Expose Now एक्सक्लूसिव: धमाकों और उग्रवाद से लहूलुहान रहे राजस्थान में सुरक्षा से भारी खिलवाड़, जयपुर में बनना था 275 करोड़ का ‘ग्लोबल एंटी-टेरर सेंटर’, गृह विभाग की लेटलतीफी से केंद्र ने प्रोजेक्ट ही किया रद्द

-केंद्र सरकार ने 46.50 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी कर दी थी जारी, लेकिन राज्य सरकार की सुस्ती के चलते जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई

-अजमेर-जयपुर सीरियल ब्लास्ट से लेकर कन्हैयालाल हत्याकांड तक लगातार दहलता रहा प्रदेश, फिर भी आतंकवाद-उग्रवाद से निपटने वाले महाप्रोजेक्ट पर कुंडली मारकर बैठे रहे जिम्मेदार

-तीन साल तक कोई काम न होने पर गृह मंत्रालय ने बंद किया प्रोजेक्ट; हाथ पर हाथ धरे बैठे गृह विभाग के पास अब इसे दोबारा शुरू कराने की कोई योजना तक नहीं

जयपुर। आतंकवाद, कट्टरपंथ और सीमा पार से रची जाने वाली नापाक साजिशों को लेकर बेहद संवेदनशील माने जाने वाले राजस्थान में सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस आधुनिकीकरण को लेकर सरकारी सिस्टम की बेहद चौंकाने वाली और गैर-जिम्मेदाराना लापरवाही सामने आई है। ‘Expose Now’ की विशेष पड़ताल में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश की राजधानी जयपुर में 275 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले जिस ‘आतंकवाद विरोधी वैश्विक केन्द्र’ (ग्लोबल सेंटर फॉर काउंटर टेररिज्म) को मंजूरी दी गई थी, वह राज्य सरकार और उसके गृह विभाग की घोर अकर्मण्यता और लालफीताशाही की भेंट चढ़ गया।

केंद्र सरकार ने इस अति-महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए पहली किस्त के तौर पर 46.50 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि भी राजस्थान को जारी कर दी थी। लेकिन हैरत की बात यह है कि राज्य के गृह विभाग और जिम्मेदार प्रशासनिक अमले ने वर्षों तक इस पर कोई ठोस काम ही शुरू नहीं कराया। नतीजा यह हुआ कि केंद्र के गृह मंत्रालय ने काम में शून्य प्रगति और निर्धारित समय सीमा बीत जाने के कारण इस पूरे प्रोजेक्ट को ही हमेशा के लिए रद्द (बंद) कर दिया।

यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब राजस्थान पहले से ही बड़े आतंकी धमाकों, सीमा पार की तस्करी, कट्टरपंथी स्लीपर सेल्स और दिल दहला देने वाले हत्याकांडों का गवाह रहा है। इसके बावजूद सुरक्षा तंत्र को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने वाले केंद्र को गंवा देना सीधे तौर पर प्रदेश की जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

क्या था 275 करोड़ का यह ग्लोबल प्रोजेक्ट:-

‘Expose Now’ को मिले आधिकारिक दस्तावेजों और पड़ताल के अनुसार, देश में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण (Modernisation of Police Forces) की व्यापक योजना के तहत केंद्र सरकार ने 7 नवम्बर 2017 को राजस्थान के लिए इस ऐतिहासिक परियोजना को मंजूरी दी थी।

-परियोजना का नाम: आतंकवाद विरोधी वैश्विक केन्द्र (Global Centre for Counter-Terrorism)।

-स्थान: सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस, सिक्योरिटी एंड क्रिमिनल जस्टिस (SPUP) के अंतर्गत सैटेलाइट कैम्पस, जयपुर।

-कुल बजट: 275 करोड़ रुपये।

-फंडिंग का फॉर्मूला: 60:40 का अनुपात (जिसमें 165 करोड़ रुपये केंद्र सरकार को और 110 करोड़ रुपये राज्य सरकार को वहन करने थे)।

