Expose Now स्पेशल इन्वेस्टिगेशन: राजस्थान में 2 साल में 8874 महिलाएं गायब, क्या सूबे में बेखौफ पैर पसार चुका है ‘देह-व्यापार’ और ‘मानव तस्करी’ का खूनी सिंडिकेट?

-आंकड़ों का भयावह सच: 2 सालों में 51,416 महिलाएं गायब, जिनमें से पुलिस मात्र 42,542 महिलाओं को ही बरामद कर पाई, पुरुषों की तुलना में 3 गुना अधिक लापता होने की खौफनाक दर

-पुरूषों की तुलना में महिलाएं टारगेट: राजस्थान में 2 सालों में मात्र 3305 पुरूष लापता हुए, पुलिस ने गुमशुदा 15391 में से 12086 पुरूषों को बरामद किया

-खाकी की घुटने टेक नीति: लाखों की आबादी पर पहरेदारी का दावा फेल, फाइलों में दफन हुईं 8,874 गुमशुदा बेटियों की सांसें

-‘उल्लास’ और ‘SOP’ केवल कागजों का खिलौना: समीक्षा बैठकों और दिखावटी अभियानों के बीच तस्करों की तिजोरी में बिकती जिंदगियां

-बेपरवाह हुकूमत और सोता सिस्टम: सुरक्षा के खोखले नारों की आड़ में क्या राजस्थान बन रहा है मानव तस्करी की सबसे मुफीद मंडी?

Expose Now संडे बिग स्टोरी

जयपुर। राजस्थान की धरती पर आज आधी आबादी की सुरक्षा केवल भाषणों, विज्ञापनों और पुलिसिया कागजी प्रेस नोटों तक सिमट कर रह गई है। ‘एक्सपोज नाउ’ की गहन पड़ताल और दस्तावेजी छानबीन में जो चौंकाने वाले तथ्य निकलकर सामने आए हैं, वे न केवल रूह कंपा देने वाले हैं बल्कि इस बात का खुला प्रमाण हैं कि राज्य में कानून-व्यवस्था की बागडोर संभाल रही खाकी और सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों ने संगठित अपराधियों के आगे पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं।

जनवरी 2024 से लेकर दिसम्बर 2025 तक के 24 महीनों के अंदर राज्य भर से महिलाओं के रहस्यमयी तरीके से लापता होने का ग्राफ जिस विस्फोटक रफ्तार से बढ़ा है, उसने सीधे तौर पर यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजस्थान में मानव तस्करों और अंतरराज्यीय देह-व्यापार गिरोहों का एक समानांतर, बेखौफ साम्राज्य स्थापित हो चुका है?

खौफनाक जमीनी हकीकत: पुरुषों के मुकाबले 3 गुना से ज्यादा महिलाएं गायब:-

‘Expose Now’ की इन्वेस्टिगेशन टीम द्वारा जुटाए गए आधिकारिक जमीनी आंकड़ों का विश्लेषण करने पर तंत्र की आंखें खोलने वाली तस्वीर सामने आती है। आमतौर पर किसी भी सामान्य सामाजिक परिदृश्य में गुमशुदगी के मामले दोनों वर्गों में किसी हद तक संतुलित होते हैं, लेकिन राजस्थान में हालात बिल्कुल उलट और अत्यंत भयावह हैं:

-वर्ष 2024 का काला सच: वर्ष 2024 के दौरान राज्य में पुरुषों की गुमशुदगी के कुल 7,750 मामले सामने आए। इसके विपरीत, इसी एक वर्ष के दौरान लापता होने वाली महिलाओं की संख्या 24,591 के दिल दहला देने वाले स्तर पर पहुंच गई। यानी पुरुषों की तुलना में तीन गुना से भी अधिक महिलाएं अचानक अपने घरों, रास्तों, कॉलेजों और दफ्तरों से गायब हो गईं।

