जयपुर। राजस्थान में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और ग्रामीण विकास की मजबूत नींव रखने वाले कृषि विश्वविद्यालय आज स्वयं गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक संकट के भंवर में फंसे हैं। इसका सबसे दर्दनाक और प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव उन हजारों सेवानिवृत्त शिक्षकों, वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों पर पड़ रहा है, जिन्होंने प्रदेश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज हालात यह हैं कि बुढ़ापे की लाठी कही जाने वाली वैधानिक पेंशन और सुविधाओं के लिए इन बुजुर्गों को सरकार के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है और अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
प्रदेश के ये प्रमुख विश्वविद्यालय वित्तीय संकट की चपेट में
राजस्थान के लगभग सभी प्रमुख कृषि विश्वविद्यालय इस समय वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MPUAT), उदयपुर
- स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (SKRAU), बीकानेर
- श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (SKNAU), जोबनेर
- कृषि विश्वविद्यालय, कोटा
- कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर
इन संस्थानों के पेंशनर वर्षों से समय पर पेंशन, महंगाई राहत (DR) और वेतन पुनरीक्षण (Pay Revision) के लाभों के भुगतान के लिए दर-दर भटक रहे हैं। कई मामलों में तो बुजुर्गों को अपने संवैधानिक अधिकार के लिए उच्च न्यायालयों की शरण लेनी पड़ी है।
तुलना: क्यों पारंपरिक विश्वविद्यालयों की तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकते कृषि विश्वविद्यालय?
इस संकट की सबसे बड़ी वजह यह है कि सरकार कृषि विश्वविद्यालयों को भी उसी वित्तीय पैमाने से आंकती है, जिससे सामान्य (पारंपरिक) विश्वविद्यालयों को देखा जाता है। व्यवस्थापिका और आर्थिक दृष्टि से यह सोच पूरी तरह गलत है, जिसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| पैमाना | पारंपरिक विश्वविद्यालय (जैसे- राजस्थान विवि) | कृषि विश्वविद्यालय (जैसे- बीकानेर कृषि विवि) |
| मुख्य कार्य | मुख्यतः केवल शिक्षण (Teaching) तक सीमित। | शिक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान (Research) और प्रसार (Extension) तीनों। |
| छात्रों की संख्या | लाखों में (फीस से भारी आय)। | प्रयोगात्मक व व्यावहारिक प्रशिक्षण के कारण बेहद सीमित छात्र। |
| संस्थान का ढांचा | संबद्ध कॉलेज अधिक (अफ़िलिएशन फ़ीस से मोटी कमाई)। | निजी कॉलेजों की संख्या नगण्य, संबद्धता शुल्क से आय शून्य के बराबर। |
| स्टाफ का बोझ | छात्र संख्या के अनुपात में सीमित स्टाफ। | कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) और अनुसंधान केंद्रों (ARS) के कारण बड़ा तकनीकी व फील्ड स्टाफ। |
चौंकाने वाला उदाहरण: स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (बीकानेर) का उदाहरण लें तो यहाँ वर्तमान में महज 650 छात्र अध्ययनरत हैं, जबकि पेंशनरों की संख्या 1200 से अधिक है। जाहिर है कि महज 650 छात्रों की फीस से 1200 पेंशनरों की मासिक पेंशन नहीं चुकाई जा सकती।
बुढ़ापे में आर्थिक असुरक्षा: जमा पूंजी खत्म, एरियर का अता-पता नहीं
पेंशन समय पर न मिलने और एरियर रोके जाने के कारण सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों और कर्मचारियों का जीवन दुभर हो गया है। वृद्धावस्था में जहाँ दवाइयों, गंभीर बीमारियों के इलाज और बढ़ती महंगाई के बीच आर्थिक सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वहीं ये पेंशनर पाई-पाई को मोहताज हैं। कई बुजुर्ग वैज्ञानिकों ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी इलाज और घरेलू खर्चों में खत्म कर दी है, लेकिन सरकार की तरफ से बकाया एरियर का भुगतान पिछले कई वर्षों से अटका पड़ा है।
समाधान का रास्ता: कैसे खत्म होगा ‘पेंशन का टेंशन’?
विशेषज्ञों और पेंशनर सोसायटियों के अनुसार, यदि सरकार इस संकट का स्थाई समाधान चाहती है तो उसे तुरंत ये तीन कदम उठाने होंगे:
- प्रतिबद्ध देनदारियों को बजटीय अनुदान से जोड़ना: पेंशन और वेतन जैसी प्रतिबद्ध देनदारियों (Committed Liabilities) को पूर्णतः राज्य सरकार के सीधे बजटीय अनुदान (Budgetary Grant) से जोड़ा जाना चाहिए ताकि विश्वविद्यालयों की आंतरिक आय पर निर्भरता खत्म हो।
- पेंशन कॉर्पस फंड की स्थापना: राज्य के सभी कृषि विश्वविद्यालयों के लिए एक संयुक्त और मजबूत “पेंशन कॉर्पस फंड” स्थापित किया जाए। इस फंड से मिलने वाले ब्याज से सीधे पेंशन भुगतान की स्थायी और निर्बाध व्यवस्था सुनिश्चित हो।
- ‘विशिष्ट दर्जा’ (Special Status) की घोषणा: कृषि विश्वविद्यालयों को केवल सामान्य शिक्षण संस्थान न मानकर राज्य की खाद्य सुरक्षा, कृषि उन्नयन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला मानते हुए उन्हें कानूनन “विशिष्ट दर्जा” प्रदान किया जाए।
पेंशन कोई दया, खैरात या अनुग्रह राशि नहीं है, बल्कि यह एक कर्मचारी की जीवनभर की वैधानिक सेवा का सम्मान है। यदि एक संवेदनशील लोकतंत्र में देश का पेट भरने वाली तकनीकों को ईजाद करने वाले वैज्ञानिकों को बुढ़ापे में सड़क पर उतरना पड़े, तो यह नीति निर्माताओं के लिए आत्मचिंतन का विषय है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर कृषि अनुसंधान व्यवस्था और बुजुर्गों के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।