-RTPP नियमों की उड़ रही है धज्जियां, 50 दिन में टेंडरों होना है निर्णय, लेकिन अफसरों की लापरवाही से एक्सपायर हो रहे हैं टेंडर
-कमेटियों में उलझे टेंडर, BEC और EPC के चक्कर में फाइलों का लंबा सफर, फाइनेंस कमेटी ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश
-PHED चीफ इंजीनियर्स को आखिरी अल्टीमेटम, समय सीमा में टेंडर फाइनल न होने पर तय होगी जवाबदेही
जयपुर। जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) में करोड़ों रुपये के बड़े प्रोजेक्ट्स के टेंडर्स को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। विभाग के अधिकारी राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) नियमों की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं। हालात यह हैं कि टेंडर प्रक्रिया को समय पर पूरा करने के बजाय उसे फाइलों और कमेटियों के जाल में इस कदर उलझा दिया जाता है कि अंत में निविदा की वैधता अवधि (Bid Validity) ही समाप्त हो जाती है। इस पूरे खेल में विभागीय अधिकारी जनता की पेयजल योजनाओं को जल्दी से आगे बढ़ाने की बजाए ठेका कंपनियों के फर्जीवाड़ों को छुपाने और उन्हें क्लीनचिट देने में लगे रहते है, जिसके चलते निविदाओं पर निर्धारित समय में निर्णय नहीं हो पाता और बिड वैलिडिटी समाप्त होने के कारण ठेका कंपनियों को बचने का रास्ता मिल जाता है। Expose Now के खुलासे के बाद पिछले दिनों फायनेंस कमेटी की 920वीं बैठक में इस पर चर्चा हुई। बैठक में विभागीय अधिकारियों की गंभीर लापरवाही और मिलीभगत का खुलासा हुआ, तो अधिकारियों में हड़कंप मच गया।

50 दिन का नियम, महीनों लग रही फाइलें:-
नियमों के मुताबिक, जहां टू-एंवेलप (Two Envelope) सिस्टम से टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं, वहां टेक्निकल बिड खुलने के 50 दिनों के भीतर सक्षम स्तर (फाइनेंस कमेटी/बोर्ड/प्रशासनिक विभाग) से अंतिम निर्णय हो जाना चाहिए। इसमें टेंडर स्वीकृति की सूचना भेजने का समय भी शामिल है। वहीं, निविदा की वैधता सामान्यत: 90 दिनों की होती है। लेकिन विभाग के चीफ इंजीनियर्स और अधिकारी इस तय समय सीमा में काम करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
कमेटियों के जाल में उलझा ‘विकास’:-
अधिकारियों ने बहाना बनाया कि फाइनेंस कमेटी की मंजूरी से पहले टेक्निकल बिड्स को बिड इवैल्युएशन कमेटी (BEC) और एम्पावर्ड प्रोक्योरमेंट कमेटी (EPC) के सामने विचार के लिए रखा जाता है। इन कमेटियों की बैठकों में बैंक गारंटी, अनुभव प्रमाण पत्र और क्रेडिट लिमिट की जांच के नाम पर इतना लंबा वक्त ले लिया जाता है कि टेंडर की वैलिडिटी ही खत्म हो जाती है। इसके बाद अधिकारी देरी को माफ (Condonation of Delay) कराने की फिराक में रहते हैं।
देरी को माफ करने की सिफारिश खारिज, फाइनेंस कमेटी सख्त:-
बैठक के दौरान चीफ इंजीनियर (U&NRW) द्वारा यह सिफारिश भी रखी गई कि फाइनेंस कमेटी के अधिकार क्षेत्र वाले टेंडर्स में 50 दिन से अधिक की देरी को माफ करने और फैसले की अधिकतम अवधि तय करने की छूट दी जाए। लेकिन फाइनेंस कमेटी ने अधिकारियों की इस ‘ढील’ वाली मांग को सीधे तौर पर खारिज कर दिया।

फाइनेंस कमेटी का कड़ा फैसला:-
फाइनेंस कमेटी ने सर्वसम्मति से साफ कर दिया है कि नियमों से परे जाकर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सभी चीफ इंजीनियर्स को सख्त हिदायत दी गई है कि वे RTPP रूल्स, 2013 का सख्ती से पालन करें और हर हाल में तय समय सीमा के भीतर ही निविदाओं का निस्तारण सुनिश्चित करें।
अब देखना यह होगा कि फाइनेंस कमेटी के इस कड़े रुख के बाद क्या PHED के अधिकारी अपनी सुस्त रफ्तार को बदल पाते हैं या फिर सरकारी प्रोजेक्ट्स इसी तरह लेटलतीफी का शिकार होते रहेंगे।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now
