-3500 करोड़ के भुगतान ने रोक दिया विकास का पहिया?
जयपुर। राजस्थान की प्यास बुझाने वाले हाथ आज मंजीरे थामने को मजबूर हैं। जिस जल भवन से प्रदेश की जल योजनाओं की रूपरेखा तय होनी चाहिए थी, आज वहां की फिजाओं में सरकारी आदेशों के बजाय ‘हनुमान चालीसा’ की गूंज है। Expose Now की इस विशेष रिपोर्ट में देखिए कैसे संवेदनहीन सिस्टम ने उन ठेकेदारों को सड़क पर ला खड़ा किया है, जिन्हें सरकार ने ‘नल से जल’ पहुंचाने का जिम्मा सौंपा था।

सिस्टम का ‘सूखा’, 33 महीने की लंबी वेटिंग
यह महज़ एक धरना नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है जिसने विकास के दावों की हवा निकाल दी है। आंकड़ों का गणित इस भ्रष्टाचार और सुस्ती की गवाही दे रहा है। जल जीवन मिशन (JJM) के तहत काम करने वाले ठेकेदारों को पिछले 33 महीनों से उनके जायज़ भुगतान का इंतज़ार है। पिछले 9 महीनों से अमृत योजना के फंड का कोई अता-पता नहीं है। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर घूम रही हैं, लेकिन बजट के नाम पर ‘सन्नाटा’ है। ठेकेदारों का करीब 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा का जीएसटी भुगतान सरकार के पास अटका है। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि उन हजारों परिवारों के पेट पर लात है जो इन प्रोजेक्ट्स से जुड़े हैं।
जब हुक्मरान सो गए, तो ‘संकटमोचन’ ही सहारा
अनिश्चितकालीन धरने के तीसरे दिन आज जयपुर के जल भवन परिसर में एक अजीबोगरीब नज़ारा दिखा। जब मंत्रियों के आश्वासन कोरे कागज़ साबित हुए और अधिकारियों की संवेदनशीलता मर गई, तो हताश ठेकेदारों ने परिसर में स्थित मंदिर में डेरा डाल दिया। ठेकेदारों का कहना है कि सरकार “बजट का टोटा” होने का बहाना बना रही है, जबकि हकीकत में यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है। संकट इतना गहरा है कि ठेकेदार अब अपनी जेब से जीएसटी भर रहे हैं और बैंकों की किश्तों के बोझ तले दब चुके हैं। ऐसे में अब ठेकेदारों का यह संकट अब संकटमोचन के सहारे है। ठेकेदार अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठकर रोजाना हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। अब संकटमोचन की ठेकेदारों का संकट दूर करवाएगा।

आखिरी चेतावनी, भुगतान नहीं तो काम नहीं !
धरने पर बैठे ठेकेदारों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब यह लड़ाई आर-पार की है। जब तक बकाया राशि सीधे बैंक खातों में नहीं पहुँचती, तब तक न तो हनुमान चालीसा का पाठ रुकेगा और न ही यह धरना। Expose Now इस मामले पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखेगा। हम पूछेंगे कि आखिर राजस्थान के विकास को इस तरह ‘अमृत’ के बजाय ‘विष’ क्यों पिलाया जा रहा है?
