छिन गई बुजुर्गों की महफिलें, खामोश हुआ बच्चों का बचपन: रामनिवास बाग की मौत का जिम्मेदार कौन?

छिन गई बुजुर्गों की महफिलें, खामोश हुआ बच्चों का बचपन: रामनिवास बाग की मौत का जिम्मेदार कौन? जयपुर: गुलाबी नगरी का हृदयस्थल और कभी शहर का ‘ग्रीन लंग’ (Green Lung) तथा ‘ऑक्सीजन जोन’ कहलाने वाला ऐतिहासिक रामनिवास बाग अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा है। चारदीवारी (परकोटा) के बढ़ते प्रदूषण और भीड़भाड़ के बीच यह बाग दशकों से लोगों के लिए राहत और सुकून का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। लेकिन, आधुनिकीकरण और विकास की अंधी दौड़ ने इस ऐतिहासिक बाग की हरियाली को कंक्रीट के जंगलों, पार्किंग, चौड़ी सड़कों, दफ्तरों और फूड कोर्ट्स के नीचे दबा दिया है। शहरवासियों के लिए अब यह चिंता का विषय बन गया है कि प्रदूषण के बीच सुकून के कुछ पल बिताने का उनका एकमात्र मुफ्त ठिकाना भी उनसे छीना जा रहा है।


1868 में सवाई राम सिंह द्वितीय की दूरदर्शी सोच
रामनिवास बाग का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। साल 1868 में महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने अपनी प्रजा के स्वस्थ भविष्य को ध्यान में रखकर इस बाग का निर्माण करवाया था। राजस्थान के शुष्क पर्यावरण में उस वक्त ‘हरियालो राजस्थान’ की परिकल्पना को साकार करने वाली यह एक दूरदर्शी सोच थी। शुरुआत में 75 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला यह बाग केवल जयपुर की सुंदरता का प्रतीक ही नहीं था, बल्कि आमजन के लिए परिवार सहित घूमने का पसंदीदा स्थल हुआ करता था।


‘बाग’ के नाम पर सरकारी अतिक्रमण और धुएं का दानव
शहरवासियों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि रामनिवास बाग के नाम से अब ‘बाग’ शब्द हटा देना चाहिए, क्योंकि अब यहां बाग जैसा कुछ बचा ही नहीं है। चारों तरफ सरकारी अतिक्रमण हो गया है। कहीं विशाल पार्किंग बना दी गई है, कहीं चौड़ी-चौड़ी सड़कें निकाल दी गई हैं, तो कहीं फूड कोर्ट और ऑफिस खड़े कर दिए गए हैं। लगातार चल रहे निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, मशीनरी के शोर और वाहनों के बढ़ते धुएं ने इस ‘ग्रीन लंग’ को अंदर से खोखला कर दिया है।

सुकून छिनने से बच्चों और बुजुर्गों की चहल-पहल हुई कम

घनी आबादी वाले परकोटे के भीतर खुली और हरी-भरी जगहें पहले ही न के बराबर रह गई हैं। रामनिवास बाग की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि लोग यहां प्रकृति का सानिध्य और मानसिक शांति पाने के लिए आते थे। कभी सुबह-शाम अपनी सेहत संवारने आने वाले बड़े-बुजुर्गों की महफिलों और बच्चों की खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाला यह बाग अब सूना होने लगा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि आज के दौर में जहां सुकून भी मॉल या महंगे कैफे में खरीदा जाता है, वहीं रामनिवास बाग जाने के लिए आम जनता को कभी पैसा नहीं देना पड़ा है

परकोटे के भविष्य के लिए खतरे की घंटी


चारदीवारी के बाशिंदों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों की चेतावनी है कि वक्त रहते अगर इस प्राकृतिक धरोहर को नहीं संभाला गया, तो जल्द ही यहां सिर्फ कंक्रीट की इमारतें ही रह जाएंगी। जिस तरह से प्राकृतिक सौंदर्य को खत्म किया जा रहा है, उसका हर्जाना आने वाली पीढ़ियों को बहुत महंगा पड़ सकता है। शहरवासियों की मांग है कि बाग के प्राकृतिक स्वरूप को छेड़े बिना इसे केवल हरियाली, बच्चों के खेल और बुजुर्गों के भ्रमण के लिए ही संरक्षित रखा जाए।


ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि फिर क्यों अब यह जगह लोगों की पसंदीदा जगह की सूची से बाहर हो गई है? इसका सीधा और स्पष्ट कारण है— विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर हो रहा अंधाधुंध निर्माण। बाग के भीतर बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियां, जेडीए द्वारा बनाई जा रही नई चौपाटी व फूड स्टॉल, कंक्रीट की चौड़ी सड़कें, विशाल पार्किंग और वहां आने वाले वाहनों के शोर व धुएं ने इस जगह की प्राकृतिक शांति को पूरी तरह से निगल लिया है। जब बाग में हरियाली और ताजी हवा ही नहीं बची, तो प्राकृतिक सुकून की तलाश में आने वाले लोगों का इस ‘कंक्रीट के जंगल’ से मोहभंग होना लाजमी है।


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