-जल जीवन मिशन के तहत भरतपुर के नदबई में 38 गांवों की 43 करोड़ से ज्यादा की पेयजल योजना पर उठे सवाल
-पीएचईडी ने बिना जमीन के ही योजना का शुरू करवा दिया काम, 3 साल से अधूरी पड़ी है योजना, करोड़ों खर्च के बाद भी जनता को नहीं मिली पानी की एक बूंद
जयपुर। जल जीवन मिशन (JJM) के तहत ग्रामीण इलाकों में ‘हर घर जल’ पहुंचाने के दावों के बीच प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है। भरतपुर संभाग के नदबई ब्लॉक में बिना जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित किए ही पेयजल योजनाओं का काम शुरू कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी 5 गांवों के लोगों को पानी नहीं मिल पाया और अब वहां बनाया गया इंफ्रास्ट्रक्चर ‘कबाड़’ या ‘फुटाइल’ (बेकार) होने की कगार पर है। PHED वित्त समिति की बैठक में इस गंभीर लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए जिम्मेदार अधिकारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी करने के आदेश दिए गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
अतिरिक्त मुख्य अभियंता (ACE) भरतपुर के तहत साल 2021-22 (NIT No. 88) में 38 गांवों (34 योजनाओं) में चालू ग्रामीण जल प्रदाय योजना (RWSS) को FHTC (फंक्शनल हाउसहोल्ड टैप कनेक्शन) में बदलने के लिए 4,306.72 लाख रुपये का वर्क ऑर्डर मैसर्स डारा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, जोधपुर को दिया गया था। फर्म ने 33 गांवों का काम तो 2,660.11 लाख रुपये खर्च कर पूरा कर लिया, लेकिन उतरदा, डेहरा, तोहीला, माई सूती और जहांगीरपुर नाम के 5 गांवों में काम अधर में लटक गया।
कागजों में दौड़ती रही फाइलें, जमीन का अता-पता नहीं:-
हैरानी की बात यह है कि इन 5 गांवों के लिए वर्क ऑर्डर के तहत कुल अनुमानित लागत 791.64 लाख रुपये थी, जिसमें से 184.34 लाख रुपये ट्यूबवेल (TW), ओवरहेड सर्विस रिजर्व Reservoir (OHSR), सीडब्ल्यूआर (CWR) और राइजिंग मेन/वितरण पाइपलाइन के नाम पर खर्च भी कर दिए गए। लेकिन जब मुख्य काम की बारी आई, तो पता चला कि 4 गांवों में तो सरकार के पास काम करने के लिए जमीन ही उपलब्ध नहीं है, जिसके लिए तहसीलदार ने बाकायदा प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया है। वहीं, 1 गांव (जहांगीरपुर) में ग्रामीणों के विवाद के कारण काम ठप है। अब ठेकेदार फर्म ने 3 साल बीत जाने के बाद जमीन न मिलने पर हाथ खड़े कर दिए हैं और काम छोड़ने (Withdrawal) की इच्छा जताई है।
वित्त समिति की सख्त टिप्पणी: “जिम्मेदार अफसरों पर करो कार्रवाई”:-
जब इस अधूरे काम को वर्क ऑर्डर से हटाने (विड्रॉल करने) का प्रस्ताव मुख्य अभियंता द्वारा वित्त समिति के सामने रखा गया, तो कमेटी ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। समिति ने साफ शब्दों में कहा कि “जब जमीन आवंटित ही नहीं हुई थी, तो अधिकारियों ने अन्य संबंधित काम शुरू ही क्यों करवाए? अब तक खर्च किए जा चुके 1.84 करोड़ रुपये वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह व्यर्थ (Futile) साबित हो सकते हैं।”
बैठक में लिए गए बड़े फैसले:
-प्रस्ताव हुआ स्थगित: समिति ने ठेकेदार को काम से मुक्त करने के प्रस्ताव को फिलहाल टाल (Defer) दिया है।
-DWSM को भेजा मामला: अब इस मामले को पहले जिला जल एवं स्वच्छता मिशन (DWSM) की बैठक में विचार-विमर्श के लिए भेजा जाएगा और उनकी सिफारिशों के साथ नया एजेंडा लाया जाएगा।
-अधिकारियों पर गिरेगी गाज: बिना जमीन सुनिश्चित किए काम शुरू कराने वाले दोषी अधिकारियों की पहचान कर उन्हें तुरंत कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश मुख्य अभियंता (JJM) को दिए गए हैं।
-आखिरी कोशिश: जिला प्रशासन के स्तर पर अभी भी जमीन आवंटन के प्रयास करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि सरकारी पैसे को डूबने से बचाया जा सके।
सवाल यह उठता है कि जब सरकार के नियम स्पष्ट हैं कि किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले भूमि की उपलब्धता अनिवार्य है, तो पीएचईडी (PHED) के इंजीनियरों ने बिना जमीन देखे ही करोड़ों के टेंडर और कंस्ट्रक्शन को हरी झंडी कैसे दे दी? देखना होगा कि इन ‘लापरवाह’ अफसरों पर क्या कार्रवाई होती है।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now