–98.29 करोड़ के काम में 126 करोड़ से ज्यादा का भुगतान, फिर भी काम अधूरा
-कार्य में 32 महिनों की देरी के बाद भी फर्म को प्राइज वेरिएशन में करोड़ों का गलत भुगतान
जयपुर/उदयपुर। जहां एक ओर सरकार हर घर नल से जल पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं भ्रष्टाचार की दीमक योजनाओं की जड़ों को खोखला कर रही है। राजस्थान के उदयपुर संभाग से भ्रष्टाचार की एक ऐसी सनसनीखेज तस्वीर सामने आई है, जिसने जल जीवन मिशन की पारदर्शिता पर कालिख पोत दी है। संभाग की सबसे पावरफुल मानी जाने वाली ठेकेदार कंपनी ‘मैसर्स जगदीश प्रसाद अग्रवाल’ (संयुक्त साहशी फर्म) ने जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के इंजीनियर्स के साथ मिलीभगत कर सोम कमला-अम्बा बांध पेयजल परियोजना में नियमों को ताक पर रखकर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, बल्कि सरकारी खजाने को करोड़ों रूपए का चूना भी लगाया है। जिस प्रोजेक्ट की लागत 98.29 करोड़ थी, उसका फर्म को 126 करोड़ से ज्यादा का भुगतान कर दिया। बड़ा सवाल ये है कि 32 महिनों की देरी से पूरा होने वाले इस प्रोजेक्ट में अभी भी कई कार्य अधूरे पड़े है।

ऑडिट जांच रिपोर्ट में खुलासा, अधूरे काम पर ही 27 करोड़ ज्यादा लुटाएंः-
हैरानी की बात यह है कि जिस परियोजना का कार्यादेश 98.29 करोड़ में जारी किया गया था, ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार अगस्त, 2025 तक ही 126 करोड़ से ज्यादा का भुगतान कर दिया गया। यानी मूल बजट से लगभग 27 करोड़ रुपये अतिरिक्त लुटा दिए गए। ताज्जुब देखिए कि निर्धारित समय सीमा खत्म होने के 32 महीने बाद भी परियोजना का काम आज भी अधूरा और प्रगतिरत है।
भ्रष्टाचार की ‘इनसाइड स्टोरी’, बिन्दुवार समझिये पूरा घोटाला:-
परियोजना के तहत सोम-कमला-बम्बा बांध से डूंगरपुर टाउन सहित आसपुर, डोवरा और डूंगरपुर ब्लॉक के 151 गांवों और 244 ढाणियों में 34 हजार से ज्यादा घरों तक घर-घर नल से जल पहुंचाना था। मैसर्स जगदीश प्रसाद अग्रवाल एवं मैसर्स जिओ मिलर को ज्वाइंट वेंचर के में इस कार्य का कार्यादेश दिनांक- 22.04.2022 को जारी किया गया था, जिसका कार्य दिनांक 21.07.2023 को पूरा किया जाना था। ऑडिट विभाग की जांच रिपोर्ट के अनुसार यह कार्य अगस्त, 2025 में 24 महिने की देरी से चल रहा था और परियोजना का कार्य अधूरा एवं प्रगतिरत था।
भुगतान में करोड़ों के घोटाले का ‘मायाजाल’:-
जलदाय विभाग के इंजीनियर्स ने ठेका फर्म मैसर्स जगदीश प्रसाद अग्रवाल के साथ मिलीभगत कर न केवल निर्माण कार्य में 19 करोड़ से ज्यादा का फर्जी भुगतान उठाया, बल्कि मूल्य वृद्धि (Price Escalation) के नाम पर 2.88 करोड़ और GST अंतर के नाम पर 4.23 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान उठा लिया। फर्म को अगस्त, 2025 तक ही कुल 126 करोड़ 05 का भुगतान किया जा चुका था, जबकि परियोजना का करोड़ों रूपए का काम अधूरा पड़ा था। सूत्रों के अनुसार इस परियोजना में ठेका फर्म द्वारा इंजीनियर्स के साथ मिलीभगत कर फील्ड में बिना कार्य किए ही अर्थ वर्क और पुरानी पाइपलाइनों को कार्य में चढ़वाकर करोड़ों रूपए का फर्जीवाड़ा भी किया गया है।

24 महीने की देरी, फिर भी ‘प्राइज वेरिएशन’ का इनाम ?:-
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा खुलासा यह है कि कार्य की समय सीमा 21 जुलाई 2023 निर्धारित की गई थी। आज इस समय सीमा को गुजरे 32 महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन पेयजल परियोजना का कार्य अब भी अपूर्ण और प्रगतिरत है। सरकारी नियमों के मुताबिक, यदि ठेकेदार की गलती से काम में देरी होती है, तो उस पर पेनल्टी लगनी चाहिए। लेकिन उदयपुर के ‘पावरफुल’ ठेकेदार को पेनल्टी के बजाय करोड़ों रुपये का प्राइज वेरिएशन (Price Variation) कैसे दे दिया गया? क्या PHED के इंजीनियर्स ने अपनी जेबें भरने के लिए फाइल पर ठेकेदार की गलतियों को नजरअंदाज किया?
बड़े सवाल: आखिर ज़िम्मेदार कौन? :-
लेखापरीक्षा (Audit) के दौरान सामने आए इन दस्तावेजों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:-
- जब काम 24 महीने लेट था, तो ठेकेदार पर जुर्माना लगाने के बजाय उसे अतिरिक्त भुगतान क्यों किया गया?
- क्या विभाग के आला अधिकारियों और फर्म ‘मैसर्स जगदीश प्रसाद अग्रवाल एवं मैसर्स जिओ मिलर’ के बीच कोई गुप्त ‘जुगलबंदी’ है?
- PHED में 27 करोड़ रुपये की इस अतिरिक्त चपत का ज़िम्मेदार कौन है?
यह महज एक परियोजना की देरी नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और सरकारी खजाने की खुली लूट है। बड़ा सवाल ये है कि ऑडिट रिपोर्ट में करोड़ों का फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद भी जलदाय विभाग की ओर से भ्रष्टाचार के इस खेल में लिप्त दोषी इंजीनियर्स और ठेका फर्म के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कि उदयपुर संभाग में भ्रष्टाचार के खेल को आलाधिकारियों और मंत्रालय की मिलीभगता को पूरी तरह से उजागर करता है।
Expose Now की पड़ताल जारी है…….
उदयपुर संभाग के इस सबसे रसूखदार ठेकेदार और पीएचईडी के ‘साहबों’ के बीच का यह गठजोड़ अब लेखापरीक्षा (Audit) की रडार पर है। आखिर किसके आशीर्वाद से 98 करोड़ का टेंडर 126 करोड़ तक पहुँचा? और निर्धारित समय में काम पूरा नहीं होने के बाद भी ठेका फर्म को कैसे प्राइज वेरिएशन (Price Variation) का करोड़ों रूपए का भुगतान कर दिया गया? एक्सपोज नाउ पर इस पूरी परियोजनाओं में हुए एक-एक घोटाले का पर्दाफाश लगातार जारी रहेगा।
कल देखिए पार्ट-2: “इंजीनियर्स की मेहरबानी और कागजी खेल का कच्चा चिट्ठा”