-वर्ष 2025 का और भी भयानक मंजर: वर्ष 2025 में स्थिति सुधरने की बजाय बदतर होती चली गई। जहां 2025 में 7,641 पुरुष लापता हुए, वहीं लापता महिलाओं का आंकड़ा बढ़कर 26,825 के पार चला गया।

2 सालों में महिला-पुरूषों के गायब होने का महा-आकलन:-

जनवरी 2024 से 31 दिसम्बर 2025 के बीच प्रदेश से कुल 51,416 महिलाएं गायब दर्ज की गईं, जबकि इसी अवधि में पुरुषों की संख्या 15,391 थी। यानी कुल गायब होने वाले लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी 77 फीसदी से भी अधिक है। यह सीधा अंतर साबित करता है कि यह कोई सामान्य सामाजिक भटकाव या सामान्य पलायन नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित, लक्षित और संगठित आपराधिक जाल है जो महिलाओं और युवतियों को निशाना बना रहा है।

8,874 लापता महिलाओं का कोई अता-पता नहीं:-

राजस्थान पुलिस हर मंच पर अपनी त्वरित कार्यशैली और साइबर सर्विलांस का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन ‘Expose Now’ की पड़ताल ‘खाकी’ के दावों की सरेआम धज्जियां उड़ाती है:

-वर्ष 2024 में गायब हुई महिलाओं में से 3,142 महिलाएं साल बीत जाने के बाद भी नहीं तलाशी जा सकीं।

-वर्ष 2025 में पुलिस की कार्यशैली इतनी लाचार रही कि साल खत्म होने तक 5,732 महिलाओं का कोई अता-पता नहीं लग सका।

-यानी मात्र दो सालों के भीतर 8,874 लापता महिलाएं पुलिस के रिकॉर्ड में केवल एक ‘शेष’ (Unresolved) संख्या बनकर दफन हो चुकी हैं।

सवाल यह उठता है कि जब राज्य का पुलिस महकमा अत्याधुनिक सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स और अंतरराज्यीय सीमाओं की निगरानी का दम भरता है, तो फिर हवा में धुआं बनकर गायब हो रहीं इन हजारों बेटियों का कोई निशान पुलिस के हाथ क्यों नहीं लगता? क्या पुलिस तंत्र की विफलता ही इन अपराधियों का सबसे बड़ा संबल बन चुकी है?

जिलों का डार्क जोन, कहां सुरक्षित नहीं बचीं बेटियां?

‘Expose Now’ ने जब जिलेवार आंकड़ों की चीर-फाड़ की, तो सूबे के कई जिले मानव तस्करी के संदिग्ध हॉटस्पॉट के रूप में उभरकर सामने आए:

-जयपुर कमिश्नरेट व देहात का चक्रव्यूह:

राजधानी जयपुर, जहां आला पुलिस अफसर और गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी बैठते हैं, वही महिलाओं के गायब होने का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। जयपुर उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और ग्रामीण के इलाकों से दो सालों में हजारों महिलाएं गायब हुईं। जयपुर पश्चिम में 2024 में 602 और 2025 में 688 महिलाएं गायब हुईं। जयपुर दक्षिण में 2025 में गायब 615 महिलाओं में से 315 महिलाएं बरामद तक नहीं की जा सकीं।

उद्योग व सीमांत जिले—तस्करों का चारागाह:

-अलवर एवं भिवाड़ी: हरियाणा और दिल्ली बॉर्डर से सटे इस औद्योगिक बेल्ट में सैकड़ों महिलाएं गायब हुईं। वर्ष 2025 में अकेले अलवर से 503 महिलाएं गायब दर्ज हुईं, जिनमें से 101 का कोई सुराग नहीं मिला।

-उदयपुर और भीलवाड़ा: मेवाड़ के केंद्र उदयपुर में वर्ष 2024 में 1,143 और 2025 में 1,257 महिलाएं गायब हुईं, जिनमें से क्रमशः 294 और 431 महिलाओं को पुलिस ढूंढ नहीं सकी। भीलवाड़ा में 2025 में 1,302 महिलाएं गायब हुईं, जहां 183 का कोई पता नहीं।

