जल जीवन मिशन में महाघोटाला: ईसरदा-दौसा पेयजल परियोजना में 150 करोड़ का घोटाला, PHED इंजीनियर्स की ठेका कंपनी पर ‘शाही मेहरबानी’ के खेल पर ‘Expose Now’ का बड़ा खुलासा

-करोड़ों की ‘कमीशनखोरी’ का खेल: फेल साबित हुई कंपनी को पेनल्टी के बदले दिया जून, 2026 तक का ‘एक्सटेंशन’

-कंसलटेंट की ‘फर्जी’ DPR: जानबूझकर छोड़ी खामियां, ताकि बाद में इंजीनियर और ठेका कंपनी धो सकें बहती गंगा में हाथ

-FC फाइल पर दस्तखत कर फंसने का डर: खुद ने ही घोटाला माना और खुद ने ही बचाव के लिए लगा दी 5 शर्तें, दाल में काला नहीं— पूरी दाल ही काली !

Expose Now की Exclusive रिपोर्ट

जयपुर। राजस्थान के लाखों कंठों की प्यास बुझाने के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ (JJM) को पीएचईडी (PHED) के भ्रष्ट अधिकारियों और चहेती कंपनियों ने लूट का अड्डा बना दिया है। ‘ईसरदा-दौसा वृहद पेयजल परियोजना’ (Package-I) से जुड़ा एक ऐसा ही चौंकाने वाला सरकारी दस्तावेज ‘Expose Now’ के हाथ लगा है, जो चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि किस तरह जनता के पैसे को विभागीय इंजीनियरों, कंसलटेंट और दागी ठेका कंपनी ने मिलकर बंदरबांट की भेंट चढ़ा दिया है।

तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी काम अधूरा छोड़ने वाली कंपनी M/s SPML Infra Ltd (Kolkata) पर कार्रवाई करने के बजाय, PHED की ‘फाइनेंस कमेटी’ (FC) की बैठक में नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों रुपये की वित्तीय रेवड़ियां बांटी जा रही हैं।

ईसरदा-दौसा वृहद पेयजल परियोजना

-खेल नंबर 1: समय पर काम नहीं, फिर भी ‘मेहरबानी’ का एक्सटेंशन

सरकारी फाइलों के मुताबिक, इस महापरियोजना का वर्क आर्डर 24 मार्च 2022 को मैसर्स एसपीएमएल इंफ्रा लिमिटेड को जारी किया गया था। शर्त के मुताबिक कंपनी को 3 अप्रैल 2024 तक काम पूरा करके देना था। लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक देखिए—निर्धारित समयावधि बीतने के दो साल बाद भी कंपनी केवल 86% ही काम कर पाई है।

कायदे से काम में देरी के लिए कंपनी पर भारी पेनल्टी लगानी चाहिए थी और उसे ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए था। लेकिन अधिकारियों और ठेकेदार के बीच ‘अंडरटेबल’ सैटिंग का खेल ऐसा चला कि बिना किसी ठोस आधार के कंपनी को 30 जून 2026 तक का ‘प्रोविजनल टाइम एक्सटेंशन’ (समय सीमा विस्तार) तोहफे में दे दिया गया।

-खेल नंबर 2: ‘डेविएशन’ का खेल—69.42 करोड़ का अतिरिक्त सरकारी खजाना लुटाया

इस पूरे खेल की सबसे बड़ी कली ‘2nd Tentative Deviation Statement’ की मंजूरी है। पहले प्रथम डेविएशन के नाम पर करोड़ों रुपये बढ़ाए गए, और अब दूसरे डेविएशन के जरिए 69,42,31,243 रुपये (लगभग 69.42 करोड़) की अतिरिक्त राशि को मंजूरी दे दी गई है। 72 आइटम्स में मूल बीओक्यू (BOQ) से 50% तक की भारी बढ़ोतरी कर दी गई। 55 आइटम्स में तो बेशर्मी की हदें पार करते हुए 50% से भी अधिक की बढ़ोतरी की गई, जो सीधे-सीधे वित्तीय नियमों का उल्लंघन है। यही नहीं, 60 नए एक्स्ट्रा आइटम्स (Extra Items) को जोड़कर 33.74 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मलाई कंपनी की थाली में परोस दी गई।

-खेल नंबर 3: प्रथम विचलन (1st Deviation) के तहत दी गई अतिरिक्त राशि का पूरा गणित:

