-खाकी की कार्यप्रणाली पर गहराया संदेह: 5 वर्षों में दर्ज हुए 2,02,500 मुकदमे, करीब 45% मामलों पर फाइनल रिपोर्ट की मुहर लगाकर बंद की गईं फाइलें
-सालों से अधर में अटका इंसाफ: पुलिस मुख्यालय के कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद 2,253 मामलों में अब तक पूरी नहीं हो सकी जांच
-अदालतों में सजा की दर बेहद चिंताजनक: विशेष अदालतों में दोषसिद्धि का आंकड़ा महज 35-36% पर सिमटा, 100 में से लगभग 65 आरोपी हो रहे बरी
-कागजों तक सिमटी अफसरों की एसओपी: 15 दिन में चालान और त्वरित कार्रवाई के आदेशों के बीच जिलों में लगातार बढ़ता रहा अपराध का ग्राफ
जयपुर। राजस्थान में महिला सुरक्षा, स्वाभिमान और सशक्तिकरण के दावों की जमीनी हकीकत उजागर हो गई है। ‘Expose Now’ के इन्वेस्टिगेशन विंग के विस्तृत आंकड़ों ने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली, जांच प्रक्रिया और मुकदमों के निस्तारण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विगत पांच वर्षों (2021 से 2025) के दौरान प्रदेश भर में महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार से संबंधित कुल 2,02,500 आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए हैं। यानी रोजाना औसतन 110 से अधिक महिलाएं प्रताड़ना, उत्पीड़न और हिंसा की शिकायत लेकर थानों की चौखट तक पहुंचीं। लेकिन चौंकाने वाला पहलू यह है कि दर्ज मामलों में से लगभग आधे मुकदमों—91,269 मामलों—में पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट (FR) पेश कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इस बड़े खुलासे के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जांच एजेंसियां मुकदमों के निपटारे के लिए त्वरित रूप से ‘एफआर’ का रास्ता चुन रही हैं, या फिर साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया में ढिलाई के चलते इंसाफ की गुहार अनसुनी रह जाती है? ‘Expose Now’ इस विशेष पड़ताल में बिंदुवार विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा है।
5 साल में 2.02 लाख से अधिक केस, साल-दर-साल दर्ज अपराधों का ब्योरा:-
दस्तावेजों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में महिला अत्याचार के मामलों का ग्राफ लगातार गंभीर बना रहा:
-वर्ष 2021: कुल 40,831 प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें से पुलिस ने 22,518 मामलों में चालान पेश किया, जबकि 18,262 प्रकरणों में एफआर लगाई गई और 51 मामले लंबित रहे।
-वर्ष 2022: कुल 43,814 मामले सामने आए। इनमें से 23,870 में चालान हुआ, 19,831 मामलों में एफआर दी गई तथा 113 मामलों में जांच अधूरी रही।
-वर्ष 2023: कुल 42,174 मुकदमे दर्ज हुए। पुलिस ने 22,590 मामलों में अदालत में चालान पेश किया, 19,397 में एफआर लगाई और 187 मामले पेंडिंग रहे।
-वर्ष 2024: कुल 37,700 प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें से 19,805 मामलों में चालान, 17,474 मामलों में एफआर और 421 मामले लंबित दर्ज किए गए।
-वर्ष 2025: कुल 37,981 मुकदमे दर्ज हुए। इस दौरान 20,195 में चालान पेश हुआ, 16,305 में एफआर लगी और 1,481 मामलों में तफ्तीश पूरी नहीं हो पाई।
-पांच वर्षों का कुल योग (2021-2025): कुल 2,02,500 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1,08,978 मामलों में चालान पेश किया गया, 91,269 मामलों में एफआर लगाई गई और 2,253 मामलों में जांच प्रक्रिया अभी भी चल रही है।
91 हजार से ज्यादा मुकदमों में FR, जांच की गुणवत्ता या केस क्लोजर की होड़:-
‘Expose Now’ की पड़ताल का सबसे प्रमुख बिंदु यह है कि कुल दर्ज मामलों में से लगभग 45.07 प्रतिशत मामलों में पुलिस द्वारा FR लगा दी गई।
-91 हजार से अधिक मामलों का अंतिम रिपोर्ट के साथ बंद होना जांच तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।
-क्या थानों में मामलों की प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज होते ही गुणवत्तापूर्ण वैज्ञानिक और फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाए जाते हैं?
-विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर साक्ष्य एकत्र न होने, गवाहों के बयान में देरी और जांच अधिकारियों की सुस्ती के चलते अनेक प्रकरण अदालत में सुनवाई योग्य नहीं बचते, जिसके परिणामस्वरूप FR का सहारा लिया जाता है।
-यदि इतने बड़े पैमाने पर मामले असत्य पाए गए, तो झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों पर कानूनी कार्रवाई की गति क्या रही? और यदि मामले सही थे, तो ठोस साक्ष्यों के अभाव में पीड़िताएं न्याय से वंचित क्यों रह गईं?
संवेदनशील जिलों की स्थिति: अलवर, भरतपुर, जयपुर, भीलवाड़ा और अजमेर में सर्वाधिक मामले:-
जिलों के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि राज्य के कुछ प्रमुख जिलों में महिला अत्याचार के मामलों की संख्या लगातार अत्यधिक बनी रही:
-अलवर:
-वर्ष 2021: 1,963 दर्ज (1,000 चालान, 961 एफआर)
-वर्ष 2022: 2,234 दर्ज (1,116 चालान, 1,115 एफआर)
-वर्ष 2023: 2,007 दर्ज (1,005 चालान, 995 एफआर)
-वर्ष 2024: 1,737 दर्ज (825 चालान, 893 एफआर)
-वर्ष 2025: 1,596 दर्ज (720 चालान, 830 एफआर)
(अलवर जिले में दर्ज मामलों में लगभग आधे मामलों में लगातार एफआर का अनुपात देखा गया)।
भरतपुर:
वर्ष 2021 में 1,813, 2022 में 1,979, 2023 में 1,728, 2024 में 1,661 और 2025 में 1,441 मामले सामने आए। यहाँ भी 45 से 50 प्रतिशत मुकदमों में एफआर दर्ज की गई।
भीलवाड़ा और अजमेर:
-भीलवाड़ा में पांच वर्षों के दौरान लगातार 1,400 से 1,870 से अधिक मुकदमे दर्ज होते रहे (2021 में 1,543, 2022 में 1,868, 2023 में 1,879, 2024 में 1,411, 2025 में 1,474)।
-अजमेर में प्रतिवर्ष औसतन 1,250 से 1,460 मामले दर्ज किए गए (2021 में 1,459, 2022 में 1,463, 2023 में 1,363, 2024 में 1,251, 2025 में 1,322)।
जयपुर संभाग व कमिश्नरेट:-
जयपुर के चारों कमिश्नरेट क्षेत्रों (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) और जयपुर ग्रामीण को मिलाकर हर साल औसतन 3,500 से 4,000 मामले दर्ज हुए। कमिश्नरी व्यवस्था के बावजूद मुकदमों की संख्या में अपेक्षित कमी देखने को नहीं मिली।
अन्य प्रमुख जिले:-
गंगानगर में वर्ष 2022 में 1,437, 2023 में 1,467 और 2025 में 1,508 मामले दर्ज हुए।
सीकर में सालाना 1,150 से 1,380 मामले दर्ज हुए।
उदयपुर में वर्ष 2022 में 1,529 और 2023 में 1,628 प्रकरण दर्ज किए गए।
2,253 मामलों में जांच अधर में:-
वर्षों पुरानी पेंडेंसी पर सवालसरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कुल 2,253 आपराधिक मामलों में अनुसंधान प्रक्रिया अब तक प्रचलित है:
-वर्ष 2021 के 51 मामले और वर्ष 2022 के 113 मामले अब भी थानों की जांच में लंबित हैं।
-वर्ष 2023 के 187, वर्ष 2024 के 421 और वर्ष 2025 के 1,481 मामलों का अंतिम निस्तारण नहीं हो सका है।
-गंभीर मामलों में तय समयसीमा के भीतर चालान या अंतिम रिपोर्ट पेश करने के कड़े नियम होने के बाद भी तीन से चार साल तक फाइलों का लंबित रहना जांच अधिकारियों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है।
कनविक्शन रेट महज 35-36%, अदालतों में साबित नहीं हो पा रहे अपराध:-
‘Expose Now’ की पड़ताल में सामने आया कि जो मामले अदालत तक पहुंचते हैं, उनमें भी सजा की दर बेहद निराशाजनक है:
