नई दिल्ली/जयपुर, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) अब केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामले दर्ज कर सकती है, जांच कर सकती है और चार्जशीट दाखिल कर सकती है। इसके लिए उसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से किसी भी प्रकार की पूर्व अनुमति या सहमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
यह निर्णय न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे देश के प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब राजस्थान एसीबी ने संघ सरकार (केंद्र) के अधीन कार्यरत कुछ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए थे। इन कर्मचारियों ने ‘अनिल दायमा एवं अन्य बनाम राज्य राजस्थान’ मामले में एसीबी के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था:
- चूंकि वे केंद्रीय कर्मचारी हैं, इसलिए केवल CBI (दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के तहत) ही उनके खिलाफ जांच के लिए सक्षम है।
- एसीबी द्वारा बिना सीबीआई की सहमति के दायर की गई चार्जशीट कानूनी रूप से ‘शून्य’ है।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: “भ्रष्टाचार में कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं”
न्यायमूर्ति जेबी पारडीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के 3 अक्टूबर 2025 के फैसले को सही ठहराते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने दो मुख्य विधिक बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट की:
- क्षेत्रीय अधिकार (Jurisdiction): यदि अपराध राज्य की सीमा के भीतर हुआ है, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत राज्य की एजेंसी जांच के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
- CBI की अनुमति अनिवार्य नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 के तहत पुलिस अधिकारियों को जांच की शक्तियां दी गई हैं, और इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि केंद्रीय कर्मचारियों के लिए केवल सीबीआई ही एकमात्र एजेंसी होगी।
“धारा 17-A का उपयोग अवैध रिश्वत की मांग करने वाले मामलों में ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता। हमें ऐसी दलीलों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने में कोई संकोच नहीं है।” — सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने भी याचिकाकर्ताओं की दलीलों को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि भ्रष्टाचार एक आपराधिक कृत्य है, न कि कोई सेवा मामला (Service Matter)। अपराधी की नियुक्ति कहाँ से हुई है, इससे जांच एजेंसी की शक्तियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस फैसले का असर:
- त्वरित कार्रवाई: अब राज्य की एसीबी को दिल्ली से अनुमति मिलने का इंतजार नहीं करना होगा।
- कोई विशेष संरक्षण नहीं: केंद्रीय कर्मचारी अब ‘तकनीकी आधार’ पर जांच से नहीं बच सकेंगे।
- संघीय ढांचा मजबूत: राज्य की जांच एजेंसियों की संवैधानिक शक्तियों को मान्यता मिली है।
