कहा जाता है कि दुनिया की सबसे कठिन और बड़ी परीक्षा है ‘गाओकाओ’ (Gaokao) जिसे कराना खुद सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है। ये परीक्षा होती है चीन में। एक तरफ भारत में पेपरलीक के आंकड़े गिनाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ चीन में ये परीक्षा ‘गाओकाओ’ (Gaokao) 2026 चल रही है। आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि इस साल 1 करोड़ 34 लाख छात्र Gaokao 2026 में बैठ रहे हैं। सबसे खास बात ये कि कभी भी ये परीक्षा लीक के जंजाल में नहीं उलझी। कारण, वहां की सरकार इसे किसी जंग से कम नहीं मानती। छात्रों की विशालतम संख्या के बावजूद चीन में परिंदा भी पर नहीं मार पाता। सवाल ये है कि ऐसा कैसे संभव हो पाता है। इसके लिए चीन रचता है एक अभेद्य चक्रव्यूह जिसे भेद पाना अब तक माफिया टाइप लोगों के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन रहा है।
भारत में ऐसा दौर चल रहा है कि परीक्षा चाहे कोई सी भी हो, छात्रों और अभिभावकों का दिल इस विचार से सहमा रहता है कि ‘कहीं पेपर लीक न हो जाए’। NEET, सिपाही भर्ती और तमाम राज्यों की परीक्षाओं में लीक माफिया या सॉल्वर गैंग के पात-पात के सामने सिस्टम डाल-डाल भी नजर नहीं आया। ऐसे में 1 करोड़ से ज्यादा बच्चों का एग्जाम बिना पेपरलीक के कराना, वो भी सुचारू रूप से, हमारे देश में तो अविश्वसनीय सा ही लगेगा।
चीन ने परीक्षा करवाने के लिए जो मॉडल तैयार किया है, वो दरअसल, इतना पुख्ता है कि एक कमजोर कड़ी तक नहीं छूटी जो परीक्षा की शुचिता को चोट पहुंचा सके।

‘स्टेट सीक्रेट’ कानून: जो बनाता है एग्जाम को पेपरलीक-प्रूफ!
चीन में Gaokao के प्रश्नपत्रों को तैयार करना और छापना किसी रूटीन के सरकारी या प्रशासनिक काम की तरह नहीं लिया जाता। इसे चीन के ‘National Secret Law’ (राष्ट्रीय गोपनीयता कानून) के तहत टॉप-सीक्रेट मिशन सा माना जाता है।
सेना और हाई-सिक्योरिटी जेलों में छपते हैं पर्चे
पेपर सेट करने वाले प्रोफेसर्स और एक्सपर्ट्स को परीक्षा से कई हफ्ते पहले बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया जाता है। उनके फोन, इंटरनेट और यहां तक कि परिवार से मिलने पर भी रोक होती है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में Gaokao से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, प्रश्नपत्रों को किसी आम प्रिंटिंग प्रेस में नहीं बल्कि सेना के डिपो या हाई-सिक्योरिटी जेलों जैसी अति-सुरक्षित जगहों पर छापा जाता है। उपर से सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी रहती है कि प्रिंटिंग स्टाफ भी परीक्षा खत्म होने तक बाहर नहीं आ सकता।
पेपर डिस्ट्रिब्यूशन के लिए वॉर लाइक सिस्टम
प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्रों तक पेपर पहुंचाना भी टेढ़ी खीर होता है लेकिन चीन ने इसे वॉर सीनेरियो सा लेता है। प्रश्नपत्रों के बक्से सामान्य कूरियर या गाड़ियों में नहीं जाते, इन्हें Armed Police के पहरे में बख्तरबंद गाड़ियों से रवाना किया जाता है। हर गाड़ी में जीपीएस (GPS) ट्रैकर और लाइव CCTV कैमरे होते हैं जो बीजिंग के मुख्य कंट्रोल रूम से कनेक्टेड होते हैं। बक्सों को खोलने के लिए मल्टी-लेयर डिजिटल कोड और कई चाभियां लगती है। कहा तो ये भी जाता है किये Code and Key सिर्फ तय समय पर ही काम करती है।
हाइटेक नकल की काट भी रहती है ऑलटाइम रेडी
कई मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि इस साल चीन ने अपने परीक्षा केंद्रों पर टेक्नोलॉजी का ऐसा चौकीदार बैठाया है जिसके सामने हाई-टेक नकल की कोशिशें भी दम तोड़ दें। चीन के कई प्रांतों में ‘साइलेंट एंट्री’ सिस्टम लागू है। छात्रों को मेटल डिटेक्टर के टेस्ट से गुजरना होता है जो बारीक से बारीक सुई भी पकड़ ले। चश्मा पहनने वाले छात्रों के चश्मों की वीडियो स्कैनिंग होती है ताकि ‘स्मार्ट गॉगल्स’ के जरिए नकल रोकी जा सके।
यही नहीं परीक्षा केंद्रों के ऊपर अवैध रेडियो फ्रीक्वेंसी और ब्लूटूथ सिग्नल को ब्लॉक करने के लिए सैन्य-ग्रेड ड्रोन हवा में गश्त करते हैं। क्लासरूम में हाई-पावर सिग्नल जैमर्स और फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाले) कैमरे लगे होते हैं जिसके सामने फर्जी छात्र या सॉल्वर मंशा ढेर हो जाती है।
धांधली की तो करियर खत्म… सीधे क्रिमिनल केस, सजा ऐसी कि रूह कांप जाए
चीन में पेपर लीक न होने की सबसे बड़ी वजह वहां का कड़ा कानून भी है जिसे सुनने में आपको लगेगा कि बड़ा बेरहम कानून है। 2015 में चीन ने अपने क्रिमिनल लॉ में संशोधन कर Gaokao में नकल करने, कराने या पेपर लीक करने को नेशनल क्राइम की श्रेणी में डाल दिया था। अगर कोई छात्र या गिरोह पेपर लीक या नकल में शामिल पाया जाता है तो उसे 3-7 साल तक की जेल की सख्त सजा और भारी जुर्माना होता है। साथ ही, उस छात्र को हमेशा के लिए किसी भी सरकारी परीक्षा और यूनिवर्सिटी एडमिशन से ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है, पूरा करियर एक झटके में खत्म।
अब सवाल खुद से और सरकार से पूछिए कि क्या सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने से परीक्षाएं पारदर्शी हो जाती है। जब तक पेपर की छपाई से लेकर उसकी डिलीवरी तक को देश की सुरक्षा से नहीं जोड़ा जाएगा, जब तक लीक करने वालों को ऐसी सजा नहीं मिलेगी जो आने वाली पीढ़ियों के लिए नजीर बने… तब तक पेपर लीक रुकना मुश्किल है। सवा करोड़ से ज्यादा बच्चों का एग्जाम बिना एक भी शिकायत के करा लेना साबित करता है कि अगर नीयत साफ हो और कानून सख्त, तो सिस्टम में सेंध लगाना नामुमकिन है। शायद, इससे ही सीख लेकर अब भारत में मौजूदा समय में परीक्षा में सेना की मदद ली गई है पर रास्ता अभी और लंबा है…