जयपुर। राजस्थान के ऊर्जा तंत्र में लाइन लॉस और वित्तीय घाटे का सबसे बड़ा कारण बिजली चोरी और डिस्कॉम प्रशासन की आंतरिक लापरवाही बनकर सामने आया है। आधिकारिक दस्तावेजों के एक्सक्लूसिव विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि पिछले दो वर्षों (2024 और 2025) के दौरान राज्य के तीनों बिजली वितरण निगमों—जयपुर, अजमेर और जोधपुर—में बिजली चोरी के 1,42,000 से अधिक मामले (VCR) पकड़े गए हैं। इन मामलों में करीब 250 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूला गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह उजागर करती है कि खुलेआम कटिया डालने, अवैध लोडिंग और मीटर टैम्परिंग का यह खेल स्थानीय लाइनमैनों और विजिलेंस विंग की अनदेखी व संरक्षण के बिना संभव नहीं है।
डिस्कॉम्स का ढीला सुपरविजन, 80% से अधिक मामले घरेलू श्रेणी में
विभाग के आंकड़ों की पड़ताल से साफ होता है कि निगरानी तंत्र की सुस्ती के चलते राज्यभर में बिजली चोरी व्यापक स्तर पर फैली हुई है। कुल पकड़े गए मामलों में 80% से अधिक हिस्सेदारी अकेले घरेलू श्रेणी की है:
- जयपुर डिस्कॉम: दो सालों में कुल 56,784 वीसीआर भरी गईं। इनमें 52,610 घरेलू (DS), 3,186 अघरेलू (NDS), 820 कृषि और 168 औद्योगिक कनेक्शनों में गड़बड़ी पकड़ी गई।
- अजमेर डिस्कॉम: 2024 में 25,633 और 2025 में 31,577 सहित कुल 57,210 मामले दर्ज हुए। इनमें 45,082 घरेलू, 6,447 गैर-घरेलू, 4,821 कृषि और 860 औद्योगिक उपभोक्ता शामिल रहे।
- जोधपुर डिस्कॉम: कुल 28,095 प्रकरण दर्ज किए गए (2024 में 12,739 और 2025 में 15,356)। इसमें 22,917 घरेलू, 3,088 अघरेलू, 1,881 कृषि और 209 औद्योगिक चोरी के केस सामने आए।
बड़ा सवाल यह उठता है कि घनी बस्तियों और कॉलोनियों में महीनों तक चलने वाली सीधी केबल चोरी स्थानीय बिजली कर्मचारियों की नजरों से कैसे बची रहती है।
कागजी सतर्कता और वसूली के आंकड़े
विद्युत निगमों द्वारा कागजों में सतर्कता जांच के जरिए राजस्व वसूली के बड़े दावे किए जाते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:
- जयपुर डिस्कॉम: 1,359.35 लाख यूनिट बिजली चोरी का आंकलन और कुल 104.73 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूला गया।
- अजमेर डिस्कॉम: वर्ष 2024 में 47.00 करोड़ और 2025 में 49.01 करोड़ सहित कुल 96.01 करोड़ रुपये की वसूली हुई।
- जोधपुर डिस्कॉम: दो वर्षों के दौरान कुल 45.36 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली गई।
- भारी लोड की चोरी: केवल जोधपुर डिस्कॉम क्षेत्र में ही दो वर्षों में 63,882.65 किलोवाट क्षमता की सीधी लोड चोरी पकड़ी गई।
रिकॉर्ड बताते हैं कि कई डिवीजनों में असेसमेंट (निर्धारित मांग) की तुलना में वास्तविक वसूली का आंकड़ा काफी कम रहता है। वीसीआर भरने के बाद सेटलमेंट और पेनल्टी कम करने के नाम पर आंतरिक स्तर पर लीपापोती की जाती है।
विद्युत निगमों की कार्यप्रणाली की गंभीर खामियां
- औसत बिलिंग का खेल: फील्ड में महीनों तक खराब मीटरों को नहीं बदला जाता, जिससे ‘एवरेज बिलिंग’ की आड़ में बड़े पैमाने पर अनमीटर्ड बिजली खपत का खेल चलता है।
- ए.बी. केबल (AB Cable) का अधूरा काम: खुले तारों की जगह इन्सुलेटेड केबल लगाने की गति धीमी रहने से सीधी कुंडी डालने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पाई है।
- क्रॉस वेरिफिकेशन में ढिलाई: उच्च उपभोग वाले कनेक्शनों के मीटरिंग फैक्टर (M.F.) और मीटर रीडिंग की नियमित क्रॉस-जांच न होना तकनीकी लापरवाही को दर्शाता है।
- एफआईआर में देरी: जुर्माना न भरने वालों पर समय रहते बिजली चोरी निरोधक थानों में तुरंत कानूनी कार्रवाई करने के बजाय मामलों को लटकाए रखा जाता है।
ईमानदार उपभोक्ता पर दोहरी मार
विद्युत तंत्र की इस संगठित लापरवाही और भारी लाइन लॉस की अंतिम कीमत राज्य के नियमित व ईमानदार बिल भरने वाले उपभोक्ताओं को फ्यूल सरचार्ज और महंगी बिजली दरों के रूप में चुकानी पड़ती है। जब तक वीसीआर भरने के साथ-साथ लापरवाह फील्ड अफसरों और बीट प्रभारियों के खिलाफ कठोर विभागीय जांच व एफआईआर दर्ज नहीं होगी, तब तक यह संगठित व्यवस्था यूं ही आम जनता की जेब पर भारी पड़ती रहेगी।