जयपुर: राजधानी जयपुर के सांगानेर में रंगाई-छपाई (रंगाए-छपाई) उद्योगों से निकलने वाले केमिकल युक्त जहरीले अपशिष्ट को नियंत्रित करने के लिए बना CETP (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) खुद बड़े सवालों के घेरे में आ गया है। लंबे समय से इस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, लेकिन आज भी सांगानेर की फैक्टरियों का अपशिष्ट सीधे द्रव्यवती नदी और नालों में डाला जा रहा है। इससे एक तरफ जहां पर्यावरण और आम लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई फैक्टरियां बंद होने से हजारों लोगों का रोजगार छिन गया है।
इस पूरे प्रोजेक्ट के अधरझूल में लटकने, वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों और व्यापारियों की परेशानियों की तह तक जाने के लिए ‘Expose Now’ ने CETP संचालन समिति के सदस्य प्रवीन शाह, स्थानीय व्यापारी दिनेश छीपा और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल से खास बातचीत की।
1. CETP संचालन समिति के सदस्य प्रवीन शाह से बातचीत के अंश

Expose Now: प्रवीन जी, CETP प्रोजेक्ट के पूरे न होने के पीछे क्या वजह रही?
प्रवीन शाह: आईपीडीए (IPDA) स्कीम के तहत प्रिंटिंग फैक्टरियों के लिए पूर्व सीएम वसुंधरा राजे 2015-16 में इस प्रोजेक्ट को लेकर आईं थीं। फिर 2019 में पूर्व मंत्री स्मृति ईरानी ने इसे चालू किया और प्लांट को आंशिक (partially) शुरू किया, क्योंकि ठेकेदार ने पूरा काम नहीं किया था। यह प्लांट 3 चरणों (1-कनवेंस पाइपलाइन, 2-CETP प्लांट, 3-ZLD प्रोसेस) में बनना था। ठेकेदार ने पाइपलाइन और ZLD का काम पूरा नहीं किया, जिसके बाद शिकायतें हुईं और मामला कोर्ट/लिटिगेशन में चला गया। ठेकेदार पेमेंट मांगता रहा, जबकि हम उसे 130 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान कर चुके थे, जबकि यह प्रोजेक्ट कुल 145 करोड़ का था। 15 करोड़ के अंतर पर ठेकेदार ने अहमदाबाद में MSME के तहत केस कर दिया। कांट्रैक्ट में स्पष्ट था कि विवाद की स्थिति में न्यूट्रल स्टेट में केस होगा, लेकिन अहमदाबाद कोर्ट ने ठेकेदार की मिलीभगत से 35 करोड़ की राशि तय कर दी। हाईकोर्ट से भी निराशा हाथ लगी और ब्याज बढ़कर राशि 92 करोड़ हो गई। इसे वसूलने के लिए जयपुर कमर्शियल कोर्ट में केस लगा, जहां ‘कॉरपोरेट विल लिफ्ट’ का निर्णय देते हुए सभी 900 फैक्टरियों को सीज करने का आदेश दिया गया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के आने के बाद सरकार ने इस मामले को गंभीरता से समझा और पार्टी बनकर हाईकोर्ट में केस लड़ा, जिसमें सरकार की जीत हुई और अब ठेकेदार सुप्रीम कोर्ट चला गया है। पानी का ट्रीटमेंट इसलिए नहीं हुआ क्योंकि अप्रैल 2025 में प्लांट को रिपेयर कराया (जो 5-7 साल से बंद था) और 5 जून को फिर से शुरू किया। शुरू करने पर पता चला कि ठेकेदार ने 65 किमी की मेन पाइपलाइन पूरी बनाई ही नहीं थी। हमने सभी मिसिंग लिंक्स जोड़कर इसे पूरा किया, जिसमें डेढ़ साल लग गया। हमने 758 यूनिट्स को इससे जोड़ दिया है।
Expose Now: प्लांट की वर्तमान स्थिति क्या है?
प्रवीन शाह: 892 सदस्य इस योजना से जुड़े हैं, जिनमें से 792 को पाइपलाइन से कनेक्ट कर दिया गया है। बाकी को जोड़ने का काम अगले 15 दिनों में पूरा हो जाएगा।
Expose Now: शिकायत है कि इस प्रोजेक्ट की मेंबरशिप के लिए अलग-अलग अमाउंट लिया गया?
