Expose Now: 960 करोड़ का ‘महा-घोटाला’: ‘इरकॉन’ सर्टिफिकेट्स के बाद अब बैंक सर्टिफिकेट्स भी निकले फर्जी

-मैसर्स श्याम ट्यूबवैल व मैसर्स गणपति ट्यूबवैल कंपनी का JJM में 960 करोड़ का फर्जीवाड़े का साम्राज्य, पीएचईडी कार्यालयों से लेकर फील्ड तक सबकुछ ही फर्जी

-फर्जी अनुभव, जाली बैंक गारंटी और रसूखदारों का संरक्षण—जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार की इनसाइड स्टोरी

जयपुर। राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में हर दिन नए और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। ‘Expose Now’ के पास मौजूद दस्तावेज़ों से यह साफ हो गया है कि भ्रष्टाचार का यह खेल केवल कागजी अनुभव तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें बैंकिंग सिस्टम के नाम पर भारी जालसाजी की गई। मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी ने 960 करोड़ से ज्यादा के काम हासिल करने के लिए विभाग को जो बैंक सर्टिफिकेट दिए, वे पूरी तरह फर्जी (Fake) निकले हैं।

HDFC बैंक की रिपोर्ट: “हमने यह लेटर जारी ही नहीं किए”:-

कोर्ट के निर्देश के बाद जब जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के मुख्य अभियंता ने HDFC बैंक से इन प्रमाणपत्रों का सत्यापन मांगा, तो बैंक के जवाब ने विभाग के पैरों तले जमीन खिसका दी। बैंक ने अपने स्पष्टीकरण पत्र में साफ कर दिया कि टेंडर के दौरान पेश किए गए क्रेडिट सुविधा, सॉल्वेंसी और बैलेंस कन्फर्मेशन प्रमाणपत्र न तो बैंक के रिकॉर्ड में हैं और न ही बैंक द्वारा कभी जारी किए गए।

आंकड़ों का ‘खतरनाक’ खेल (दावा बनाम हकीकत):-

बैंक ने विभाग को जो तुलनात्मक चार्ट भेजा है, वह फर्म की धोखाधड़ी को पूरी तरह बेनकाब करता है:

दस्तावेज़ का विवरण कंपनी द्वारा दावा (फर्जी) बैंक रिकॉर्ड के अनुसार (वास्तविक)

क्रेडिट लिमिट 26.53 करोड़ मात्र ₹50 लाख (CC)
सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट 7.79 करोड़ रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं
बैंक प्रमाणपत्र 10.00 करोड़ मात्र ₹50 लाख
बैलेंस कन्फर्मेशन 24.50 करोड़ (लिमिट) लिमिट उपलब्ध ही नहीं

बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि इन फर्जी दस्तावेजों पर जो हस्ताक्षर और शाखा के विवरण दिए गए थे, उनका बैंक के अधिकृत रिकॉर्ड से कोई लेना-देना नहीं है।

जाली दस्तावेजों की बुनियाद पर खड़ा साम्राज्य:-

जांच में खुलासा हुआ है कि इन दोनों फर्मों ने साल 2020-2021 से ही फर्जीवाड़े की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू कर दी थी। टेंडर हासिल करने के लिए आवश्यक ‘तकनीकी योग्यता’ (Technical Criteria) पूरी करने के लिए इरकॉन (IRCON) कंपनी के नाम के फर्जी कार्य अनुभव प्रमाण पत्र तैयार किए गए। इतना ही नहीं, वित्तीय योग्यता साबित करने के लिए एचडीएफसी (HDFC) बैंक के जाली क्रेडिट लिमिट, सॉल्वेंसी और बैलेंस कन्फर्मेशन सर्टिफिकेट भी पेश किए गए।

फील्ड में लूट का ‘खूनी’ खेल: बिना पाइप डाले उठा लिए करोड़ों:-
टेंडर मिलने के बाद भ्रष्टाचार का दूसरा चरण फील्ड में शुरू हुआ। ‘एक्स्पोज़ नाउ’ की पड़ताल के अनुसार:

-पाइप घोटाला: जहाँ DI पाइप डाले जाने थे, वहां सस्ते HDPE पाइप डालकर DI पाइपों के फर्जी बिलों का भुगतान उठाया गया।

-पुराना काम, नया बिल: जेजेएम योजना से सालों पहले डाली गई पाइपलाइनों को एमबी (Measurement Book) में नया दिखाकर करोड़ों रुपये डकार लिए गए।

-चोरी का सामान: हरियाणा के महेंद्रगढ़ से चोरी किए गए पाइपों को राजस्थान के प्रोजेक्ट्स में खपाने और उनका फर्जी भुगतान उठाने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं।

रसूखदारों का ‘अभयदान’:-

इतना बड़ा फर्जीवाड़ा बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं था। आरोप है कि इस पूरे खेल को तत्कालीन एसीएस सुबोध अग्रवाल, पूर्व पीएचईडी मंत्री महेश जोशी, सचिवालय के तत्कालीन डीएस गोपाल सिंह और विभाग के आला इंजीनियरों का मूक समर्थन और संरक्षण प्राप्त था।

सिस्टम पर बड़े सवाल:-

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बैंक ने इन दस्तावेजों को ‘अवैध’ घोषित कर दिया है, तो विभाग के वे कौन से अधिकारी थे जिन्होंने बिना ‘ड्यू डिलिजेंस’ और वेरिफिकेशन के करोड़ों के टेंडर इन फर्मों की झोली में डाल दिए?

जांच एजेंसियों की विफलता और कोर्ट की फटकार:-

वर्तमान में इस मामले की जांच ED (प्रवर्तन निदेशालय), CBI और ACB जैसी तीन बड़ी एजेंसियां कर रही हैं। हालांकि, इन जांचों में रही ‘भारी कमियों’ के कारण मुख्य आरोपियों को जमानत मिलने का रास्ता साफ हो गया है। हाल ही में ईडी कोर्ट ने जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए फटकार लगाई है और रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

Expose Now की इस रिपोर्ट से यह साफ़ है कि इस घोटाले की जड़ें बहुत गहरी हैं। बैंक द्वारा साक्ष्य के तौर पर खातों के वास्तविक स्टेटमेंट भी विभाग को सौंप दिए गए हैं, जो अब ईडी (ED) और एसीबी (ACB) की जांच में सबसे बड़ा हथियार बनेंगे।

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