जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर के शहीद स्मारक पर पिछले दो दिनों से चल रहा ग्रेड-थर्ड शिक्षकों का धरना गुरुवार शाम को समाप्त हो गया। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर द्वारा जल्द ही नई ट्रांसफर पॉलिसी लाने और शिक्षकों के तबादले करने के आश्वासन के बाद यह फैसला लिया गया। हालांकि, इस पूरे आंदोलन के दौरान ‘Expose Now‘ की टीम ने पहले दिन से लेकर समापन तक हर गतिविधि को बहुत करीब से देखा और शिक्षकों के भीतर सुलग रहे आक्रोश, व्यवस्था की सख्ती और उनके बेइंतहा दर्द को महसूस किया।
क्या रही आंदोलन की मुख्य बातें?
- पूरे प्रदेश से जुटे शिक्षक: राजस्थान के कोने-कोने से आए हजारों शिक्षक अपने बच्चों और परिवारों के साथ इस धरने में शामिल हुए। कई शिक्षकों के साथ आए छोटे-छोटे बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर अपने माता-पिता के ट्रांसफर की गुहार लगा रहे थे।
- भेदभाव का आरोप: शिक्षकों का सवाल था कि जब प्रिंसिपल, फर्स्ट और सेकंड ग्रेड के तबादले हो सकते हैं, तो सालों से एक ही जगह जमे थर्ड ग्रेड शिक्षकों के साथ यह अन्याय क्यों?
- शिक्षा मंत्री का वादा और दूसरा दौर: ग्रेड थर्ड टीचर्स संघर्ष समिति के संयोजक सुनील महला ने बताया कि मंत्री के साथ दूसरे दौर की वार्ता में यह सहमति बनी है कि 1 जनवरी तक ट्रांसफर पॉलिसी लाकर नए सत्र से पहले सभी शिक्षकों के तबादले कर दिए जाएंगे।
Gen-Z अवतार में गाया दर्द-भरा गाना
धरना स्थल पर मौजूद युवा और ऊर्जावान शिक्षकों ने सोशल मीडिया के ट्रेंड्स और Gen-Z अंदाज का उपयोग करते हुए अनोखे तरीके से प्रदर्शन किया। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए इन शिक्षकों ने माइक पर गाने गाकर और अपनी ही शैली में कविताएं सुनाकर शिक्षा विभाग और मंत्री मदन दिलावर को संदेश दिया।
शिक्षकों का कहना था कि पारंपरिक तरीकों से जब सरकार तक उनकी आवाज नहीं पहुंच रही थी, तो उन्होंने आधुनिक पीढ़ी के तरीकों को अपनाया ताकि उनकी पीड़ा युवा वर्ग और सोशल मीडिया के जरिए सरकार के कानों तक साफ-साफ पहुंच सके। गानों के इन बोलों में एक तरफ जहां अपने गृह जिलों से सालों से दूर रहने का कसौटी जैसा दर्द था, वहीं दूसरी तरफ अपनों से मिलने की टीस भी साफ झलक रही थी।
Expose Now की नजर से: प्रशासनिक सख्ती और शिक्षकों का अटूटौ हौसला
धरना स्थल पर प्रशासन और पुलिस द्वारा आंदोलन को कुचलने के लिए हर संभव प्रयास किए गए, लेकिन शिक्षकों का मनोबल नहीं डिगा:
- अंधेरे और प्यास में संघर्ष: धरने को बंद करवाने के लिए शहीद स्मारक की स्ट्रीट लाइटें काट दी गईं और जनरेटर तक उठवाकर ले जाया गया। इसके अलावा, शिक्षकों के पीने के लिए रखा पानी का टैंकर भी हटवा दिया गया और आसपास बने शौचालयों पर ताले जड़ दिए गए।
- अमानवीय परिस्थितियों में डटे रहे लोग: भीषण गर्मी और उमस के बीच महिला शिक्षिकाएं, उनके छोटे-छोटे बच्चे, बुजुर्ग माता-पिता और दिव्यांगजन बिना बिजली-पानी के अंधेरे में रातभर डटे रहे। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों ने भी उनके हौसले को नहीं तोड़ा।