प्रवीन शाह: आपके पास गलत सूचना है। हमने किसी से कोई अमाउंट नहीं लिया, मेंबरशिप के लिए 0 अमाउंट पर मेंबर जुड़े हैं। पैसों का हिसाब यह है कि कुल 145 करोड़ में से 75 करोड़ केंद्र सरकार को देना था, 39.5 करोड़ राज्य सरकार को और 39.5 करोड़ क्लॉथ इंडस्ट्री को देना था। राज्य सरकार और हम इंडस्ट्री ने अपना हिस्सा दे दिया, लेकिन केंद्र से अभी 37.5 करोड़ ही आया है, बाकी पैसा न आने के कारण प्लांट पूरा नहीं हो पाया।
Expose Now: हैंड ब्लॉक प्रिंट के छोटे व्यापारियों का कहना है कि हमारे पास इतना पैसा नहीं कि हम मेंबरशिप ले सकें?
प्रवीन शाह: सरकार ने छोटे व्यापारियों के लिए ETP प्लांट बनाने की योजना बनाई है, जिससे इन व्यापारियों को जोड़ा जाए और इनकी एक सोसाइटी बना दी जाए, ताकि ये अपने काम से निकला अपशिष्ट CETP तक पहुंचा सकें।
Expose Now: ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) सिस्टम में पैसों का खेल हो गया? 300 करोड़ की बंदरबांट का आरोप है?
प्रवीन शाह: आरोप यूं ही लगा दिए जाते हैं और यह भी झूठा है, क्योंकि कुल 145 करोड़ का प्रोजेक्ट था। इसमें से 130 करोड़ ठेकेदार को किन अधिकारियों ने किस आधार पर दिए, यह मुझे नहीं पता क्योंकि मैं उस समय इस प्रोजेक्ट से जुड़ा नहीं था। मैंने मई 2025 में जॉइन किया और तब से अकाउंट बिल्कुल क्लियर है, पैसे कैश नहीं लेते और नियमित ऑडिट भी होती है।
Expose Now: सीएम भजनलाल को प्लांट की जानकारी है और इसको लेकर उनका क्या रुख है?
प्रवीन शाह: सीएम साहब इस प्लांट के लिए गंभीर हैं और शुरू से लेकर अब तक इसको रिवाइव करने में जुटे हुए हैं।
Expose Now: व्यापारी आरोप लगा रहे हैं कि सरकार को कुछ नहीं पता, प्रवीन जी जानते हैं कि पैसा कहाँ गया?
प्रवीन शाह: 32 लोगों की कमेटी ने मुझे इस प्लांट को चलाने के लिए चुना और लिखित में कहा कि इस प्लांट को चलाने में हम आपको सहयोग करेंगे, तब मैं इस समिति से जुड़ा। सांगानेर में कुल 3000 फैक्टरियाँ हैं और CETP प्लांट से 892 लोग जुड़े हुए हैं, तो मैं जिम्मेदार सिर्फ CETP सदस्यों के लिए हूँ, बाकी के लोगों के लिए मैं जवाबदेह नहीं हूँ, उनके जवाबदेह वे खुद या सरकार है।
2. पारंपरिक हैंड ब्लॉक प्रिंटर दिनेश चंद्र छीपा से बातचीत के अंश

Expose Now: CETP फिल्टर प्लांट मामले में क्या घपला सामने आ रहा है?
दिनेश चंद्र छीपा: इस प्लांट में केंद्र और राज्य सरकार का फंड लगा है। इसके 892 सदस्य हैं, जिनसे 5 लाख से 21 लाख रुपये तक की मेंबरशिप फीस ली गई है। इतना भारी फंड होने के बावजूद प्लांट आज तक पूरी तरह चालू नहीं हो पाया है। कभी ठेकेदार की कमी तो कभी ज़मीन न होने का बहाना बनाया जाता है। मैनेजमेंट के स्तर पर भारी वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं।
Expose Now: ZLD (Zero Liquid Discharge) और ट्रीटेड पानी वापस भेजने के नियम का क्या हुआ?
