-तय विकास बजट का सिर्फ 51% ही कर पाई खर्च, लेकिन कर्ज लेने में तय सीमा से 65 फीसदी आगे निकली सरकार
-तेलंगाना-कर्नाटक विकास खर्च में देश में अव्वल, राजस्थान फिसड्डी राज्यों की सूची में शामिल
जयपुर। प्रदेश में विकास की बड़ी-बड़ी बातें और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला है, इसका सनसनीखेज खुलासा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के ताजा आंकड़ों ने कर दिया है। CAG की प्रोविजनल रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान सरकार बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं पर पैसा खर्च करने में बेहद कंजूसी बरत रही है, जबकि राज्य को कर्ज के दलदल में धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। कैग के आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में राजस्थान सरकार ने तय पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) बजट का महज 51.82 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया है। वहीं दूसरी तरफ, कर्ज और देनदारी के मामले में सरकार ने सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए तय बजट से 65 फीसदी ज्यादा उधार ले लिया है।
बजट का गणित: विकास थमा, उधारी बेकाबू:-
कैग की रिपोर्ट में राजस्थान के जो वित्तीय आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:
-विकास खर्च में नाकामी: राज्य सरकार ने विकास कार्यों (पूंजीगत व्यय) के लिए 56,327.33 करोड़ रुपये का बजट तय किया था, लेकिन वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक वास्तविक खर्च महज 29,190.96 करोड़ रुपये ही हो पाया। यानी करीब आधा बजट बिना खर्च हुए ही रह गया।
-कर्ज लेने में रिकॉर्ड तोड़ रफ्तार: सरकार ने बजट में 42,972.06 करोड़ रुपये के कर्ज और देनदारी का अनुमान लगाया था। लेकिन वित्तीय वर्ष खत्म होते-होते यह आंकड़ा 165.83% तक बढ़कर 71,261.79 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।
‘Expose Now’ का सीधा सवाल: जब सरकार विकास कार्यों पर पैसा खर्च ही नहीं कर पा रही है, तो आखिर यह हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज किसके लिए और कहां इस्तेमाल किया जा रहा है?
देशभर में पिछड़ा राजस्थान, फिसड्डियों में पांचवां स्थान:-
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 20 प्रमुख राज्यों में पूंजीगत खर्च के मामले में राजस्थान सबसे निचले पायदानों पर नजर आ रहा है। सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में राजस्थान नीचे से पांचवें (51.82%) स्थान पर है। वहीं पश्चिम बंगाल (48.06%) सबसे पीछे है। इसके विपरीत, तेलंगाना (147.58%) और कर्नाटक (102.46%) जैसे राज्य अपने तय बजट से भी ज्यादा विकास कार्यों पर खर्च कर देश में अव्वल बने हुए हैं। पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश भी 86.53% बजट खर्च कर छठे स्थान पर है।
आखिर क्या होता है पूंजीगत खर्च और क्यों डूबा राजस्थान?
पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) वह राशि होती है जिससे राज्य में स्कूल, अस्पताल, नई सड़कें, पुल, पेयजल परियोजनाएं, रेलवे और उद्योगों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार होता है। इससे सीमेंट, लोहा और निर्माण सामग्री की खपत बढ़ती है, जिससे युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।
अधिकारियों की लापरवाही और मार्च लूट की प्रवृत्ति:-
कैग की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पूरे देश में राज्य सरकारें सालभर सुस्त रहती हैं और अकेले मार्च के महीने में 20% बजट आनन-फानन में ठिकाने लगा देती हैं। इस ‘मार्च लूट’ और हड़बड़ी के कारण न तो नियमों का पालन होता है और न ही काम की गुणवत्ता बचती है। राजस्थान में भी प्रशासनिक ढर्रे और फाइलों के अटके रहने के कारण विकास योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाईं।
जनता पर क्या होगा इसका असर?
विकास बजट न खर्च होने और कर्ज का बोझ बढ़ने का सीधा नुकसान राजस्थान की जनता को भुगतना पड़ रहा है। नई तकनीक, फैक्ट्रियां और मशीनें न आने से उत्पादन और कार्यकुशलता घट रही है। निजी निवेश ठप होने से युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो पा रहे हैं। बुनियादी सुविधाएं (बिजली, पानी, सड़क) बदहाल स्थिति में हैं क्योंकि उनके विस्तार के लिए स्वीकृत पैसा फाइलों में ही दबा रह गया।
वित्तीय प्रबंधन के ये आंकड़े राज्य की आर्थिक सेहत के लिए बेहद खतरनाक संकेत हैं। सरकार को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर ब्यूरोक्रेसी विकास के पैसे को दबाकर क्यों बैठी है और कर्ज का ग्राफ लगातार क्यों आसमान छू रहा है?
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now