राजस्थान के सियासी गलियारों में एक खबर बड़ी चर्चाओ में है। एक रसूखदार महकमे के ‘मुखियाजी’ के साथ ऐसा ‘खेला’ हो गया है कि वो चाहकर भी ‘उफ’ नहीं कर पा रहे! इस मजेदार खेल के अंपायर कोई और नहीं बल्कि सूबे के ‘बड़े मुखियाजी’ बन बैठे हैं। पूरे मैच की रिमोट कंट्रोल वाली चाभी अब उन्हीं के पास है। दरअसल, ‘बड़े मुखियाजी’ को लंबे समय से इस चाबी का इंतजार था जो पिछले दिनों आखिरकार उनके हाथ लग ही गई। महकमे के ‘मुखियाजी’ पिछले कुछ समय से खुद को ‘सुपर’ समझने की भूल कर रहे थे। पार्टी लाइन को ठेंगा दिखाना और तय सिस्टम से बाहर जाकर ‘फ्री-स्टाइल’ बैटिंग करना, उनकी आदत बन चुकी थी। ‘बड़े मुखियाजी’ के लिए यह एक अदृश्य लेकिन सीधी चुनौती थी लेकिन कहते हैं ना कि राजनीति में टाइमिंग ही सब कुछ होती है!
किस्मत के धनी ‘बड़े मुखियाजी’ ने इस ‘मदहोश शिकारी’ को घेरने के लिए एक अदृश्य जाल बिछा रखा था। काफी समय से एक ‘स्पेशल सिस्टम’ महकमे के ‘मुखियाजी’ की कार्यशैली की पाई-पाई की मॉनीटरिंग कर रहा था। टीम के कौन से खिलाड़ी कहां, कितनी और कैसी ‘रसूख’ की बैटिंग कर रहे हैं, इसका पूरा कच्चा चिट्ठा तैयार किया जा रहा था। आखिरकार, ‘बड़े मुखियाजी’ की तकदीर ने साथ दिया और ‘मन्नत’ पूरी हो गई! एक बड़ी कामयाबी हाथ लगते ही खेल पलट गया। महकमे के ‘मुखियाजी’ की स्पेशल कोर-टीम के कई खासमखास लोग एक के बाद एक सिस्टम के हत्थे चढ़ गए। नतीजा? जो महकमे के ‘मुखियाजी’ कल तक हवा में उड़ रहे थे, वो अब पूरी तरह ‘तनाव’ में हैं! खबर तो यह भी है कि इस तगड़े झटके के बाद उनकी तबीयत भी नासाज चल रही है। पिछले दिनों जब वो मीडिया के सामने आए तो चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं। वो रसूखदार अंदाज गायब था और माथे पर लाचारी साफ दिख रही थी। बंद कमरों में मिन्नतें तो बहुत हुईं लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। चाभी ‘बड़े मुखियाजी’ की जेब में है और महकमे के ‘मुखियाजी’ की ‘स्पीड’ और ‘मर्जी’ दोनों पर परमानेंट ब्रेक लग चुका है!
सियासत का यह नियम है कि यहाँ चेहरे बदलते हैं, चरित्र नहीं। ऐसा ही एक हाई-वोल्टेज खेल पिछली सरकार में भी हुआ था। तब ‘स्पीड’ से जुड़े एक मलाईदार महकमे के ‘मुखियाजी’ बड़े-बड़े खेल कर रहे थे। दिल्ली और दरबार के ‘नंबर दो’ नेताजी का वरदहस्त होने के कारण वो तत्कालीन ‘बड़े मुखियाजी’ को सरेआम चुनौती दे रहे थे। आए दिन की बयानबाजी और समानांतर सरकार चलाने की इस जिद से ‘बड़े मुखियाजी’ चिढ़ गए। उन्होंने पीछे से ऐसी गोटियां फिट कीं कि कुछ ही दिनों में महकमे के ‘मुखियाजी’ के सारे कारनामे, बेटों और रिश्तेदारों के लंबे-चौड़े खेल बेनकाब हो गए। जेल जाने के डर से उन ‘मुखियाजी’ ने ऐसा सरेंडर किया कि इतिहास देखता रह गया। अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने अपने ही ‘नंबर दो’ आका की पीठ में छुरा घोंप दिया और गद्दारी कर बैठे!
सत्ता बदल गई, किरदार बदल गए, लेकिन स्क्रिप्ट वही है। आज के महकमे के ‘मुखियाजी’ के पास लंबा राजनीतिक तजुर्बा है, पिछली कई सरकारों में मलाईदार विभाग संभाल चुके हैं। मगर… बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं—”जब वक्त खराब हो, तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।” इस बार ‘मुखियाजी’ का पासा उलटा पड़ गया। सूबे के मौजूदा ‘बड़े मुखियाजी’ के पास भले ही लंबा प्रशासनिक या राजनीतिक अनुभव ना हो लेकिन उन्होंने शतरंज की ऐसी चाल चली है कि अनुभवी खिलाड़ी मात खा गया। अब इस पूरे खेल के अंपायर ‘बड़े मुखियाजी’ हैं और कभी भी उंगली उठते ही महकमे के ‘मुखियाजी’ नो-बॉल पर ‘रन आउट’ हो सकते हैं या सीधे ‘क्लीन बोल्ड’ भी!
Expose बाबू