-महिला उत्पीड़न के नियमित कैडर के दो न्यायालयों के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में अपराधियों की दोषसिद्धि की दर केवल 35.42 प्रतिशत रही।
-मार्च 2026 तक यह दर मामूली बढ़ोतरी के साथ 36.67 प्रतिशत दर्ज की गई।
-इसका सीधा अर्थ है कि अदालत तक पहुंचे 100 मामलों में से करीब 64 से 65 मामलों में आरोपी कानूनी सजा से बच निकलते हैं।
-अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्यों की प्रभावी पैरवी न होना, स्वतंत्र गवाहों का अभाव और केस डायरी में तकनीकी खामियां इस कम कनविक्शन रेट के मुख्य कारण माने जा रहे हैं।
कागजों में सिमटे पुलिस मुख्यालय के परिपत्र और एसओपी:-
जांच प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित बनाने के लिए पुलिस मुख्यालय तथा नागरिक अधिकार शाखा द्वारा समय-समय पर कई दिशा-निर्देश जारी किए गए:
-समयबद्ध जांच के निर्देश: परिपत्रों के तहत गंभीर महिला अपराधों में 15 से 30 दिवस के भीतर अनुसंधान पूर्ण कर चालान पेश करने और अधिक समय लगने पर उच्चाधिकारियों से विधिवत अनुमति लेने के निर्देश दिए गए थे।
-सुपरवाइजरी नोट और त्वरित बयान: घटना के 24 घंटे में सुपरवाइजरी नोट और 48 घंटे में धारा 164 के तहत न्यायिक बयान कराने के आदेश थे।
-स्पेशल इन्वेस्टिगेशन यूनिट (SIUCAW): रेंज व जिला स्तर पर महिला अत्याचार के गंभीर मामलों के पर्यवेक्षण हेतु विशेष यूनिट्स का गठन किया गया।
-मानक संचालन प्रक्रिया (SOP – BNSS 2023): नए कानूनों के तहत महिला अधिकारियों द्वारा बयान दर्ज करने, जीरो एफआईआर पर तत्काल साक्ष्य संकलन, 24 घंटे में मेडिकल और 2 माह में दुष्कर्म मामलों की जांच पूर्ण करने की व्यवस्था दी गई।
-इन तमाम विस्तृत दिशानिर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर हजारों मामलों का वर्षों तक लंबित रहना और दोषसिद्धि की दर का 36% के आसपास रुक जाना यह दर्शाता है कि नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन थानों के स्तर पर सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है।
जांच प्रणाली पर उठते 5 गंभीर सवाल:-
-जब 2 लाख में से 91 हजार से अधिक मामलों में एफआर लगाई जा रही है, तो क्या इस प्रक्रिया की उच्चस्तरीय स्वतंत्र समीक्षा नहीं होनी चाहिए?
-तय समयसीमा के बावजूद वर्ष 2021 और 2022 के मामले अब तक थानों में पेंडिंग क्यों पड़े हैं? विशेष अदालतों के गठन के बाद भी दोषसिद्धि की दर 35-36% तक ही क्यों सीमित है?
-अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा और जयपुर जैसे जिलों में अपराध के मामलों पर प्रभावी रोकथाम क्यों नहीं हो पा रही है?
पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी किए जाने वाले सर्कुलर और एसओपी का पालन थानों में सुनिश्चित कराने के लिए निगरानी तंत्र कितना सक्रिय है?
‘Expose Now’ की इस पड़ताल से स्पष्ट है कि राज्य में महिला सुरक्षा के मुद्दे पर केवल आंकड़े दर्ज कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। दर्ज मामलों के आधे हिस्से पर FR का लग जाना और अदालतों में अधिकांश आरोपियों का बरी हो जाना समूचे जांच और अभियोजन तंत्र के पुनरावलोकन की मांग करता है। जब तक थानों में त्वरित साक्ष्य संकलन, समयबद्ध विवेचना और अदालतों में मजबूत पैरवी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक सुरक्षा के दावे कागजी निर्देशों से आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now