Expose Now Exclusive: राजस्थान विश्वविद्यालय की 2013 के बाद अब 2018 की शिक्षक भर्ती भी सवालों के घेरे में, राजभवन से लोकभवन तक मचा हड़कंप !

-विधायक प्रताप सिंह सिंघवी के पत्र के बाद खुली पुरानी परतें, 7 साल बाद भी कई असिस्टेंट प्रोफेसरों का नहीं हुआ स्थायीकरण, के.सी. वर्मा रिपोर्ट दबाने और ‘सफेदपोश संरक्षण’ की आशंका

जयपुर। राजस्थान के उच्च शिक्षा जगत में नियुक्तियों के नाम पर हुए कथित खेल की परतें एक बार फिर उखड़नी शुरू हो गई हैं। वर्ष 2008 से 2013 के मध्य कांग्रेस शासनकाल में हुई नियुक्तियों पर भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी द्वारा राजभवन को लिखे गए सनसनीखेज पत्र के बाद अब एक और बड़ा खुलासा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, राजस्थान विश्वविद्यालय की वर्ष 2018 की असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती भी अब सीधे तौर पर गंभीर प्रशासनिक और विधिक सवालों के घेरे में आ गई है। इस भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर विसंगतियों की शिकायतें अब सीधे ‘लोकभवन’ तक पहुंच चुकी हैं, जिसने शासन से लेकर शिक्षा विभाग तक के गलियारों में खलबली मचा दी है।

राजस्थान विश्वविद्यालय

मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि भर्ती प्रक्रिया संपन्न होने के सात वर्ष बीत जाने के बाद भी कई चयनित असिस्टेंट प्रोफेसरों का अब तक स्थायीकरण (Confirmation) नहीं किया जा सका है। नियमों के मुताबिक दो वर्ष के प्रोबेशन पीरियड के बाद स्थायीकरण की प्रक्रिया अनिवार्य होती है, लेकिन सात साल का लंबा समय बीतने के बाद भी इस मामले को लटकाए रखना खुद-ब-खुद यह साबित करता है कि परदे के पीछे कुछ ऐसा है जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन छिपाने की कोशिश कर रहा है। शिकायतकर्ताओं ने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि यदि यह पूरी भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत और पारदर्शी थी, तो चयनित शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से हाथ क्यों खींचे जा रहे हैं?

राजस्थान ‘लोकभवन’

विधायक सिंघवी का पत्र और 2013 का वो दागदार अतीत:-

हाल ही में छबड़ा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी द्वारा माननीय राज्यपाल एवं कुलाधिपति को भेजे गए पत्र (क्रमांक 3509) ने शिक्षा जगत में भूचाल ला दिया है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि राजस्थान विश्वविद्यालय में तत्कालीन कुलपति डॉ. देवस्वरूप के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों में गंभीर विधिक उल्लंघन पाए जाने पर राजभवन द्वारा एक्शन लिया गया था। सिंघवी ने पत्र में साफ कहा है कि उनके कार्यकाल में नियुक्त किए गए 242 सहायक आचार्यों की पात्रता और चयन प्रक्रिया की वैधता का उचित परीक्षण आज तक लंबित है। इसके साथ ही जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर और जगद्गुरु रामनंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में भी धनबल और राजनीतिक प्रभाव के दम पर अयोग्य लोगों को रेवड़ियों की तरह नौकरियां बांटने और उन्हें अवैध पदोन्नतियां देने के पुख्ता आरोप हैं।

के.सी. वर्मा रिपोर्ट को दबाने का खेल:-

अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, पूर्व राज्यपाल की अनुशंसा पर इस पूरे तंत्र की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति के समक्ष बहुचर्चित ‘के.सी. वर्मा रिपोर्ट’ प्रस्तुत की गई थी, जिसमें भर्ती प्रक्रिया के कई संवेदनशील और तकनीकी बिंदुओं पर उंगलियां उठाई गई थीं। सूत्रों का दावा है कि के.सी. वर्मा रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से नियमों को दरकिनार करने के प्रमाण दिए गए थे, लेकिन एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस रिपोर्ट पर कोई निर्णायक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं होने दी गई। इतने वर्षों तक मामले का अंतिम समाधान न निकलना और रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाले रखना, किसी बडे़ प्रशासनिक व राजनीतिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।

विधायक प्रताप सिंह सिंघवी

अपात्रों को ‘संरक्षण’ और उपकृत करने की मची होड़:-

‘Expose Now’ की पड़ताल में यह बात भी सामने आई है कि शैक्षणिक योग्यताओं और प्रमाणपत्रों के उल्लंघन के बावजूद कई शिक्षक न केवल ऊंचे पदों पर जमे हुए हैं, बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व सौंपकर उपकृत किया जा रहा है और उनकी पदोन्नतियां भी की जा रही हैं। शिकायतकर्ताओं ने अब लोकभवन का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की है कि उच्च शिक्षा की गरिमा, पारदर्शिता और शैक्षणिक पवित्रता को बहाल करने के लिए इस पूरे नेक्सस को तोड़ा जाए। मांग की जा रही है कि एक स्वतंत्र और उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच समिति का गठन कर वर्ष 2008 से लेकर 2018 तक की सभी विवादित भर्तियों के रिकॉर्ड्स और पात्रताओं का दूध-का-दूध और पानी-का-पानी किया जाए और इस अकादमिक भ्रष्टाचार के पीछे मौजूद ‘सफेदपोशों’ और दोषी व्यक्तियों के खिलाफ सख्त विधिक व दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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