EXPOSE NOW SPECIAL: राजस्थान में ‘रोजगार’ का रिपोर्ट कार्ड; 1 लाख को मिली ‘मंज़िल’, लेकिन 2 लाख युवाओं की सांसें अब भी सिस्टम के ‘पेंच’ में अटकीं!

By Admin

दो साल, सरकारी भर्तियों का लेखा-जोखा और पढ़िए सिस्टम के भीतर का पूरा सच

जयपुर। राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने में ‘सरकारी नौकरी’ महज एक आजीविका का साधन नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का पर्याय है। जब भी रोजगार की बात चलती है, तो अक्सर सरकारी फाइलों में आंकड़े दौड़ने लगते हैं। लेकिन हाल ही में प्रशासनिक गलियारों से निकलकर आए एक्सक्लूसिव डेटा ने प्रदेश में रोजगार की स्थिति की एक बेहद साफ और मिली-जुली तस्वीर पेश की है।

Expose Now के पास मौजूद यह रिपोर्ट केवल 1.73 लाख विज्ञप्तियों की संख्या नहीं है, बल्कि उन लाखों अरमानों का हिसाब-किताब है जो पिछले दो वर्षों से सरकारी दफ्तरों की चौखट पर दस्तक दे रहे थे। यह उस ‘पिरामिड’ की कहानी है जिसके शिखर पर 1 लाख युवा तो पहुंच गए, लेकिन आधार में फंसे लाखों अभ्यर्थी अब भी संघर्ष की कतार में खड़े हैं।

1. नियुक्तियों का ‘ट्रिपल-ए’ (AAA) फॉर्मूला: कहां पलटी किस्मत?

पिछले 24 महीनों के रिकॉर्ड को खंगालें तो पता चलता है कि सरकार ने तीन प्रमुख ‘A’ श्रेणी (Administrative, Academic, Assistant services) के विभागों में नियुक्तियों की झड़ी लगाई है। सबसे ज्यादा जोर ‘सोशल सिक्योरिटी’ और ‘पब्लिक सर्विस’ पर रहा है:

  • हेल्थ वॉरियर्स की नई फौज: चिकित्सा विभाग में 31,162 नियुक्तियां देकर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ‘हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर’ उनकी टॉप प्रायोरिटी है। इसमें खासतौर पर NHM के तहत ग्रामीण इलाकों के लिए हुई भर्तियों ने गेम-चेंजर का काम किया है।
  • शिक्षा की नींव हुई मजबूत: प्रदेश के भविष्य को गढ़ने वाले प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग में कुल 21,669 युवाओं ने जॉइनिंग ली है। इसमें वरिष्ठ अध्यापकों और कंप्यूटर अनुदेशकों की बड़ी संख्या शामिल है, जो लंबे समय से नियुक्तियों की बाट जोह रहे थे।
  • खाकी का विस्तार: कानून व्यवस्था को चुस्त करने के लिए गृह विभाग (पुलिस) ने 12,219 पदों पर नियुक्तियां दी हैं, जिससे थानों में नफरी की पुरानी समस्या से काफी हद तक राहत मिली है।

2. ‘पाइपलाइन’ का दर्द: 1.54 लाख नौकरियां आखिर फंसी कहां हैं?

इस रिपोर्ट का सबसे अहम और चिंताजनक पहलू वह ‘वेटिंग रूम’ है, जहां 1,54,175 पद आज भी ‘प्रक्रियाधीन’ (Under Process) के बोर्ड के साथ लटके हुए हैं। हमारी पड़ताल में सामने आया है कि ये भर्तियां सिस्टम के तीन बड़े रोड़ों में उलझी हैं:

  1. न्यायालयों में लंबित मामले (Litigation),
  2. दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) की धीमी रफ्तार,
  3. और परीक्षा कैलेंडरों की आपस में ओवरलैपिंग।

यही वजह है कि पशु परिचर (5,934 पद) और पटवारी (3,705 पद) जैसी बहुप्रतीक्षित भर्तियों के अभ्यर्थी आज भी असमंजस में हैं। उनके लिए यह आंकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि एक अंतहीन ‘सस्पेंस’ बन गया है।

3. ‘द वॉइड’: वे 51,893 खाली कुर्सियां जो सिस्टम को मुंह चिढ़ा रही हैं

प्रक्रियाधीन भर्तियों से इतर, सरकारी महकमे में एक बड़ा खालीपन (Void) भी है। एक्सक्लूसिव डेटा बताता है कि 51,893 पद ऐसे हैं जो पूरी तरह रिक्त पड़े हैं और जिन पर धूल जम रही है। इन रिक्तियों का खामियाजा सीधे जनता भुगत रही है:

विभाग/पदरिक्त पदग्राउंड रिपोर्ट
नगर पालिका (सफाईकर्मी)24,793शहरों में कचरे के ढेर और ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह बदहाल।
शिक्षा विभाग (स्कूल)20,000कई सरकारी स्कूलों में स्टाफ नहीं, एक शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल।
पुलिस (कांस्टेबल)4,000बीट सिस्टम कमजोर, अपराध नियंत्रण में पुलिस को आ रही चुनौती।
प्रशासन (RAS/Tax)500एसडीएम-तहसीलदार स्तर पर मैनपावर की कमी, काम का अतिरिक्त बोझ।

4. सिस्टम का तर्क: ‘सतत् प्रक्रिया’ या मजबूरी?

इस लेटलतीफी पर सरकार का अपना तर्क है। उनका कहना है कि भर्ती एक ‘सतत् प्रक्रिया’ (Continuous Process) है और वे युवाओं के प्रति प्रतिबद्ध हैं। लेकिन यह तकनीकी शब्दावली उन युवाओं को रास नहीं आ रही जो ‘ओवरएज’ (Age Limit) होने की दहलीज पर खड़े हैं।

हालांकि, राहत की खबर यह है कि सरकार ने आगामी 2026 के लिए रोडमैप तैयार किया है:

  • बड़ी उम्मीदें: ‘कनिष्ठ सहायक’ के 10,644 पदों और ‘प्रयोगशाला सहायक’ के 804 पदों पर जल्द ही प्रक्रिया तेज होने के संकेत हैं।

एक्सक्लूसिव इनसाइट: अगले 6 महीने क्यों हैं निर्णायक?

Expose Now को सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आने वाले 6 महीने बेरोजगारों के लिए बेहद खास होने वाले हैं। स्वायत्त शासन विभाग में फंसी 24,793 सफाई कर्मचारियों की भर्ती और शिक्षा विभाग में 20,000 रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार नए सिरे से ‘रिक्रूटमेंट कैलेंडर’ तैयार कर रही है।


रिपोर्टर की टिप्पणी: “आंकड़ों की इस बाजीगरी के बीच कड़वा सच यही है कि 1 लाख परिवारों में तो खुशियां आ गई हैं, लेकिन 2 लाख से अधिक युवा अब भी सिस्टम की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। अब देखना यह है कि यह ‘इंतज़ार’ खत्म होता है या फिर फाइलों में ही दफ्न होकर रह जाता है।”

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