-बगरू क्षेत्र में आमेर नरेश के दौर की बावड़ी व संत देवरम की छतरियां जर्जर, पुरातत्व विभाग की कुंभकर्णी नींद से मंडराया बड़े हादसे का खतरा
-नए तालाबों के नाम पर करोड़ों के टेंडर की बंदरबांट, लेकिन पुरखों के बनाए 4 मंजिला इंजीनियरिंग अजूबे को खंडहर बनाने पर तुला सिस्टम
-सत्ताधारी विधायक कैलाश वर्मा के हलके में इतिहास का कत्ल; उखड़े पत्थर, सड़ांध मारता पानी और मिटते भित्ति चित्र पूछ रहे सवाल—’म्हारो कसूर कांई?’
जयपुर/बगरू। “घी ढुल्या म्हारो कांई नी जावे, पाणी ढुल्या म्हारो जी बळे…”— जिस मरुधरा में पानी की एक-एक बूंद को घी से ज्यादा कीमती मानकर पुरखों ने सीने का पसीना बहाया, उसी जयपुर की दहलीज पर आज सिस्टम की बेशर्मी का नंगा नाच चल रहा है। जल संरक्षण के नाम पर सरकारी मंचों से लंबी-चौड़ी डींगें हांकने वाले हुक्मरानों की हकीकत देखनी हो, तो बगरू विधानसभा क्षेत्र के भव्यपुरा गांव चले आइए। संवत 1694 (सन 1637 ईस्वी) में महाराजाधिराज जयसिंह के दौर में पत्थरों को तराशकर बनाई गई चार मंजिला ‘भव्यपुरा बावड़ी’ आज प्रशासन और पुरातत्व विभाग के मुंह पर खुला तमाचा मार रही है।

चार सौ साल पहले जब रेगिस्तान में पानी अमृत था, तब हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक सीमेंट और कंक्रीट के ऐसी नायाब इंजीनियरिंग खड़ी की थी जो सदियों तक इलाके की प्यास बुझाती रही। मगर आज? ‘हेरिटेज बचाओ’ और ‘कैच द रेन’ का फर्जी ढोल पीटने वाले सिस्टम ने इस ऐतिहासिक धरोहर को लावारिस कचराघर बनाकर छोड़ दिया है।
कभी भी ढह सकता है स्ट्रक्चर, बड़े हादसे का अंदेशा:-

भव्यपुरा बावड़ी केवल उपेक्षा का शिकार नहीं है, बल्कि अब ‘मौत का कुआं’ बनने की कगार पर है। बावड़ी के चारों तलों की सीढ़ियों के चौके उखड़ चुके हैं। पत्थरों के जोड़ों में पीपल-बड़ के दरख्त उग आए हैं, जिनकी जड़ें बुनियाद को फाड़ रही हैं। दीवारों में इंच-इंच चौड़ी दरारें आ चुकी हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यहां न तो कोई सुरक्षा दीवार है, न कोई चेतावनी बोर्ड और न ही पुरातत्व विभाग का कोई पहरेदार। गांव के मवेशी और बच्चे अक्सर यहां घूमते रहते हैं। जरा सी हलचल से कमजोर हो चुकी पत्थरों की दीवारें भरभराकर गिर सकती हैं।
सवाल सीधा है—क्या पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन यहां किसी मासूम की जान जाने या किसी बड़े हादसे के बाद ही अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा?
आस्था और कला पर प्रशासनिक हथौड़ा, संत और वफादार श्वान की समाधि बदहाल:-
राजस्थान की संस्कृति केवल राजा-रानियों तक सीमित नहीं थी; यह त्याग, भक्ति और वफादारी की मिसाल रही है। बावड़ी के ठीक मुहाने पर संत देवरम और उनके निष्ठावान श्वान (बटुकनाथ) का समाधि स्थल और कलात्मक छतरियां मौजूद हैं। यह स्थल इस बात का गवाह है कि मरुधरा में एक बेजुबान जानवर की वफादारी को भी संतों जैसा मान दिया गया। लेकिन आज इन छतरियों की नक्काशीदार मेहराबों का प्लास्टर उखड़ चुका है। दीवारों पर उकेरे गए अनमोल राजस्थानी भित्ति चित्र (Murals)—जिनमें हमारे लोकजीवन के रंग जिंदा थे—अब सीलन, काई और गर्द के नीचे दम तोड़ चुके हैं। जिन्हें देखकर विदेशी इतिहासकार दांतों तले अंगुली दबा लेते थे, वे आज प्रशासनिक लापरवाही के चलते इतिहास के मलबे में तब्दील हो रहे हैं।
करोड़ों के ‘कागजी तालाब’ मंजूर, पर रियासती जल-ढांचों पर फूटी कौड़ी नहीं:-
एक तरफ राज्य सरकार जल स्वावलंबन और अमृत सरोवर के नाम पर जेसीबी चलाकर नए तालाब खोदने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है (जिसमें ठेकेदारों और अफसरों की जेबें भरती हैं)। दूसरी तरफ, सदियों से वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) का अचूक मॉडल रही यह बावड़ी गंदे नाले जैसी सड़ांध मार रही है। बारिश का पानी आज भी इसमें आता है, लेकिन कैचमेंट एरिया में गंदगी का अंबार है। पानी सड़कर हरा और जहरीला हो चुका है। यदि इस पारंपरिक जल स्रोत को थोड़ा सा साफ कर पुनर्जीवित किया जाए, तो पूरे भव्यपुरा और आसपास के गांवों का भूजल स्तर सुधर सकता है। मगर ‘कमीशन’ नए निर्माण में है, पुरखों की विरासत को संवारने में नहीं—यही कड़वा सच है।
सत्ता पक्ष के विधायक कैलाश वर्मा की चुप्पी पर ग्रामीणों में आक्रोश:-

क्षेत्र की जनता अब खुलकर सवाल पूछ रही है। बगरू से विधायक कैलाश वर्मा वर्तमान सत्ताधारी दल के कद्दावर चेहरे हैं। जयपुर शहर और सांभर के बीच मौजूद इस ऐतिहासिक बेल्ट को टूरिज्म मैप पर लाने और इसके संरक्षण के लिए विधायक कोष या सरकारी बजट से पैसा क्यों नहीं जारी हुआ? पुरातत्व विभाग केवल कागजों में फाइलें सरकाने और औपचारिक चिठ्ठियां लिखने का स्वांग रचता है। फाइलों का यह खेल तब तक चलता रहेगा जब तक कि यह पूरी बावड़ी जमींदोज न हो जाए?
गांव के बुजुर्ग कहते हैं—“म्हारा बाप-दादा तो पाणी और धरम बचाबा खातर जान दे देता, आज का नेता अपणी ही धरोहर नै खाबा बैठ्या छै।”
अगर वक्त रहते शासन-प्रशासन ने आंखें नहीं खोलीं, तो भव्यपुरा बावड़ी का यह मौन रुदन कल जयपुर के माथे पर विरासत के कत्ल का कभी न मिटने वाला कलंक बन जाएगा। सरकार और पुरातत्व विभाग को इस इतिहास को मलबे में दफन होने से पहले इसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now