देश के लिए जुलाई महीने की शुरूआत एक नए अध्याय के साथ हुई है। केंद्र सरकार ने विदेशी चंदे को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 (FCRA 2.O) लागू कर दिए हैं। नए नियमों के तहत अब धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए विदेश से मिलने वाले फंड की निगरानी पहले से कहीं ज्यादा सख्त होगी।
सरकार का कहना है कि इन नए नियमों का मकसद विदेशी धन के उपयोग को अधिक पारदर्शी (transparent), जवाबदेह (accountable) और व्यवस्थित बनाना है ताकि उस धन इस्तेमाल सिर्फ घोषित और वैध उद्देश्यों के लिए ही हो। नए नियमों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट परिभाषा, धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध, विदेशी नागरिकों की भूमिका पर सख्ती, सोशल मीडिया खातों के खुलासे और विदेशी फंड के उपयोग को लेकर किया गया है।

समझिए… क्या है FCRA?
FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (Foreign Contribution Regulation Act) वह कानून है जिसके तहत भारत में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन (NGOs), ट्रस्ट, सोसाइटी और अन्य संस्थाएं विदेश से आर्थिक सहायता प्राप्त करती हैं। यह कानून पहली बार साल 1976 में लागू किया गया था। साल 2010 में इसे नए स्वरूप में लागू किया गया। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक हित के खिलाफ न हो। FCRA पंजीकरण की वैधता अवधि 5 वर्ष होती है। इस अवधि के बाद उसका नवीनीकरण कराना जरूरी होता है।
अबकी बार,पहली बार- धार्मिक गतिविधियों की स्पष्ट सूची

धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों पर पूर्ण पाबंदी
नए नियमों का सबसे अहम पहलू धर्मांतरण (Conversion) से जुड़ी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध है। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी धन का उपयोग किसी भी प्रकार की धर्मांतरण गतिविधि में नहीं किया जा सकेगा। यानि, किसी व्यक्ति या समुदाय को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने, प्रोत्साहित करने या सहायता देने वाली गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी। हालांकि, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, आध्यात्मिक कार्यक्रम, ध्यान शिविर, सत्संग और प्रवचन जैसी गतिविधियों की अनुमति रहेगी।
सरकार का मानना है कि इससे विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिलेगी और विवादित गतिविधियों पर अंकुश लगेगा।
‘की फंक्शनरी’ की नई व्याख्या
संशोधित नियमों में “Key Functionary” शब्द को नई परिभाषा के साथ शामिल किया गया है। अब किसी संस्था के निदेशक, ट्रस्टी, साझेदार, पदाधिकारी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता, प्रबंधन समिति के सदस्य और संस्था के संचालन एवं नियंत्रण से जुड़े अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों को भी जवाबदेही के दायरे में लाया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी संस्था में निर्णय लेने वाले और उसे संचालित करने वाले प्रमुख लोगों की स्पष्ट पहचान हो और यदि नियमों का उल्लंघन होता है तो जिम्मेदारी तय की जा सके।
पंजीकरण में उद्देश्य और कार्यक्षेत्र बताना MUST
अब FCRA पंजीकरण प्राप्त करने वाली प्रत्येक संस्था को यह स्पष्ट करना होगा कि वह





- विदेशी धन किस उद्देश्य के लिए प्राप्त करना चाहती है।
- किन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अपनी गतिविधियां संचालित करेगी।
संस्थाओं को सरकार की ओर से निर्धारित अनुसूची में शामिल उद्देश्यों में से ही उद्देश्य का चयन करना होगा। जो संस्थाएं पहले से पंजीकृत हैं, उन्हें भी एक साल के अंदर अपनी गतिविधियों और कार्यक्षेत्र की जानकारी सरकार को देनी होगी। इससे सरकार को यह समझने में आसानी होगी कि कौन-सी संस्था किस उद्देश्य के लिए और देश के किस हिस्से में विदेशी फंड का उपयोग कर रही हैं।
विदेशी नागरिकों पर सख्ती
नए नियमों के अनुसार जिन संस्थाओं में भारतीय मूल के अलावा अन्य विदेशी नागरिक प्रमुख पदों पर होंगे, उन्हें सामान्य रूप से FCRA पंजीकरण नहीं दिया जाएगा। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अनुमति दे सकती है। सरकार का मानना है कि यह प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विदेशी फंड की अगली किस्त के लिए नई शर्त
नियमों के तहत अब किसी संस्था को विदेशी फंड की दूसरी या अगली किस्त तभी मिलेगी, जब वह पहले प्राप्त फंड का कम-से-कम 75 प्रतिशत उपयोग कर चुकी होगी। इसके लिए निम्न दस्तावेज उपलब्ध करवाने होंगे या देने होंगे-
• चार्टर्ड अकाउंटेंट का उपयोगिता प्रमाणपत्र
• बैंक खाते का विवरण
• खर्च का रिकॉर्ड
• गतिविधियों की रिपोर्ट
• आवश्यक होने पर फोटो और अन्य दस्तावेज
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन लंबे समय तक खातों में निष्क्रिय न पड़ा रहे और उसका उपयोग उसी उद्देश्य के लिए हो, जिसके लिए उसे स्वीकृति मिली है।
सोशल मीडिया और प्रकाशनों का खुलासा अनिवार्य
संशोधित नियमों के तहत अब विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले NGOs और अन्य संस्थाओं को अपनी-
1 आधिकारिक वेबसाइट
2 सोशल मीडिया अकाउंट
3 पुस्तकों
4 पत्रिकाओं
5 समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख
6 अन्य प्रकाशनों
की जानकारी भी सरकार को देनी होगी। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं की गतिविधियों की निगरानी आसान होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।
शुल्क व्यवस्था में भी बदलाव
सरकार ने पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में भी बदलाव किया है। यदि कोई संस्था एक से अधिक राज्यों में काम करना चाहती है या एक से अधिक उद्देश्यों के लिए पंजीकरण कराना चाहती है, तो उसे अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संस्थाओं को अपने कार्यक्षेत्र और उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से तय करने के लिए प्रेरित करना है।

FCRA 2.O पर किसकी क्या प्रतिक्रिया है?
कुछ ईसाई संगठनों और चर्च से जुड़े समूहों ने इसपर चिंता जताई है। उनका कहना है कि नए नियमों से धार्मिक और सामाजिक सेवा से जुड़े संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है। साथ ही वो ये भी जोड़ते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाले कई संस्थान विदेशी सहायता पर निर्भर हैं, अत्यधिक निगरानी उनके कामकाज को प्रभावित कर सकती है.
इधर, NGO और नागरिक समाज संगठनों का कहना है कि पहले से ही जटिल अनुपालन व्यवस्था अब और कठिन हो जाएगी। वे आशंका जताते हैं कि छोटी संस्थाओं के लिए रिपोर्टिंग और दस्तावेजीकरण का बोझ बढ़ सकता है।