-करोड़ों का ‘खेल’ या सरकारी मिस-मैनेजमेंट?
जयपुर/अजमेर। आज हम आपके सामने सरकारी फाइलों का एक ऐसा सच उजागर करने जा रहे हैं, जिसे देखकर आप भी कहेंगे— क्या सरकारी विभागों में दाएं हाथ को पता नहीं होता कि बायां हाथ क्या कर रहा है? मामला राजस्थान के अजमेर और जयपुर से जुड़ा है, जहाँ जनता को पानी पहुंचाने के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाओं को पहले मंजूरी दी जाती है, टेंडर पास कर दिए जाते हैं और फिर अचानक कह दिया जाता है—अरे, जिस रूट पर हम 35 करोड़ रुपये फूंकने जा रहे हैं, वहां तो पहले से ही वो काम चल रहा है !
जी हां, हम बात कर रहे राजस्थान के उस जलदाय विभाग कि, जिसके इंजीनियर्स और अधिकारियों ने एक बार फिर अपनी ‘अंधी’ और एयर-कंडीशंड प्लानिंग को लेकर कटघरे में है। बीसलपुर-अजमेर पेयजल परियोजना में एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे सरकारी सिस्टम और इंजीनियरों की कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जिस रूट पर पहले से ही फेज-3 के तहत 1500 MM की विशाल पाइपलाइन बिछाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा था, उसी रूट पर अफसरों ने आंखें मूंदकर जनता के करीब 35 करोड़ का एक और टेंडर जारी कर दिया। हद तो तब हो गई जब कागजों में फाइलें दौड़ाकर प्राइज बिड (Price Bid) भी फाइनल कर दी गई। अब मई 2026 में जब पोल खुली, तो अपनी गर्दन बचानी भारी पड़ गई और आनन-फानन में इस पूरे काम को ‘डी-सैंक्शन’ (निरस्त) कर टेंडर रद्द करने पड़े हैं।
बजट से लेकर प्राइज बिड तक… ऐसे बुना गया ‘कागजी जाल’:-
दस्तावेजों के मुताबिक, बजट घोषणा 2024-25 के बिंदु संख्या 8.09 के तहत बीसलपुर-अजमेर पेयजल परियोजना में गोयला हेडवर्क्स से नसीराबाद हेडवर्क्स के बीच पुरानी 1200 MM की पीएससीसी (PSCC) पाइपलाइन को बदलकर नई एमएस (MS) पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। इसके लिए 34 करोड़ 95 लाख का भारी-भरकम बजट स्वीकृत हुआ।
विभाग के आला अफसरों ने बिना ग्राउंड रियलिटी जांचे इस पर दनादन मुहर लगानी शुरू कर दी:
-21 अगस्त 2024: माननीय मंत्री महोदय ने फाइल को ‘ऑन-फाइल’ मंजूरी दी।
-23 सितंबर 2024: वित्त विभाग (FD) से वित्तीय सहमति भी जारी करवा ली गई।
-06 नवंबर 2024: 3491.18 लाख की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति जारी हुई।
-जुलाई 2025: इस काम के लिए बकायदा टेंडर आमंत्रित कर प्राइज बिड तक को फाइनल मंजूरी दे दी गई। यानी ठेकेदार को वर्क ऑर्डर देकर जनता की गाढ़ी कमाई लुटाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी।
| क्र.सं. | दिनांक / समय | चरण / प्रशासनिक प्रक्रिया | विवरण / स्थिति | बजट / राशि |
| 1 | बजट घोषणा 2024-25 | बिंदु संख्या 8.09 | 1200 MM की पुरानी PSCC पाइपलाइन को MS पाइपलाइन में बदलना | ₹34 करोड़ 95 लाख (कुल स्वीकृत) |