-सीकर, नागौर और कोटा: सीकर में दो वर्षों में क्रमशः 849 और 963 महिलाएं गायब हुईं, जिनमें 368 मामलों में पुलिस के हाथ आज भी खाली हैं। शिक्षा नगरी कहे जाने वाले कोटा शहर में 2024 और 2025 में मिलाकर 1,495 से अधिक महिलाएं लापता हुईं।

इन सीमावर्ती और हाईवे से जुड़े जिलों से इतनी बड़ी तादाद में युवतियों का एकाएक गायब हो जाना सीधे तौर पर यह इंगित करता है कि महिलाओं को राज्य की सीमा से बाहर दूसरे राज्यों के रेड-लाइट एरिया या जबरन शादियों के बाजारों में धकेला जा रहा है।

क्या पनप चुका है अंतरराज्यीय मानव तस्करी का खूनी सिंडिकेट?

‘Expose Now’ की खोजी रिपोर्ट में यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि जब किसी क्षेत्र से अनुपातहीन तरीके से केवल युवतियों और महिलाओं का गायब होना लगातार जारी रहे, तो वह सिर्फ पारिवारिक या व्यक्तिगत विवाद नहीं होता।

-अंतरराज्यीय गिरोहों का नेटवर्क:

राजस्थान के ग्रामीण व कस्बाई इलाकों में बेरोजगार युवतियों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और घरेलू संकट से जूझ रही महिलाओं को बहला-फुसलाकर नौकरी, मॉडलिंग, शादी या बेहतर जीवन का झांसा देने वाले संगठित दलाल सक्रिय हैं।

-देह-व्यापार और बंधुआ मजदूरी:

जांच एजेंसियों की शिथिलता के कारण इन युवतियों को पड़ोसी राज्यों—हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के देह-व्यापार सिंडिकेट्स तक आसानी से पहुंचा दिया जाता है।

-पुलिस की शुरुआती लापरवाही ही तस्करों का हथियार:

मानव तस्करी के मामलों में ‘गोल्डन 24 ऑवर्स’ (शुरुआती 24 घंटे) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। तस्कर पीड़िता को कुछ ही घंटों में एक जिले से दूसरे जिले और फिर राज्य की सीमा पार करा देते हैं। लेकिन स्थानीय थानों में शिकायत लेकर पहुंचने वाले परिजनों को अक्सर यह कहकर टरका दिया जाता है कि “खुद ही अपनी मर्जी से कहीं गई होगी, आ जाएगी”। यह संवेदनहीन रवैया तस्करों को सुरक्षित निकलने का पूरा मौका देता है।

कागजी ‘उल्लास’ और ज़मीनी अंधेरा: पुलिस महकमे के अभियानों का छलावा:-

पुलिस मुख्यालय द्वारा अक्सर बड़े-बड़े सर्कुलर और स्थाई आदेश (SOP) जारी किए जाते हैं। फाइलों में दर्ज है कि:

-थानों में मिसिंग पर्सन रिपोर्ट (MPR) तुरंत दर्ज होनी चाहिए।

-एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) को हर जिले में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

-अभियान ‘उल्लास’ जैसे विशेष अभियानों के जरिए दस्तयाबी का ढोल पीटा जाता है।

परंतु जमीनी हकीकत यह है कि अभियान ‘उल्लास’ जैसे प्रयासों में खानापूर्ति कर केवल उन सीधे मामलों को निपटाया जाता है जहां लड़कियां अपनी मर्जी से रिश्तेदारों के यहां गई होती हैं। जिन वास्तविक मामलों में संगठित गिरोह शामिल होते हैं, वहां पुलिस हाथ डालने से कतराती है।