-समय सीमा: मंजूरी के बाद इसे 3 साल के भीतर पूरी तरह स्थापित कर कार्यशील करना था।

-केंद्र से मिली राशि: केंद्र सरकार ने योजना को तेजी से अमलीजामा पहनाने के लिए दो किस्तों में कुल 46.50 करोड़ रुपये राज्य को अग्रिम हस्तांतरित भी कर दिए थे।

इस केंद्र का उद्देश्य राजस्थान ही नहीं, बल्कि समूचे देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद निरोध (Counter-Terrorism), उग्रवाद विरोधी रणनीतियों, धार्मिक-राजनीतिक कट्टरपंथ पर शोध व कार्रवाई, और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आधुनिक निगरानी तकनीकों में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण व उत्कृष्टता (Excellence) प्रदान करना था।

गृह विभाग की फाइलों में दफन हुआ करोड़ों का प्रोजेक्ट:-

केंद्र से करोड़ों रुपये मिलने के बावजूद राजस्थान सरकार और गृह विभाग का रवैया कितना सुस्त और लापरवाह रहा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तीन साल तक सैटेलाइट कैंपस के नाम पर कागजी खानापूर्ति और बैठकों के अलावा धरातल पर कोई ठोस निर्माण या आधारभूत ढांचा खड़ा नहीं किया गया।

प्रोजेक्ट के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों को जोड़ना, एडवांस साइबर व इंटेलिजेंस लैब तैयार करना और ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना था। लेकिन जब गृह मंत्रालय (MHA), भारत सरकार ने परियोजना की समीक्षा की, तो पाया कि करोड़ों रुपये बैंक खातों में पड़े रहने के बावजूद राजस्थान में काम की प्रगति लगभग शून्य थी। आखिरकार केंद्र सरकार ने जुलाई 2019 में सख्त कदम उठाते हुए इस पूरे प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया और फाइल बंद कर दी।

सबसे दुखद पहलू यह है कि इतना बड़ा और सामरिक महत्व का संस्थान हाथ से निकल जाने के बाद भी राज्य सरकार के गृह विभाग ने इसे दोबारा जीवित करने या केंद्र के समक्ष पुनर्विचार याचिका तक दाखिल करने की जहमत नहीं उठाई। गृह विभाग के रिकॉर्ड साफ बताते हैं कि वर्तमान में इस केंद्र को पुनर्जीवित करने या शुरू करने की कोई कार्ययोजना तक प्रक्रियाधीन नहीं है।

लगातार दहलते रहे शहर, फिर भी नहीं चेता सिस्टम:-

राजस्थान का अतीत गवाह है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे होने और आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से हमेशा राष्ट्रविरोधी ताकतों के निशाने पर रहा है। इसके बावजूद आतंक से मुकाबला करने वाले संस्थान के प्रति ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

-अजमेर दरगाह बम ब्लास्ट (11 अक्टूबर, 2007): सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में पवित्र रमजान के महीने में हुए इस आतंकी विस्फोट ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इसमें निर्दोष अकीदतमंदों की जान गई और दर्जनों लोग घायल हुए।

-जयपुर सीरियल ब्लास्ट (13 मई, 2008): परकोटे के भीतर हनुमान मंदिरों और व्यस्त बाजारों (चांदपोल, माणक चौक, त्रिपोलिया, छोटी चौपड़, जौहरी बाजार आदि) में महज 15 मिनट के भीतर 8 सिलसिलेवार बम धमाके किए गए थे। इस नृशंस आतंकी हमले में 71 बेगुनाह नागरिकों की मौत हुई थी और 180 से अधिक लोग लहूलुहान हुए थे।

-चित्तौड़गढ़ व रतलाम आतंकी मॉड्यूल (मार्च 2022): राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में सुरक्षा एजेंसियों ने एक बड़े आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश करते हुए कार से भारी मात्रा में अत्याधुनिक विस्फोटक सामग्री (आरडीएक्स/आईईडी बनाने के उपकरण) जब्त की थी। जांच में सामने आया था कि ‘सूफा’ संगठन से जुड़े आतंकी जयपुर समेत कई शहरों को दहलाने की बड़ी साजिश रच रहे थे।

