लाडपुरा तहसील में भ्रष्टाचार और मिलीभगत का एक बड़ा मामला सामने आया है। यहाँ के तहसीलदार राजवीर यादव ने राष्ट्रीय राजमार्ग-27 (NH-27) पर स्थित पंचायत समिति की बेशकीमती 25 बीघा जमीन, जिसकी बाजार कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये आंकी जा रही है, एक निजी व्यक्ति के नाम नामांतरित कर दी है। यह जमीन पिछले 43 वर्षों से लाडपुरा पंचायत समिति के कब्जे में थी और इस पर मंदिर माफी (भगवान मथुराधीश) का अधिकार था।
मामले का खुलासा और प्रशासनिक कार्रवाई
इस गंभीर अनियमितता का खुलासा 10 फरवरी 2026 को एक शिविर के दौरान हुआ, जब एक व्यक्ति ने जमीन पर अपना दावा पेश किया। बीडीओ शैलेश रंजन ने जब रिकॉर्ड की जांच करवाई, तो सामने आया कि तहसीलदार ने 10 मार्च 2025 को नामांतरण संख्या 1072 के जरिए यह जमीन राजन जॉन नामक व्यक्ति के नाम कर दी है। लाडपुरा बीडीओ ने इस नामांतरण को अवैध बताते हुए कलेक्टर और जिला परिषद सीईओ को रिपोर्ट भेजी है। साथ ही, एसडीएम कोर्ट में नामांतरण निरस्त करने के लिए वाद दायर कर दिया गया है।
जमीन का तकनीकी विवरण (खसरा नंबर)
जांच में सामने आया है कि इस जमीन का रिकॉर्ड में इंद्राज इस प्रकार है:
| विवरण | जानकारी |
| खसरा संख्या | 48/190, 52/1.15 और 53/0.68 |
| खाता संख्या | 265 |
| कुल रकबा | 3.73 हेक्टेयर (लगभग 25 बीघा) |
| लोकेशन | NH-27 (प्राइम लोकेशन) |
इतिहास: 1982 से पंचायत समिति का अधिकार
रिकॉर्ड के अनुसार, राज्य सरकार ने 24 फरवरी 1982 को यह जमीन पंचायत समिति को देने की स्वीकृति दी थी। पंचायत समिति ने बाकायदा 23 जून 1984 को 10 हजार रुपये और 27 मार्च 1985 को 30 हजार रुपये का चालान (संख्या 77 और 130) मथुराधीश मंदिर के कोष में जमा करवाया था।
विवादित पक्ष: तहसीलदार और लाभार्थी के तर्क
जहाँ एक तरफ प्रशासन इसे अवैध बता रहा है, वहीं तहसीलदार राजवीर यादव का कहना है कि उन्होंने सारा काम नियमानुसार किया है और जमीन संबंधित व्यक्ति के परिवार के नाम पहले से दर्ज थी। दूसरी ओर, लाभार्थी राजन जॉन का दावा है कि उसके पास जमीन के सभी पुख्ता दस्तावेज हैं और उसके वकील ने उसे जमीन हस्तांतरण की पुष्टि की है।
“पंचायत समिति 43 साल से इस जमीन पर खेती कर रही है। तहसीलदार ने गलत तरीके से इसका नामांतरण किया है। हमने इसे निरस्त कराने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।”
— शैलेश रंजन, बीडीओ, पंचायत समिति लाडपुरा
इस मामले ने एक बार फिर राजस्व विभाग के कामकाज और ‘सिस्टम’ की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबकी नजरें एसडीएम कोर्ट के फैसले और कलेक्टर द्वारा की जाने वाली संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई पर टिकी हैं।
