PHQ का नया मैनपावर प्लान, क्राइम लोड, आबादी, क्षेत्रफल, दूरी, भीड़ और रिस्पॉन्स टाइम से तय होगी नफरी, जरूरत पड़ी तो बदलेंगी थाना सीमाएं
जयपुर। राजस्थान में पुलिस थानों की तस्वीर अब सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होगी कि थाना शहरी है या ग्रामीण। पुलिस मुख्यालय ने थानों में पुलिसकर्मियों की वास्तविक जरूरत का नए सिरे से आकलन शुरू किया है। इसके लिए वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी अलग-अलग थानों के क्राइम लोड, आबादी, क्षेत्रफल, भौगोलिक दूरी, ट्रैफिक, कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों और विशेष आयोजनों का अध्ययन करेगी। यानी आने वाले समय में किसी थाने की पुलिसिंग क्षमता तय करने में सिर्फ अपराध की संख्या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि पुलिस को कितने लोगों और कितने बड़े क्षेत्र की सुरक्षा करनी है और किसी घटना की सूचना मिलने के बाद मौके तक पहुंचने में कितना समय लगता है। राजस्थान पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक राज्य में 8 रेंज, 2 पुलिस आयुक्तालय, 49 पुलिस जिले और 1,052 पुलिस थाने हैं। साथ ही 1,321 पुलिस चौकियां दर्ज हैं।
क्यों पड़ी नई व्यवस्था की जरूरत?
पुलिसिंग का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। एक तरफ पारंपरिक अपराध, चोरी, लूट, मारपीट और महिला अपराध हैं तो दूसरी तरफ साइबर फ्रॉड, ऑनलाइन ठगी, संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और सोशल मीडिया से जुड़े अपराधों ने पुलिस के काम का दायरा बढ़ाया है। इसके अलावा बड़े शहरों में ट्रैफिक और भीड़ प्रबंधन तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पुलिस की पहुंच भी बड़ी चुनौती है।
ऐसे में दो थानों की आबादी समान होने के बावजूद उनका पुलिसिंग वर्कलोड अलग हो सकता है। किसी थाना क्षेत्र में अपराध कम हो, लेकिन क्षेत्रफल इतना बड़ा हो कि पुलिस टीम को एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने में लंबा समय लगे। इसके उलट किसी छोटे क्षेत्र में रोजाना भारी भीड़, बाजार, धार्मिक स्थल या बड़े आयोजन हों तो वहां पुलिस की जरूरत कहीं अधिक हो सकती है। यही अंतर नई मैनपावर व्यवस्था का प्रमुख आधार बनने जा रहा है।
खाटू श्यामजी जैसे थाने होंगे नई व्यवस्था की परीक्षा
डीजीपी राजीव कुमार शर्मा के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में शहरी और ग्रामीण आधार पर वर्गीकरण हर जगह पुलिस की वास्तविक जरूरत को पूरी तरह नहीं दर्शाता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सीकर में खाटू श्यामजी मंदिर की जिम्मेदारी वाले थाना क्षेत्र का भौगोलिक क्षेत्र छोटा हो सकता है, लेकिन वहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण पुलिस पर कानून-व्यवस्था का दबाव बहुत अधिक रहता है।
ऐसे थानों के लिए केवल क्षेत्रफल या सामान्य अपराध संख्या के आधार पर स्टाफ तय करना पर्याप्त नहीं होगा। यहां भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण, वीआईपी मूवमेंट, धार्मिक आयोजनों और आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की जरूरत को भी गणना में शामिल करना होगा।
क्राइम कंट्रोल के लिए कैसे बनेगी नई रूपरेखा?
कमेटी की प्रस्तावित कवायद को मोटे तौर पर कई स्तरों पर देखा जा सकता है।
पहला—क्राइम लोड। किसी थाने में सालभर में कितने मुकदमे दर्ज होते हैं, किस तरह के अपराध सामने आते हैं, गंभीर अपराधों की संख्या कितनी है और जांच का कितना बोझ है—इन सभी बिंदुओं का आकलन होगा।
दूसरा—आबादी। थाना क्षेत्र में कितनी आबादी रहती है और कितने गांव, कॉलोनियां, कस्बे या शहरी क्षेत्र उसके अधीन हैं, इसे स्टाफ निर्धारण में शामिल किया जा सकता है
तीसरा—भौगोलिक क्षेत्र। बड़े थाना क्षेत्र में सिर्फ मुकदमों की संख्या नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों की पेट्रोलिंग और घटनास्थल तक पहुंचने की दूरी भी महत्वपूर्ण होगी।
चौथा—रिस्पॉन्स टाइम। किसी आपात सूचना के बाद पुलिस को मौके तक पहुंचने में औसतन कितना समय लगता है, यह नई व्यवस्था का अहम संकेतक बन सकता है।
पांचवां—विशेष कानून-व्यवस्था। धार्मिक स्थल, पर्यटन स्थल, बड़े बाजार, औद्योगिक क्षेत्र, संवेदनशील क्षेत्र, वीआईपी गतिविधियां, बड़े मेले और नियमित भीड़ वाले स्थान अतिरिक्त पुलिसिंग की जरूरत पैदा करते हैं।
छठा—ट्रैफिक और पेट्रोलिंग। जिन थाना क्षेत्रों में यातायात का दबाव अधिक है, वहां कानून-व्यवस्था के साथ ट्रैफिक ड्यूटी का अतिरिक्त बोझ भी मैनपावर आकलन में शामिल किया जा सकता है।
सिर्फ जवान बढ़ाना नहीं, थाना क्षेत्र भी बदल सकता है
नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह हो सकता है कि जरूरत सामने आने पर समाधान केवल अतिरिक्त पुलिसकर्मी भेजने तक सीमित न रहे। अगर किसी थाने का क्षेत्रफल अत्यधिक बड़ा है और पुलिस का रिस्पॉन्स टाइम लगातार ज्यादा है, तो उसके थाना क्षेत्र की सीमा के पुनर्गठन पर भी विचार किया जा सकता है। यानी भविष्य में किसी थाने का क्षेत्र छोटा किया जा सकता है, नई पुलिस चौकी या थाना बनाने की जरूरत सामने आ सकती है या दो थाना क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव की सिफारिश हो सकती है। इससे पुलिसिंग का लक्ष्य केवल ‘कितने पुलिसकर्मी हैं’ से बदलकर ‘पुलिस कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से मौके तक पहुंच सकती है’ हो जाएगा।
पुलिस बल में रिक्त पद भी बड़ी चुनौती
मैनपावर की जरूरत का आकलन ऐसे समय में किया जा रहा है जब राजस्थान पुलिस में कई स्तरों पर स्वीकृत और पदस्थापित नफरी के बीच अंतर मौजूद है। राजस्थान पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार निरीक्षक के 1,410 स्वीकृत पदों में 1,181 पदस्थापित हैं। वहीं कांस्टेबल के 82,602 स्वीकृत पदों में 71,792 पदस्थापित हैं। यानी दोनों स्तरों पर रिक्तियां मौजूद हैं।
इसलिए नई मैनपावर नीति की असली परीक्षा केवल जरूरत पहचानने में नहीं, बल्कि उपलब्ध बल और भविष्य में होने वाली भर्ती के बीच संतुलन बनाने में होगी।
क्राइम कंट्रोल पर क्या असर पड़ेगा?
यदि नई व्यवस्था वैज्ञानिक तरीके से लागू होती है तो इसका सबसे सीधा असर रिस्पॉन्स टाइम और फील्ड पुलिसिंग पर पड़ सकता है। अधिक अपराध वाले थाना क्षेत्रों में जांच और गश्त के लिए पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराया जा सकेगा। बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस की पहुंच बेहतर की जा सकेगी। भीड़ वाले धार्मिक और पर्यटन क्षेत्रों में अतिरिक्त बल की जरूरत पहले से चिन्हित की जा सकेगी।
इसका दूसरा फायदा यह होगा कि थाने के कर्मचारियों पर एक साथ कई तरह की ड्यूटी का दबाव कम करने की कोशिश की जा सकती है। कानून-व्यवस्था, जांच, पेट्रोलिंग, वीआईपी ड्यूटी और अन्य जिम्मेदारियों को अलग-अलग तरीके से प्लान करना संभव होगा। हालांकि केवल स्टाफ बढ़ने से अपराध नियंत्रण की गारंटी नहीं होती। अपराध की रोकथाम में पुलिसिंग की गुणवत्ता, जांच की गति, तकनीक, खुफिया तंत्र, बीट व्यवस्था, अभियोजन और पुलिस-जनता समन्वय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कितने साल तक प्रभावी रहेगी यह व्यवस्था?
नई व्यवस्था को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए सबसे अहम सवाल यह होगा कि एक बार स्टाफ तय करने के बाद उसे कितने समय तक उसी अनुपात में रखा जाए। आबादी, शहरीकरण, नए हाईवे, औद्योगिक क्षेत्र, पर्यटन और धार्मिक स्थलों की भीड़ तथा अपराध के पैटर्न लगातार बदलते रहते हैं। इसलिए विशेषज्ञ स्तर पर हर 3 वर्ष में मैनपावर ऑडिट और गंभीर बदलाव वाले थाना क्षेत्रों में सालाना समीक्षा जैसी व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। यह PHQ की घोषित समयसीमा नहीं है, बल्कि नई व्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए एक संभावित प्रशासनिक मॉडल है। यानी थाने को एक बार ‘फिक्स स्टाफ’ देने के बजाय डेटा के आधार पर लगातार अपडेट होने वाली मैनपावर व्यवस्था बनाई जा सकती है।
आगे की राह—डेटा से तय होगी पुलिसिंग
भविष्य की पूरी व्यवस्था को डिजिटल क्राइम डेटा, जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, घटनाओं की लोकेशन, पुलिस रिस्पॉन्स टाइम, बीट क्षेत्र और कानून-व्यवस्था की ड्यूटी से जोड़ा जा सकता है। इससे PHQ के पास यह पता लगाने का आधार होगा कि किस थाने में कितने जवान चाहिए और कहां अतिरिक्त बल की जरूरत है। राजस्थान पुलिस की वेबसाइट पर बीट स्तर तक के आंकड़े उपलब्ध हैं और राज्य में कुल 24,679 बीट दर्ज हैं। इससे भविष्य में थाना स्तर के बजाय बीट स्तर तक पुलिसिंग जरूरत का विश्लेषण करने की दिशा भी खुल सकती है। असल बदलाव यही होगा कि पुलिस की ताकत अब सिर्फ थाने की दीवारों के भीतर मौजूद जवानों की संख्या से नहीं, बल्कि अपराध की रोकथाम, घटनास्थल तक पहुंचने की गति और पूरे थाना क्षेत्र में पुलिस की वास्तविक मौजूदगी से मापी जाए।