-कन्हैयालाल हत्याकांड, उदयपुर (28 जून, 2022): दिनदहाड़े एक निर्दोष दर्जी कन्हैयालाल की दुकान में घुसकर नृशंस हत्या की गई और उसका तालिबानी अंदाज में वीडियो बनाकर वायरल किया गया। इस घटना ने साबित कर दिया कि राज्य में धार्मिक कट्टरपंथ और ऑनलाइन रेडिकलाइजेशन की जड़ें कितनी खतरनाक तरीके से पैर पसार चुकी हैं।

इन भीषण त्रासदियों और निरंतर पनप रहे खतरों के बावजूद, राज्य सरकार ने उस संस्थान को ठंडे बस्ते में जाने दिया जो खास तौर पर ऐसे कट्टरपंथ, उग्रवाद और आतंकी स्लीपर सेल्स की कमर तोड़ने के लिए डिजाइन किया गया था।

विफलता के प्रमुख बिंदु: राजस्थान के सुरक्षा तंत्र की 5 बड़ी ‘खामियां’:-

‘Expose Now’ की पड़ताल के मुख्य निष्कर्ष:

  1. केंद्र के पैसे का उपयोग न कर पाना: केंद्र सरकार ने 46.50 करोड़ रुपये राज्य को सौंप दिए थे। राज्य के इतिहास में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं जहां सुरक्षा के नाम पर केंद्र से पैसा आने के बाद भी काम शुरू न होने पर योजना रद्द हुई हो।
  2. 1070 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की अनदेखी: राजस्थान की सीमा पाकिस्तान से लगती है, जहां से ड्रोन के जरिए हथियारों और हेरोइन की तस्करी, जासूसी और घुसपैठ का खतरा 24 घंटे बना रहता है। यह केंद्र ‘बॉर्डर सर्विलांस और सिक्योरिटी’ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था, जिसे गंवा दिया गया।
  3. स्पेशल विंग्स को आधुनिक प्रशिक्षण का अभाव: राजस्थान पुलिस की एटीएस (एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड) और एसओजी (स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप) जैसी विंग्स को नए जमाने के साइबर-टेररिज्म और ड्रोन वॉरफेयर से निपटने के लिए जिस उच्चस्तरीय ट्रेनिंग सेंटर की जरूरत थी, वह नौकरशाही की भेंट चढ़ गया।
  4. राजनीतिक व प्रशासनिक उदासीनता: 2017 में योजना मंजूर हुई और 2019 में रद्द हुई। इस दौरान सरकार व गृह विभाग के आला अफसरों ने न तो ज़मीन आवंटन की अड़चनों को युद्धस्तर पर सुलझाया और न ही प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग कमेटी की प्रभावी बैठकें कीं।
  5. बहाली की कोई कोशिश नहीं: प्रोजेक्ट रद्द होने के सालों बीत जाने के बाद भी गृह विभाग यह कहकर पल्ला झाड़ रहा है कि योजना केंद्र की थी और केंद्र ने ही बंद की है, लिहाजा उनके पास इसे वापस लाने की कोई योजना नहीं है।

‘Expose Now’ का सवाल, जनता की सुरक्षा का जिम्मेदार कौन:-

जब जयपुर, अजमेर, उदयपुर और सीमावर्ती जिले लगातार संवेदनशील बने हुए हैं, तब आतंकवाद विरोधी इतने बड़े ग्लोबल सेंटर को शुरू न करा पाना केवल वित्तीय विफलता नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक अक्षमता और सुरक्षा प्राथमिकताओं के प्रति आपराधिक उपेक्षा का स्पष्ट प्रमाण है। जनता के टैक्स का पैसा, केंद्र की वित्तीय सहायता और राज्य की सुरक्षा की गारंटी—इन तीनों को गृह विभाग की कार्यशैली ने दांव पर लगा दिया। क्या सरकार में बैठे आला हुक्मरान और जिम्मेदार अधिकारी इस बात का जवाब देंगे कि आखिर किसकी लापरवाही से राजस्थान का यह ‘सुरक्षा कवच’ बनने से पहले ही बिखर गया?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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