कुल स्वीकृत राशि (Capital Works): 1st deviation के बाद कुल पूंजीगत कार्य की राशि बढ़ाकर Rs. 1174,26,37,764.07 (लगभग 1174.26 करोड़ रुपये) कर दी गई थी। इसमें मूल वर्क ऑर्डर से Rs. 82,60,77,400.00 (82.60 करोड़ रुपये) अतिरिक्त (Excess) दिए गए थे। यह अतिरिक्त राशि, वर्क ऑर्डर की मूल कैपिटल कॉस्ट (पूंजीगत लागत) से 7.57% अधिक थी। यह बढ़ोतरी बीओक्यू (BOQ) आइटम्स की मात्रा में वृद्धि (Excess Quantities) और नए एक्स्ट्रा आइटम्स को जोड़ने के नाम पर की गई थी। नोट करने वाली बात ये है कि अब जो 2nd Deviation पास किया गया है (जिसमें कुल स्वीकृत राशि Rs. 1161,07,91,607.00 है), वह इस 1st Deviation की तुलना में 15.96% कम है। इसका साफ मतलब है कि पहले विचलन (1st deviation) में अधिकारियों ने कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को ताक पर रखकर और भी ज्यादा अंधाधुंध पैसा (82.60 करोड़ रुपये) बढ़ाया था!

-कंसलटेंट की ‘लापरवाही’ या भ्रष्टाचार का सुनियोजित ब्लूप्रिंट?

विभागीय बैठक की मिनट्स (Minutes of Meeting) खुद इस बात को स्वीकार करती हैं कि प्रोजेक्ट की डीपीआर (DPR) बनाने वाले कंसलटेंट ने घोर लापरवाही और मिलीभगत की। रेलवे क्रॉसिंग (दौसा-गंगापुर रेलवे लाइन) पर पहले ‘आरसीसी ओवर ब्रिज’ का प्रस्ताव था, जिसे बाद में ‘कंपोजिट गर्डर ब्रिज’ में बदल दिया गया। मोरेल नदी और टापुर नदी क्रॉसिंग के नाम पर करोड़ों के नए काम निकाल दिए गए।

कमेटी ने खुद माना कि मूल बीओक्यू और वास्तविक काम में इतना बड़ा अंतर कंसलटेंट की मिलीभगत और लापरवाही को दर्शाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब डीपीआर ही गलत या फर्जी थी, तो पीएचईडी के तकनीकी विंग के आला अधिकारी तब क्या आंखें बंद करके दस्तखत कर रहे थे? साफ है कि शुरुआत से ही प्रोजेक्ट की लागत को बाद में ‘डेविएशन’ के जरिए बढ़ाकर भ्रष्टाचार करने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया था।

-कमेटी ने खुद लगाई शर्तों की ‘लगाम’—दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली!

भ्रष्टाचार के इस खेल पर पर्दा डालने के लिए फाइनेंस कमेटी ने मंजूरी तो दे दी, लेकिन अपनी खाल बचाने के लिए कुछ बेहद गंभीर शर्तें (Riders) भी लगा दी हैं, जो इस घोटाले पर मुहर लगाती हैं:

-50% से अधिक डेविएशन वाले 55 आइटम्स को बिना प्रशासनिक विभाग (Administrative Department) की पूर्व अनुमति के निष्पादित नहीं किया जाएगा।

-इंजीनियर-इन-चार्ज (EIC) को आदेश दिया गया है कि वह बढ़े हुए और एक्स्ट्रा आइटम्स की 10% भौतिक जांच खुद मौके पर जाकर करेगा, और इसके बिना ठेकेदार को एक रुपये का भी भुगतान (Running Bill) नहीं होगा।

-प्रोजेक्ट की मूल लागत में गड़बड़ी करने वाले DPR कंसलटेंट के खिलाफ सख्त कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट अगली टेक्निकल कमेटी में रखने के निर्देश दिए गए हैं।

Expose Now के तीखे सवाल:

सवाल 1: जो ठेका कंपनी 2024 तक काम पूरा नहीं कर पाई, उसे डिफाल्टर घोषित करने के बजाय पीएचईडी प्रशासन मेहरबान क्यों है?

सवाल 2: डीपीआर बनाने में हुई कथित लापरवाही पर शुरुआती स्तर पर ही अधिकारियों ने आपत्ति क्यों नहीं जताई? क्या इसमें चीफ इंजीनियर से लेकर नीचे तक के अधिकारियों की मूक सहमति थी?

सवाल 3: क्या भजनलाल सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच, जल जीवन मिशन को दीमक की तरह चाट रहे इन भ्रष्ट अधिकारियों और SPML इंफ्रा लिमिटेड जैसी कंपनियों पर विजिलेंस या एसीबी (ACB) की गाज गिरेगी?

‘Expose Now’ इस महाघोटाले के हर एक किरदार और भुगतान की जा रही फाइलों पर पैनी नजर बनाए हुए है। जनता के हक के पानी के पैसे पर कुंडली मारकर बैठे इन सफेदपोश मगरमच्छों का पर्दाफाश होना अभी बाकी है। (क्रमश: …)

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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