PHED का महा-घोटाला: जयपुर में 415 करोड़ का ‘अमृत’ टेंडर 3 बार निरस्त, अफसरों की मिलीभगत और चहेतों को उपकृत करने के खेल का ‘Expose Now’ पर सबसे बड़ा पर्दाफाश

-फाइलें वही, खेल नया: जब-जब पिछड़ती है पसंदीदा फर्म, तब-तब टेंडर में जानबूझकर छोड़ दी जाती हैं कानूनी कमियां

-राजधानी में ‘अमृत’ योजना बनी अफसरों की ‘कमाई का जरिया’, 8-8 शुद्धिपत्र छुपाकर RTPP नियमों की सरेआम उड़ाईं धज्जियां

-जयपुर मुख्यालय में नाक के नीचे चल रहा था ‘सेट गेम’, कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कारण बताओ नोटिस का झुनझुना, FIR से क्यों बच रहे उच्चाधिकारी?

जयपुर। जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग राजस्थान में भ्रष्टाचार, अफसरों की लापरवाही और चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का खेल किस कदर हावी है, इसका एक और सनसनीखेज प्रमाण सामने आया है। राजधानी जयपुर में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अमृत 2.0 योजना’ के तहत जयपुर नगर निगम ग्रेटर के अधिकार क्षेत्र में जलापूर्ति नेटवर्क को मजबूत करने के लिए जारी 415 करोड़ रुपये का मेगा टेंडर NIB No. 04/2025-26 विभाग के गले की फांस बन गया है।

‘Expose Now’ के हाथ लगे उच्च स्तरीय आधिकारिक दस्तावेजों से जो सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, वो यह है कि यह टेंडर कोई पहली बार नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही और अंदरूनी मिलीभगत के खेल के चलते अब तक 3 बार निरस्त (Annul) किया जा चुका है! बार-बार टेंडर रद्द होने का यह सिलसिला साफ इशारा करता है कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ा ‘खिलाड़ी’ बैठा है जो अपनी मनपसंद कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी और नियमों को पंगु बना रहा है। जब राजधानी जयपुर की नाक के नीचे 415 करोड़ के टेंडर का यह हाल है, तो पूरे प्रदेश में पीएचईडी की कार्यप्रणाली भगवान भरोसे ही चल रही है।

कागजों में सुधार, नियत में खोट, आखिर क्या है पूरा ‘खेल’?

‘Expose Now’ के पास मौजूद दस्तावेजों के पन्ने दर पन्ने खंगालने पर अधिकारियों की बदनीयती और नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाने की कहानी साफ नजर आती है। राजस्थान पारदर्शिता लोक उपापन अधिनियम (RTPP Act, 2012) को मज़ाक बनाकर रख दिया गया है:

-01 से लेकर 08 शुद्धिपत्र (Corrigendum) छुपाए गए: इस टेंडर प्रक्रिया के दौरान विभाग ने एक-दो नहीं, बल्कि 01 से लेकर 08 शुद्धिपत्र जारी किए। लेकिन सबसे बड़ा ‘खेला’ यहीं हुआ—इनमें से एक भी शुद्धिपत्र को स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित ही नहीं किया गया! यह RTPP नियम, 2013 के नियम 43(7) और 51(2) का सीधा, जानबूझकर किया गया उल्लंघन है।

-जानबूझकर पैदा की गईं कानूनी कमियां: विभागीय सूत्रों का कहना है कि जब-जब अफसरों की पसंदीदा कंपनी तकनीकी या वित्तीय बिड में पिछड़ने लगती है, या फिर किसी दूसरी कंपनी को टेंडर मिलने के आसार बनते हैं, तब-तब टेंडर में जानबूझकर ऐसी कानूनी और तकनीकी कमियां (जैसे शुद्धिपत्र न छापना, विज्ञापन गायब करना) छोड़ दी जाती हैं, ताकि बाद में आसानी से टेंडर को निरस्त किया जा सके। यह 3 बार टेंडर रद्द होना इसी ‘सेट गेम’ का हिस्सा है।