दिनेश चंद्र छीपा: डीपीआर (DPR) के अनुसार ट्रीटेड पानी को वापस इंडस्ट्री तक भेजने के लिए ‘रिवर्स पाइपलाइन’ अनिवार्य होती है, लेकिन इस प्लांट में यह लाइन कभी डली ही नहीं! सवा करोड़ लीटर पानी ट्रीट करने का दावा है, लेकिन जब प्लांट ही नहीं चल रहा तो बड़ी फैक्टरियां सिर्फ “CETP मेंबर” होने के नाम पर बिना ट्रीट किए रोज़ाना 1-2 लाख लीटर ज़हरीला पानी सीवर में बहा रही हैं।
Expose Now: आप लोग (हैंड ब्लॉक प्रिंटर्स) इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?
दिनेश चंद्र छीपा: हम पारंपरिक हैंड ब्लॉक प्रिंटर हैं। हमारे यहाँ पानी का इस्तेमाल मुश्किल से रोज़ 100 से 1000 लीटर होता है, क्योंकि हम पानी वाला सारा काम बाहर से करवाते हैं। हम CETP की 15-20 लाख की मेंबरशिप फीस नहीं दे सकते। बड़ी इंडस्ट्रीज़ जो रोज़ाना लाखों लीटर गंदा पानी बहा रही हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहता, लेकिन छोटे कामगारों को पॉल्यूशन बोर्ड, NGT और शटडाउन का डर दिखाकर डराया जाता है।
Expose Now: मुख्यमंत्री का क्षेत्र होने के बावजूद समाधान क्यों नहीं हो रहा? आपकी क्या मांग है?
दिनेश चंद्र छीपा: सीईटीपी के डायरेक्टर खुद मान चुके हैं कि प्लांट अभी चल नहीं रहा है और उनके पास स्लज (Sludge) रखने की जगह नहीं है। सरकार का पैसा लगा है, उन्हें जानकारी भी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही। हमारी मांग है कि इस प्लांट के फंड और अकाउंट्स की उच्च स्तरीय जांच (ऑडिट) होनी चाहिए ताकि पता चले कि पैसा कहाँ गया।
3. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल से बातचीत के अंश

Expose Now: सांगानेर में रंगाई-छपाई के लिए लगाया गया CETP प्लांट भलाई दे रहा है या तकलीफ बढ़ा रहा है?
डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल: बिल्कुल, 2015 में लगभग 160 करोड़ रुपये की मदद से CETP स्थापित किया गया था। लेकिन यह प्लांट ठीक तरीके से ऑपरेशनल न होने के कारण एक बड़ा फेलियर साबित हुआ है, जिससे उद्यमियों को बड़ी परेशानी हो रही है।
Expose Now: जब फाइनेंशियल सपोर्ट मिल गया, फिर यह वर्कआउट क्यों नहीं कर पाया?
डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल: इसके कई साझा कारण हैं। एसपीवी (SPV)—सांगानेर एनवायरो प्रोडक्ट डेवलपमेंट (SEPD)—का मैनेजमेंट और 892 उद्योगों की कनेक्टिविटी एक बड़ा इश्यू है। उससे भी बड़ा इश्यू यह है कि प्रत्येक उद्योग को अपना गंदा पानी ‘प्री-ट्रीट’ करके CETP तक भेजना होता है, लेकिन लोगों की मंशा शॉर्टकट अपनाने और पैसा बचाने की रही, जिससे उन्होंने इसे सीरियसली नहीं लिया।
Expose Now: ZLD प्लांट लगाने की बात का क्या हुआ?
डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल: सांगानेर में अनुमानित 3000 यूनिट्स हैं, जबकि केवल 892 ही CETP से जुड़ी हैं। जो यूनिट्स नहीं जुड़ी हैं, उन्हें ZLD लगाने को कहा गया। उनमें से कुछ ने ZLD लगाया भी, लेकिन वे निरंतर अपना पानी बाईपास करके सीधे नदी-नालों में छोड़ते रहे, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट और NGT को संज्ञान लेना पड़ा।
Expose Now: व्यापारियों का आरोप है कि समिति द्वारा पैसे की हेराफेरी हुई है, क्या भ्रष्टाचार हुआ है?
डॉ. बृजवल्लभ उदयवाल: इस तरह का कोई एविडेंस नहीं है कि प्लांट के पैसे से हेराफेरी हुई है। यह भारी कुप्रबंधन (Mismanagement) और लोगों की ‘लैक ऑफ अटेंशन’ का नतीजा है। लोगों की नीयत काम के प्रति कम है, इस वजह से यह सब हुआ है।
