Expose Now Exclusive: हवा में दौड़ रहीं ‘मोबाइल वेटरनरी यूनिट’, बिना डॉक्टर के ही बन रहे करोड़ों के बिल !

-प्रदेश में 536 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों के नाम पर बड़ा खेल, ग्राउंड रियलिटी में ‘1962 हेल्पलाइन’ खुद बीमार

जयपुर। प्रदेश के लाखों मूक पशुओं की सेहत सुधारने के नाम पर सरकारी खजाने में किस कदर सेंध लगाई जा रही है, इसका एक चौंकाने वाला सनसनीखेज मामला सामने आया है। सरकार कागजों में 536 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां (MVU) दौड़ा रही है, जिन पर हर महीने करीब 9.48 करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि एक वैन के बदले अनुबंधित फर्म को हर महीने 1.77 लाख रुपये का भारी-भरकम भुगतान किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर पशुपालकों को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा। जिला स्तरीय अधिकारियों और निजी फर्म की मिलीभगत से सिर्फ बिलों का खेल चल रहा है।

फर्जीवाड़े का खुला रास्ता: न फोटो, न वीडियो, न जियो-टैगिंग:-

इस पूरी योजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया गया है। नियम के मुताबिक जिस पशु का उपचार किया जाता है, उसकी न तो कोई फोटो ली जा रही है और न ही वीडियो बनाया जा रहा है। सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि वैन की जियो-टैगिंग (Geo-Tagging) तक नहीं होती। ऐसे में यह साबित करने का कोई जरिया ही नहीं है कि वैन वाकई मौके पर गई भी थी या नहीं। इस लचर सिस्टम का फायदा उठाकर अनुबंधित फर्में बिना इलाज किए ही लाखों के वारे-न्यारे कर रही हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट: मौके पर की गई पड़ताल में खुली पोल, सामने आईं दो बड़ी हकीकतें:-

जब इस योजना की असलियत जानने के लिए ग्राउंड जीरो पर तीन अलग-अलग गांवों के पशुपालकों से हेल्पलाइन नंबर 1962 पर कॉल करवाया गया, तो या तो हैल्पलाइन नंबर 1962 पर कॉल उठता ही नहीं और उठाया जाता है तो 1 घंटे में आ रहे हैं या 2 घंटे में आ रहे बोलकर फोन काट देते हैं और फिर आते ही नहीं है। कई बार किसानों द्वारा बार-बार फोन किए जाने के बाद मोबाइल वैन पहुंच तो जाती है, लेकिन उसमें जरूरी दवाई और डॉक्टर नहीं होते हैं। वेटेनरी छात्रों द्वारा ही इमरजेंसी सेवा लिखी हुई दवाईयां दे दी जाती है, जिनकी एक्सपायरी डेट गायब रहती है या दवाईयां खुली होती है, जो कि खुद हैल्पलाइन नंबर 1962 के बीमार सिस्टम को दर्शाती है।

विधानसभा में गूंजा सवाल, छह महीने से जवाब का इंतजार:-

इस महा-घोटाले की गूंज विधानसभा तक पहुंच चुकी है। मकराना विधायक जाकिर हुसैन गैसावत ने तारांकित सवाल के माध्यम से इस योजना की गहराई से जानकारी मांगी थी, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि छह महीने बीत जाने के बाद भी विभाग की ओर से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। यह मौन खुद ब खुद बयां करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

अधिकारियों का दावा बनाम हकीकत:-

एक तरफ जहां धरातल पर डॉक्टर नदारद हैं, वहीं दूसरी तरफ कागजों में सब ‘ऑल इज वेल’ दिखाया जा रहा है। “नागौर जिले में कुल 13 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां संचालित हैं। एक यूनिट के बदले प्रति माह 1.77 लाख का भुगतान फर्म को किया जाता है। इसमें डॉक्टर, वैन और दवाइयों की व्यवस्था शामिल है। संयुक्त निदेशक के दफ्तर में सभी 13 डॉक्टरों की की नियुक्ति है, लेकिन वे आधे से ज्यादा टाइम फील्ड में ड्यूटी के नाम पर गायब रहते हैं। ऐसे में मोबाइल वैन में जाने के लिए डॉक्टर्स ही उपलब्ध नहीं होते हैं। साफ है कि अधिकारियों की नाक के नीचे हाजिरी का यह खेल करोड़ों के वारे-न्यारे के लिए खेला जा रहा है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

Share This Article
Leave a Comment