- भले ही संघर्ष समिति ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी हो, लेकिन धरना स्थल पर मौजूद कई शिक्षक सरकार के इस मौखिक और अस्पष्ट आश्वासन से बेहद असंतुष्ट नजर आए।
शिक्षकों का दर्द और सरकार के वादों पर शंका
भले ही संघर्ष समिति ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी हो, लेकिन धरना स्थल पर मौजूद कई शिक्षक सरकार के इस मौखिक और अस्पष्ट आश्वासन से बेहद असंतुष्ट नजर आए।
- भरोसा क्यों नहीं? शिक्षकों का कहना था कि पहले शिक्षा मंत्री का बयान आया था कि “थर्ड ग्रेड वालों के नंबर कम आते हैं इसलिए दूर पोस्टिंग मिलती है।” अब जब अंतिम दौर की वार्ता हुई, तो कहा गया कि मंत्री वीडियो जारी करेंगे या आधिकारिक बयान आएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
- ‘AI जनित’ दस्तावेज पर संदेह: शिक्षकों ने बताया कि उन्हें जो प्रारूप (ड्राफ्ट) दिखाया गया, वह ऐसा लग रहा था मानो किसी AI से बनाया गया हो। उसमें ट्रांसफर की कोई निश्चित तारीख नहीं थी और ना ही कोई पुख्ता हस्ताक्षर थे। ऐसे में वे सरकार के वादों पर आंख मूंदकर भरोसा कैसे करें?
संघर्ष समिति के अध्यक्ष सुनील महला ने असंतुष्ट शिक्षकों को आश्वस्त किया कि यदि 1 जनवरी 2027 तक ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तो सभी शिक्षक दोबारा इसी जगह धरने पर बैठेंगे और इस बार केवल ट्रांसफर नहीं, बल्कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर नए मंत्री से तबादले करवाएंगे।
Expose Now का संस्मरण: वह दर्द, जो मन को कचोट गया
दो दिनों तक लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान Expose Now की टीम ने उन परिवारों के आंसुओं और संघर्ष को बेहद करीब से महसूस किया:
- कई महिला शिक्षिकाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर धरने की उमस और गर्मी में डटी हुई थीं। जब उनसे सवाल पूछा गया, तो उनकी नम आंखें उनका सारा दर्द बयां कर रही थीं।
- कई बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों और पोते-पोतियों से दूर रहकर अकेलेपन और बेबसी का जीवन जी रहे थे। उनकी सिर्फ एक ही पुकार थी कि इस ढलती उम्र में उन्हें परिवार के साथ की जरूरत है, छोटे-छोटे बच्चे अपने दादा-दादी के साथ रहने को तरस रहे हैं।
- कई दिव्यांगजन इस उम्मीद में वहां पहुंचे थे कि जो पिछले 15 से 18 साल से राजस्थान के दूसरे कोने में अपने घर से दूर नौकरी कर रहे हैं, उनकी पीड़ा शायद सरकार को नजर आएगी। स्कूल का अवकाश होने पर बसों और ट्रेनों में सीट न मिलने पर धक्के खाकर अपने घर जाने वाले और भीड़ के कारण घर तक न पहुंच पाने वाले उन शिक्षकों का संघर्ष वाकई झकझोर देने वाला था।
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबरें दिखाना नहीं, बल्कि समाज के उस दर्द को सरकार और दुनिया तक पहुंचाना है जो व्यवस्था की मार झेल रहा है। यह आंदोलन भले ही स्थगित हो गया हो, लेकिन इन शिक्षकों के दिलों में बैठा डर और सिस्टम से उपजा असंतोष अभी भी बाकी है।
