बड़ा खेल था? इसकी उच्च स्तरीय जांच होना तय माना जा रहा है।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now