मलबे में बहा 45 दिन का बजट: जिस लापरवाही का था डर, वही हुआ, ‘मिट्टी का बंध’ नहीं हटाने से टूट गई इंदिरा गांधी नहर, राजस्थान के 10 जिलों में पानी के लिए हाहाकार !

-ठेकेदारों के मुनाफे और इंजीनियरों की ‘आंखें मूंदने’ की नीति ने धकेला राजस्थान को प्यास की ओर

‘Expose Now’ की विशेष खोजी रिपोर्ट

जयपुर/श्रीगंगानगर। राजस्थान के करोड़ों लोगों की जीवनरेखा कही जाने वाली इंदिरा गांधी नहर (IGNP) में सुधार के नाम पर चल रहा ‘खेल’ अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। ‘Expose Now’ ने अपनी पिछली रिपोर्ट में जिस गंभीर खतरे की तरफ इशारा किया था, व्यवस्था की अकर्मण्यता ने ठीक उसी भयावह अंदेशे को सच साबित कर दिया है। 49 दिनों की लंबी नहर बंदी के बाद जैसे ही 14 मई की रात को पंजाब के हरिके हेडवर्क्स से 7200 क्यूसेक पानी छोड़ा गया, उसके अगले ही दिन 15 मई को पंजाब के फरीदकोट जिले के फिदे कलां गांव के पास नहर की 100 फीट लंबी लाइनिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि जल संसाधन विभाग के अधिकारियों, लापरवाह इंजीनियरों और ठेकेदारों के उस गठजोड़ का नतीजा है, जो किसानों के हक के पानी पर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं।

‘आधा काम-पूरा दाम’ का खेल, आखिर क्यों टूटी नहर?

धरातल की तस्वीरें गवाही दे रही हैं कि इस महा-विनाश की असली वजह क्या है। पुनर्निर्माण और मरम्मत कार्य के लिए ठेकेदारों ने नहर के बेड (पेटे) में मिट्टी के बड़े-बड़े ऊंचे बंधे (प्लग्ज) बनाए थे। नियम के अनुसार पानी छोड़ने से पहले इन बंधों की एक-एक इंच मिट्टी को जेसीबी से बाहर निकाला जाना था। ठेकेदारों ने डीजल बचाने और मुनाफा कमाने के चक्कर में मिट्टी को पूरा बाहर नहीं निकाला। अधिकारियों ने बिना ग्राउंड वेरिफिकेशन और मॉनीटरिंग किए एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर ‘ऑल क्लियर’ की रिपोर्ट दे दी। जैसे ही पानी का भारी दबाव आया, नहर के पेटे में जमा इसी मलबे और मिट्टी के बंध ने पानी का रास्ता रोक दिया। पानी बैक मार गया, दबाव बढ़ा और नई बनी 100 फीट की लाइनिंग को चीरता हुआ बाहर निकल गया।

10 जिलों में पेयजल संकट, जनता और किसान अब भी ‘टेल’ पर प्यासा:-

इस आपराधिक लापरवाही की सजा अब राजस्थान के 10 जिलों (श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, चूरू, सीकर और झुंझुनूं) की जनता और किसानों को भुगतनी पड़ रही है। इन जिलों में पहले से ही पानी का त्राहि-त्राहि मची है। अब कटाव के कारण पेयजल आपूर्ति शुरू होने में भारी देरी होगी।
मुख्य अभियंता (उत्तर क्षेत्र) प्रदीप रुस्तगी के बयान के मुताबिक, अब प्राथमिकता सिर्फ पेयजल को दी जाएगी। यानी, जिस किसान की फसलें पानी के इंतजार में सूख रही हैं, उसे ठेकेदारों के इस भ्रष्टाचार के कारण सिंचाई का पानी मिलने में अभी और लंबा इंतजार करना होगा।

लापरवाही का क्रोनोलॉजी समझिए:-

49 दिन की नहर बंदी ➡️ कागजों में करोड़ों का मरम्मत कार्य ➡️ नहर में मिट्टी के ऊंचे बंधे छोड़े गए ➡️ 14 मई को पानी छोड़ा गया ➡️ मिट्टी के अवरोध से बढ़ा प्रेशर ➡️ 15 मई को 100 फीट लाइनिंग ध्वस्त।

हेड से टेल तक सफाई की मांग क्यों है जरूरी?

यह घटना साबित करती है कि जब तक हेड से लेकर टेल (अंतिम छोर) तक वैज्ञानिक तरीके से पूरी मिट्टी नहीं हटाई जाएगी, तब तक नहरों का टूटना और पानी की बर्बादी नहीं रुक सकती। गांवों के सिंचाई खालों और छोटी माइनरों की स्थिति तो और भी बदतर है, जहां कागजों में सफाई दिखाकर बजट उठा लिया जाता है और मौके पर सिर्फ झाड़ियां और गाद जमा रहती है।

‘Expose Now’ के सीधे और तीखे सवाल:

-जवाबदेह कौन? पंजाब के हिस्से में घटिया निर्माण और मिट्टी के बंध छोड़ने वाले ठेकेदारों पर राजस्थान सरकार ने अब तक ब्लैकलिस्ट की कार्रवाई क्यों नहीं की?

-इंजीनियरों की जेबें क्यों न नापी जाएं? मौके पर तैनात जिन जेएन (JEN) और एएन (AEN) ने इस लापरवाही को नजरअंदाज किया, इस 100 फीट टूटी नहर की मरम्मत का खर्च उनकी सैलरी और पेंशन से क्यों न वसूला जाए?

-घोषणाएं बनाम हकीकत: सरकारें हर बार बजट में करोड़ों की घोषणाएं करती हैं, लेकिन क्या मंत्रियों के पास कोई ऐसा मैकेनिज्म है जो यह जांच सके कि नहर से मिट्टी सच में बाहर निकली है या उसी के पेटे में दफन कर दी गई?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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