जयपुर। राजस्थान में सड़क निर्माण के क्षेत्र में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। बढ़ती डामर कीमतों और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच राज्य सरकार अब सड़क निर्माण में प्लास्टिक वेस्ट, फ्लाई ऐश और पुरानी सड़कों से निकली सामग्री के पुनः उपयोग पर जोर दे रही है। इस दिशा में वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग के लिए केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) आगे आया है।
राज्य में सड़क निर्माण परियोजनाओं पर बढ़ते खर्च और डामर की कमी को देखते हुए वैकल्पिक निर्माण सामग्री की तलाश तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे और औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग से न केवल निर्माण लागत कम होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
इंजीनियरों को मिलेगा आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण
सड़क निर्माण में नई तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए CSIR-CRRI नई दिल्ली में 7 से 12 सितंबर तक पांच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगा। इस प्रशिक्षण में राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को आधुनिक रोड टेक्नोलॉजी, रीसाइक्लिंग तकनीकों और पर्यावरणीय मानकों की जानकारी दी जाएगी।
इससे पहले राजस्थान में अपशिष्ट आधारित सड़क निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए जयपुर में भी कार्यशाला आयोजित की जा चुकी है, जिसमें सड़क निर्माण में औद्योगिक कचरे के प्रभावी उपयोग पर चर्चा हुई थी।
डामर संकट बना बदलाव की बड़ी वजह
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर राजस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर भी पड़ रहा है। सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला डामर पिछले कुछ महीनों में लगभग दोगुना महंगा हो गया है। मार्च में लगभग 45 हजार रुपये प्रति टन उपलब्ध डामर की कीमत अब 85 हजार रुपये प्रति टन के आसपास पहुंच गई है। इसके चलते राज्य की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की सड़क निर्माण, मरम्मत और डामरीकरण परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं।

तमिलनाडु और कर्नाटक बने उदाहरण
देश में प्लास्टिक वेस्ट से सड़क निर्माण की तकनीक नई नहीं है। तमिलनाडु इस क्षेत्र में अग्रणी राज्य माना जाता है, जहां लगभग 17,735 किलोमीटर सड़कें प्लास्टिक कचरे का उपयोग कर बनाई जा चुकी हैं। वहीं, कर्नाटक में 2,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण इस तकनीक से किया गया है। हुबली-धारवाड़ में एक सड़क परियोजना में 8 प्रतिशत प्लास्टिक मिश्रण से प्रति किलोमीटर लगभग 1.5 लाख रुपये की बचत दर्ज की गई।
राजस्थान में भी लोक निर्माण विभाग पहले से सीमित स्तर पर प्लास्टिक वेस्ट का उपयोग कर रहा है। वर्ष 2023 तक राज्य में हजारों किलोमीटर सड़कों के निर्माण में प्लास्टिक मिश्रित तकनीक का इस्तेमाल किया जा चुका है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक लाभ
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट सामग्री से बनी सड़कें पारंपरिक सड़कों की तुलना में अधिक टिकाऊ होती हैं। इन सड़कों में पानी का रिसाव कम होता है, गड्ढे बनने की संभावना घटती है और रखरखाव पर होने वाला खर्च भी कम होता है। साथ ही, प्लास्टिक कचरे के सुरक्षित निस्तारण का प्रभावी समाधान भी मिलता है।
यदि यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो राजस्थान न केवल सड़क निर्माण की लागत कम कर सकेगा, बल्कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ और सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाएगा।