-सूबे की तिजोरी पर 7.26 लाख करोड़ का ऐतिहासिक बोझ, हर नागरिक की सांसों पर भारी कर्ज का पहरा
-2024 से 2026 तक 2 साल में 1.78 लाख करोड़ का बढ़ा घाटा, विकास की दौड़ या बेकाबू वित्तीय घाटे का जाल?
-मुफ्त की रेवड़ियों, पुराने कर्जों के ब्याज और बढ़ती देनदारियों से खतरे के निशान पर पहुंचा राजस्थान का भविष्य!
जयपुर। राजस्थान में अगर आज किसी घर में किलकारी गूंजती है और कोई नवजात दुनिया में पहला कदम रखता है, तो खुशियों के साथ-साथ एक कड़वी हकीकत भी उसका स्वागत करती है। वह मासूम बिना किसी गलती, बिना कोई कर्ज लिए, जन्म लेते ही करीब 77,766 (लगभग 78 हजार रुपये) का कर्जदार बन चुका है। ‘Expose Now’ की एक विशेष पड़ताल और गहन डेटा विश्लेषण में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मरूधरा का हर नागरिक इस वक्त भारी-भरकम कर्ज के साए में जी रहा है। प्रदेश की वित्तीय सेहत इतनी तेजी से बिगड़ रही है कि आने वाले कुछ ही महीनों में राज्य पर कुल कर्ज और वित्तीय देनदारियों का आंकड़ा 7.50 लाख करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है।
मुफ्त की रेवड़ियों से कर्ज में डूबता राजस्थान:-
‘Expose Now’ की रिसर्च टीम द्वारा जुटाए गए वित्तीय और जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान पर वित्तीय देनदारियों की रफ्तार साल-दर-साल खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है:
-दिसंबर 2023: प्रदेश पर कुल ऋण और अन्य वित्तीय दायित्व करीब 5,48,371 करोड़ थे।
-वित्तीय वर्ष 2024-25 (समाप्ति तक): यह आंकड़ा छलांग लगाकर 6,40,844 करोड़ पर पहुंच चुका है।
-वित्तीय वर्ष 2025-26 (अनुमानित): बजट अनुमानों के मुताबिक, यह बोझ बढ़कर 7,26,384 करोड़ होने जा रहा है।
-यानी महज 2 वर्षों के भीतर प्रदेश की देनदारियों में 1.78 लाख करोड़ की भारी बढ़ोतरी होने जा रही है।
प्रति व्यक्ति 77,766 रुपये का बोझ, एक आम परिवार पर क्या है असर?
वित्तीय वर्ष 2024-25 के कुल कर्ज और राज्य की अनुमानित जनसंख्या के आधार पर गणना की जाए, तो प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति पर औसतन 77,766.72 का कर्ज बैठता है।
सीधे शब्दों में समझें तो:
-यदि किसी मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार में 5 सदस्य (माता-पिता और तीन बच्चे) हैं, तो उस परिवार पर अप्रत्यक्ष रूप से करीब 3.88 लाख से 4 लाख रुपये का सरकारी कर्ज लदा हुआ है।
-प्रदेश का कोई भी नागरिक चाहे वह किसान हो, दिहाड़ी मजदूर हो या बेरोजगार युवा—सरकारी खातों में हर व्यक्ति के नाम पर लगभग 78 हजार रुपये का भार दर्ज है।
कर्ज के इस दलदल की असली वजह क्या है?
‘Expose Now’ की आर्थिक विश्लेषकों से बातचीत और विश्लेषण में सामने आया कि यह स्थिति रातोंरात पैदा नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे कई मुख्य कारण हैं:
-कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज: राज्य के कुल राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ पुराने कर्जों का मूलधन और भारी ब्याज चुकाने में खप जाता है।
-अनुत्पादक खर्च और मुफ्त की योजनाएं: चुनावी लाभ के लिए शुरू की गई अनियोजित सब्सिडी और लोक-लुभावन घोषणाओं ने राजस्व घाटे (Revenue Deficit) को बेकाबू कर दिया।
-कैपिटल एक्सपेंडिचर की कमी: कर्ज का पैसा लंबे समय तक टिकाऊ संपत्ति या रेवेन्यू जेनरेट करने वाले प्रोजेक्ट्स में लगने के बजाय दैनिक प्रशासनिक खर्चों और देनदारियों को निपटाने में जा रहा है।
-बढ़ती देनदारियां और पेंशन का बोझ: पुरानी पेंशन, गारंटी और स्वायत्त निकायों (बोर्ड-निगमों) के बढ़ते घाटे का सीधा भार भी सरकारी खजाने पर आ गिरा है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या हैं खतरे?:-
आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो अगर किसी राज्य पर कर्ज उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के मुकाबले सुरक्षित सीमा से बाहर जाने लगे, तो उसका सीधा असर जनता पर पड़ता है:
-महंगाई और टैक्स की मार: आने वाले समय में घाटा पाटने के लिए पेट्रोल-डीजल पर वैट, स्टांप ड्यूटी, बिजली की दरें और स्थानीय करों में बढ़ोतरी की जा सकती है।
-विकास योजनाओं पर ब्रेक: स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा, नई सड़कें और बड़े उद्योग लगाने के लिए बजट की कमी हो सकती है।
-बेरोजगारी का खतरा: जब सरकार का अधिकांश पैसा ब्याज भरने में जाएगा, तो नए सरकारी पदों का सृजन और भर्तियां प्रभावित हो सकती हैं।
कर्ज लो और काम चलाओ की नीति बंद हो तो सुधरे हालात:-
“राजस्थान को अब ‘कर्ज लो और काम चलाओ’ की नीति से बाहर निकलकर कड़े वित्तीय अनुशासन (Fiscal Discipline) की तरफ कदम बढ़ाना ही होगा। वरना आज जो नवजात 78 हजार के कर्ज के साथ जन्म ले रहा है, कल वही युवा एक लाख से ज्यादा के कर्ज के बोझ तले दबा खड़ा मिलेगा।”
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now