| 2 | 21 अगस्त 2024 | मंत्रालय मंजूरी | माननीय मंत्री महोदय द्वारा ‘ऑन-फाइल’ मंजूरी | — |
| 3 | 23 सितंबर 2024 | वित्तीय सहमति | वित्त विभाग (FD) द्वारा सहमति जारी | — |
| 4 | 06 नवंबर 2024 | प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति | विभाग द्वारा आधिकारिक वित्तीय स्वीकृति जारी | ₹3491.18 लाख |
| 5 | जुलाई 2025 | टेंडर एवं प्राइज बिड | टेंडर आमंत्रित कर प्राइज बिड को फाइनल मंजूरी मिली | वर्क ऑर्डर की तैयारी |
मई 2026 में खुली आंख, तो अफसरों के उड़े होश:-
जब इस पूरे प्रोजेक्ट की समीक्षा बैठक एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (ACS) की अध्यक्षता में हुई, तब जाकर विभाग के तथाकथित ‘विद्वान’ इंजीनियरों को होश आया कि इस रूट (चैनेज 11025-17436 और 19396-19785) पर तो बीसलपुर-अजमेर ड्रिंकिंग वॉटर सप्लाई प्रोजेक्ट फेज-3 के तहत पहले से ही 1500 MM की MS पाइपलाइन डालने का काम चल रहा है। जब एक ही जगह पर पहले से ही उससे बड़ी और आधुनिक पाइपलाइन बिछाई जा रही थी, तो फिर अलग से 35 करोड़ का यह एस्टीमेट किसके फायदे के लिए बनाया गया? क्या ग्राउंड पर बिना एक कदम रखे ही दफ्तरों में बैठकर करोड़ों की योजनाएं सिर्फ कमीशन के खेल के लिए तैयार की जाती हैं?
हड़बड़ी में लिया यू-टर्न, अब टेंडर रद्द और वित्त विभाग से गुहार:-
अपनी फजीहत होती देख चीफ इंजीनियर (U&NRW) की सिफारिश पर 27 अप्रेल 2026 को फायनेंस कमेटी की बैठक में इस काम को रद्द करने की सहमति बनी है। इस कार्य को लेकर चल रही टेंडर प्रक्रिया, जिसकी फाइनल बिड खुल चुकी थी और टेंडर की दरें अनुमोदित करने की तैयारी थी, उसे तुरंत निरस्त कर दिया गया है और कार्य को डी-सेंशन कर दिया गया है। चूंकि यह बजट घोषणा का हिस्सा था, इसलिए अब इस काम को बजट से वापस (Withdraw) लेने के लिए वित्त विभाग को पत्र लिखा गया है।
‘Expose Now’ के सीधे सवाल:
-सवाल 1: जब फेज-3 का काम मौके पर चालू था, तो पीएचईडी के तकनीकी विंग और इंजीनियरों ने 2 साल तक इस डबल प्लानिंग को क्यों छुपाए रखा? क्या यह सीधे तौर पर सरकारी धन के गबन की कोशिश नहीं थी?
-सवाल 2: टेंडर और प्राइज बिड फाइनल होने तक जो सरकारी मशीनरी, समय और स्टेशनरी का नुकसान हुआ, उसकी रिकवरी इन लापरवाह अफसरों की सैलरी से क्यों नहीं की जानी चाहिए?
-सवाल 3: क्या सरकार इस ‘कागजी एस्टीमेट घोटाले’ के पीछे के जिम्मेदार इंजीनियरों और ठेकेदारों के गठजोड़ पर कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगी, या मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
वक्त रहते यह दोहरा टेंडर पकड़ में आ गया, वरना जनता के 35 करोड़ से ज्यादा की राशि सरकारी फाइलों और अफसरों की मिलीभगत की भेंट चढ़ जाती। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान पीएचईडी की साख पर एक ऐसा दाग लगा दिया है, जिसका जवाब देते अफसरों से नहीं बन रहा।
Expose Now ब्यूरो रिपोर्ट, जयपुर।