राजधानी के निजी स्कूलों में शिक्षा अब ‘व्यापार’ बन चुकी है। नए शिक्षा सत्र के आगाज के साथ ही शहर के कई नामचीन स्कूलों में किताबों को लेकर एक बड़ा ‘कमीशन गेम’ चल रहा है। ‘Expose Now’ की पड़ताल और अभिभावकों की शिकायतों से सामने आया है कि स्कूलों ने प्रकाशकों के साथ मिलकर केवल किताबों का कवर और उनकी कीमतें बदलकर अभिभावकों को करोड़ों रुपए का चूना लगाने की तैयारी पूरी कर ली है।
कोर्स वही, लेकिन पुरानी किताबें ‘अवैध’
हैरानी की बात यह है कि कोर्स में कोई बड़ा बदलाव न होने के बावजूद निजी स्कूल अभिभावकों पर नई किताबें खरीदने का दबाव बना रहे हैं। केवल कवर बदलकर पुरानी किताबों को ‘अनुपयोगी’ घोषित कर दिया गया है।
- आर्थिक बोझ: जयपुर शहर के करीब 50 से अधिक बड़े सीबीएसई (CBSE) स्कूलों में 7 से 10 हजार रुपए तक का बुक-सेट बेचा जा रहा है। जिन परिवारों में दो बच्चे हैं, उन पर सालाना 20,000 रुपए तक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
नियम विरुद्ध खोले जा रहे ‘बुक काउंटर’
शिक्षा विभाग और सीबीएसई के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद कई स्कूल परिसर के भीतर ही किताबों के काउंटर खोलकर बैठे हैं।
- बाजार से दूरी: इन किताबों को जानबूझकर बाजार की सामान्य दुकानों पर उपलब्ध नहीं कराया जाता, ताकि अभिभावक स्कूलों या उनके द्वारा निर्धारित चुनिंदा दुकानों से ही महंगे दाम पर किताबें खरीदने को मजबूर हों।
- महंगी वसूली: बाजार रेट से कहीं अधिक वसूली इन काउंटरों पर की जा रही है, जिस पर विभाग फिलहाल मौन बना हुआ है।
अभिभावकों की पीड़ा: ग्राउंड जीरो से केस स्टडी
अभिषेक शर्मा (मानसरोवर): “स्कूल की ओर से दबाव बनाया जा रहा है कि किताबें स्कूल से ही खरीदी जाएं। पिछले साल की पुरानी किताबें घर में होने के बावजूद स्कूल प्रशासन ने उन्हें चलाने से साफ मना कर दिया है।”
रवि कोटिया (वैशाली नगर): “बेटे के स्कूल से निर्देश मिले हैं कि निर्धारित दुकान से ही किताबें लें। बाजार की दूसरी दुकानों पर ये किताबें मिलती ही नहीं हैं, ऐसे में इस लूट का शिकार होना हमारी मजबूरी बन गया है।”
समाधान: ‘बुक बैंक’ से मिल सकती है राहत
इस संगठित लूट से बचने के लिए अब कुछ जागरूक अभिभावक स्वयं आगे आ रहे हैं। शहर में छोटे समूहों में ‘बुक बैंक’ शुरू किए गए हैं, जहाँ पुरानी कक्षाओं की किताबें विद्यार्थियों से लेकर अगली कक्षा के बच्चों को निःशुल्क दी जा रही हैं। शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि सरकार और स्कूल बड़े स्तर पर इस ‘बुक बैंक मॉडल’ को अपनाएं, तो अभिभावकों को इस सालाना कमीशन के खेल से स्थायी राहत मिल सकती है।