-फैट एकॉम्पली (Fait Accompli) का बहाना: कमेटी ने खुद माना कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह दूषित (Fait Accompli) हो चुकी थी, इसलिए इसे रद्द कर नए सिरे से फ्रेश बिड (Fresh Bid) आमंत्रित करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

इन 5 दिग्गज कंपनियों के बीच फंसा था पेंच:-

इस 415 करोड़ के महा-टेंडर की रेस में देश-प्रदेश की 5 बड़ी और रसूखदार कंपनियां शामिल थीं, जिनकी तकनीकी बोलियां 16.12.2025 को खोली गई थीं:

-मैसर्स डीएनसी इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (M/s DNC Infratech Pvt. Ltd.)

-मैसर्स जीसीकेसी प्रोजेक्ट्स एंड वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s GCKC Projects and Works Pvt. Ltd.)

-मैसर्स त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड (M/s Triveni Engineering and Industries Ltd.)

-मैसर्स विष्णु प्रकाश आर पुंगलिया लिमिटेड – मैसर्स विंध्या टेलीलिंक्स लिमिटेड (JV)

-मैसर्स एलएनए इन्फ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड – मैसर्स जीकेआर इन्फ्राकॉन (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (JV)

अंदरूनी गलियारों में चर्चा तेज है कि इन 5 कंपनियों में से किस ‘खास’ के लिए यह पूरी पटकथा बार-बार लिखी और बदली जा रही थी?

कार्रवाई के नाम पर फिर वही ‘खानापूर्ति’:-

3 बार टेंडर निरस्त होने के बाद जब पानी सिर से ऊपर चला गया और मामला पूरी तरह Expose हो गया, तो विभाग ने आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल के लिए टेंडर को निरस्त करने का निर्णय लिया है। साथ ही मामले कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति का खेल भी कर दिया:

-दोषी अफसरों को शो-कॉज नोटिस: इस महालापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी करने के आदेश दिए गए हैं (सवाल यह है कि 3 बार रद्द होने तक उच्च अधिकारी क्या सो रहे थे?)।

  • टेंडर निरस्त के 2-3 साल पुराने केसों की समीक्षा: विभाग ने अब आदेश दिया है कि पिछले 2 से 3 साल में जितने भी टेंडर रद्द हुए हैं, उनकी समीक्षा की जाए ताकि इस तरह की ‘गलतियों’ के पैटर्न को समझा जा सके।

-DIPR पर मढ़ने की कोशिश: विभाग ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि विज्ञापन प्रकाशन के लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR) को भेजा गया था, लेकिन खुद पीएचईडी के स्तर पर इसकी मॉनिटरिंग पूरी तरह शून्य क्यों थी, इसका कोई जवाब नहीं है।

‘Expose Now’ के तीखे और सीधे सवाल:

-सवाल 1: जो टेंडर विभागीय लापरवाही और संदिग्ध मिलीभगत के चलते 3 बार निरस्त हो चुका है, उसके जिम्मेदार इंजीनियरों और अधिकारियों पर अब तक एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं हुई? सिर्फ कारण बताओ नोटिस का झुनझुना क्यों?

-सवाल 2: क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है या फिर किसी ब्लैकलिस्टेड या अयोग्य चहेते संवेदक को बैकडोर एंट्री दिलाने के लिए जानबूझकर किया जा रहा टेंडर-टेंडर का खेल है?

-सवाल 3: जयपुर की जनता को अमृत योजना के तहत मिलने वाले शुद्ध पानी की परियोजना को इस आपसी खींचतान और भ्रष्टाचार की भेंट कब तक चढ़ाया जाता रहेगा?

जयपुर मुख्यालय में बैठकर जनता के करोड़ों रुपयों और जनहित की योजनाओं से खिलवाड़ करने वाले इन सफेदपोशों और इंजीनियरों के गठजोड़ को ‘Expose Now’ पूरी तरह बेनकाब करके रहेगा। इस घोटाले की कड़ियां बहुत ऊपर तक जुड़ी हैं, जिनकी परतों को हम लगातार उधेड़ते रहेंगे।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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