Expose Now स्पेशल इन्वेस्टिगेशन: लापरवाही की ‘रेड लाइट’ पर अटका सरिस्का का सुरक्षा चक्र, वन विभाग की ढिलाई से हवा में ‘सुप्रीम कोर्ट’ के सख्त आदेश!

-कोर्ट ने दिए थे CEC की 25 सिफारिशों को लागू करने के निर्देश, 1 साल की डेडलाइन बीतने के बाद भी सुस्त पड़ा महकमा

-पांडुपोल ई-बस से लेकर सीटीएच सीमा निर्धारण तक केवल कागजी ‘प्रोग्रेस’; बेजुबान बाघों की जान से खिलवाड़

-ई-व्हीकल के लिए दो बार टेंडर निकाले फिर भी खाली हाथ, अवैध निर्माण और नो-फॉसिल फ्यूल गाइडलाइंस की उड़ रही धज्जियां

अलवर/जयपुर। विश्वप्रसिद्ध सरिस्का टाइगर रिजर्व (STR) की सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) के सख्त रुख के बावजूद जिम्मेदार वन विभाग गहरी नींद से जागने को तैयार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के तहत 11 दिसंबर 2024 को जारी सी.ई.सी. की 25 अति-महत्वपूर्ण सिफारिशों को लागू करने के लिए पूरे 1 साल (11 दिसंबर 2025) की समय-सीमा तय की गई थी। लेकिन 1 साल पूरा होने के बावजूद वन विभाग और संबंधित एजेंसियों की सुस्ती, प्रशासनिक लापरवाही और टालमटोल के रवैये के कारण ये अधिकांश सिफारिशें आज भी केवल कागजों और फाइलों में हिचकोले खा रही हैं।

सरिस्का टाइगर रिजर्व

कागजों में दौड़ रहीं ई-बसें, धरातल पर निजी वाहनों का धुआं:-

सीईसी की सबसे प्रमुख सिफारिशों में से एक थी कि 31 मार्च 2025 के बाद पांडुपोल हनुमान मंदिर मार्ग पर निजी और जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) से चलने वाले सभी वाहनों का प्रवेश पूरी तरह बंद कर इलेक्ट्रिक शटल बसें चलाई जाएं। लेकिन आज दिनांक तक सीईसी की यह सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश लागू नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप इस मार्ग पर आज भी धड़ल्ले से पेट्रोल-डीजल वाहन दौड़ रहे हैं।

विभाग का गैर-जिम्मेदाराना रवैया:

-विफल टेंडर: RSRTC द्वारा 17 अप्रैल 2025 और 28 अगस्त 2025 को दो बार टेंडर आमंत्रित किए गए, लेकिन विभागीय अस्पष्टता और शर्तों के कारण एक भी प्राइवेट वेंडर आगे नहीं आया।

-इंफ्रास्ट्रक्चर नदारद: चार्जिंग स्टेशन के लिए 720 KW बिजली कनेक्शन हेतु JVVNL ने 12.64 करोड़ रुपये का बजट मांगा, जो अभी तक अटका पड़ा है।

-बहानेबाजी: केवल दो दिन (मंगलवार-शनिवार) गाड़ियां चलाने को गैर-किफायती बताकर अब मामला सीएनजी विकल्पों की तरफ घुमाया जा रहा है।

-बड़ा सवाल: जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया था कि नो-फॉसिल फ्यूल गाइडलाइन का पालन हो, तो विभाग 1 साल तक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और टेंडर शर्तों को लेकर हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा रहा?

पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) और CTH का काम भी अटका:-

टाइगर रिजर्व की कानूनी सुरक्षा के लिए क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) के पुनर्गठन/राशनलाइजेशन और वन्यजीव अभयारण्य का दायरा बढ़ाने की समय-सीमा 30 सितंबर 2024 तय थी। लेकिन वन विभाग का आलम यह है कि इस संबंध में प्रारंभिक अधिसूचना ही नवंबर 2025 में जाकर जारी की गई। जब CTH की प्रक्रिया ही समय पर पूरी नहीं होगी, तो इको सेंसिटिव जोन (ESZ) की ड्राफ्ट अधिसूचना (जिसकी मियाद 31 दिसंबर 2024 थी) का काम भी अधर में ही लटका हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट

लापरवाही के 4 बड़े मोर्चे, जहां फेल साबित हो रहा तंत्र:-

1- अवैध व्यावसायिक निर्माण पर सुस्त हथौड़ा: बफर जोन में बिना स्वीकृतियों के चल रहे होटलों/रिसॉर्ट्स पर 30 सितंबर 2024 तक सख्त कार्रवाई होनी थी। थानागाजी और अलवर उपखंड क्षेत्रों में दर्जनों अवैध इकाइयां चिन्हित हुईं, लेकिन अधिकांश पर अंतिम नोटिस और सीजर की कार्यवाही तय समय-सीमा बीतने के महीनों बाद (दिसंबर 2025) में घिसटते हुए की गई।

2- कुशालगढ़-थानागाजी रूट का विकल्प ठप्प: भारी वाहनों को रोकने के लिए वैकल्पिक मार्ग की वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस फाइलों में अटकी है।

3- गांवों का विस्थापन और मवेशी नियंत्रण धीमा: कोर क्षेत्र से गांवों के विस्थापन (जैसे सुकोला व क्रास्का) और कैटल-टैगिंग की गति बेहद सुस्त है।

4- स्टाफ की कमी: स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स (STPF) की तैनाती और फील्ड स्टाफ की भर्ती के लिए 31 दिसंबर 2025 की डेडलाइन रखी गई थी, जिसमें पदों के सृजन के अलावा अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं दिखा है।

बेजुबानों की जान को लेकर गंभीर नहीं अधिकारी:-

सरिस्का में बाघों की संख्या बढ़ रही है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और शिकार की आशंकाएं चरम पर हैं। सीईसी ने इन्हीं खतरों को देखते हुए समय-बद्ध समय-सारणी के साथ 25 निर्देश दिए थे। लेकिन वन विभाग की कार्यशैली से ऐसा लगता है कि उसे अदालत के आदेशों की समय-सीमा से कोई सरोकार नहीं है। जिम्मेदार अधिकारी केवल ‘कार्रवाई जारी है’ (Compliance under process) का ढुलमुल जवाब देकर अपनी गर्दन बचाने में लगे हैं।

अब सवाल उठता है कि जब राजस्थान में वन्य जीवों की सुरक्षा को लेकर यदि सुप्रीम कोर्ट की एक्सपर्ट कमेटी की सिफारिशों का यह हश्र है, तो सरिस्का के जंगलों और बाघों की सुरक्षा का जिम्मा आखिर किसके भरोसे है? लापरवाह अफसरों पर जवाबदेही कब तय होगी?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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