हर 15 दिन में वृत्ताधिकारी की समीक्षा बैठक, हर माह पुलिस अधीक्षक की क्राइम मीटिंग, और रेंज आईजी की त्रैमासिक निगरानी—ये सब केवल सरकारी डायरियों के पन्ने भरने तक सीमित रह गए हैं। अगर यह सुपरविजन धरातल पर काम कर रहा होता, तो दो वर्षों में 8,874 महिलाओं की फाइलें धूल नहीं फांक रही होतीं।

सरकार का दोहरा चरित्र: सुरक्षा के नारों पर भारी सत्ता की बेरुखी:-

प्रदेश में सत्तासीन सरकार आधी आबादी को साधने के लिए जनकल्याण, महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये के विज्ञापन जारी करती है। लेकिन ‘Expose Now’ यह तीखा सवाल पूछता है:

-जब राज्य की 51,000 से अधिक बहनें-बेटियां दो साल में अपने घरों से गायब हो गईं, तब गृह विभाग की नींद क्यों नहीं खुली?

-क्या कभी किसी जिले के पुलिस अधीक्षक या थानाधिकारी पर इस बात के लिए सख्त कार्रवाई हुई कि उसके इलाके से दर्जनों महिलाएं गायब हैं और पुलिस सुराग तक नहीं जुटा पाई?

-मानव तस्करी विरोधी इकाइयों (AHTU) को आधुनिक संसाधन, स्वतंत्र सर्विलांस विंग और पर्याप्त बजट देने में सरकार की दिलचस्पी क्यों नहीं है?

सच्चाई यही है कि राज्य सरकार महिला सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह से विफल साबित हुई है। शासन की प्राथमिकता में सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी और अपराध के आंकड़ों को दबाना रह गया है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि बेटियां अपने ही घर-आंगन में असुरक्षित महसूस कर रही हैं।

‘Expose Now’ के सीधे और तीखे सवाल: कौन देगा इन सवालों का जवाब?

-क्या राजस्थान पुलिस मानव तस्करों के संगठित सिंडिकेट के सामने नतमस्तक हो चुकी है?

-क्या पुलिस विभाग के निचले स्तर पर तस्करों और दलालों के साथ कोई अंदरूनी मिलीभगत है, जिसके चलते शुरुआती 24 घंटों में ठोस कार्रवाई नहीं होती?

-लापता 8,874 महिलाओं में से कितनी युवतियां आज जिस्मफरोशी या बंधुआ मजदूरी के दलदल में धकेली जा चुकी हैं, क्या सरकार के पास इसका कोई जवाब है?

-कागजी एसओपी (SOP) और सर्कुलरों के अलावा गृह विभाग ने इन अंतरराज्यीय गिरोहों की कमर तोड़ने के लिए कोई ठोस राज्यव्यापी स्पेशल टास्क फोर्स क्यों नहीं बनाई?

-क्या सरकार स्वीकार करेगी कि प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा का तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है?

जब रक्षक ही मूकदर्शक बन जाएं, तो न्याय की गुहार किससे?

‘Expose Now’ की यह खोजी रिपोर्ट केवल कुछ सूखे आंकड़ों का संकलन नहीं है, बल्कि उन हजारों असहाय परिवारों की चीख है जिनकी बेटियां, बहनें और माताएं अचानक गायब हो गईं और जिनका आज तक कोई पता नहीं चला। राजस्थान में महिलाओं के गायब होने की यह खौफनाक रफ्तार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कानून के रखवाले अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुंह मोड़ चुके हैं। अगर सरकार और पुलिस प्रशासन ने अब भी अपनी आंखें नहीं खोलीं और मानव तस्करी के इस फैलते नेटवर्क पर निर्णायक सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की, तो आने वाले सालों में राजस्थान में मानव तस्करों का ‘सिंडीकेट’ और ज्यादा तेजी के साथ अपने पैर पसारेगा और राजस्थान देशभर में महिलाओं की तस्करी का सबसे बड़ा गढ़ बन जाएगा।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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