श्रावण अमावस्या का ज्योतिषीय महत्व-
ज्योतिष, कुंडली, ग्रह और वास्तु से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी
सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इसी पावन माह में आने वाली अमावस्या को श्रावण अमावस्या या हरियाली अमावस्या कहा जाता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को श्रावण अमावस्या मनाई जाती है। इस वर्ष यह विशेष तिथि 12 अगस्त 2026, बुधवार को है। श्रावण अमावस्या धार्मिक, ज्योतिषीय और वास्तु दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है। खास बात यह है कि इसी दिन पूर्ण सूर्य ग्रहण भी लगेगा, हालांकि यह भारत में दिखाई नहीं देगा फिर भी ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से इस दुर्लभ संयोग का सूक्ष्म प्रभाव कुंडली पर अवश्य पड़ता है।
● ज्योतिष एवं कुंडली की दृष्टि से महत्व– अमावस्या तिथि पर चंद्रमा पूर्णतः क्षीण अवस्था में होता है, जिसे कुंडली में मानसिक अशांति, चंद्र दोष और नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। पितृ दोष से पीड़ित जातकों के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना गया है — मान्यता है कि तर्पण व पिंडदान से पितृ दोष में राहत मिलती है। इस वर्ष सूर्य ग्रहण का संयोग होने से ग्रहों की ऊर्जा और भी प्रभावशाली मानी जा रही है, विशेषकर राहु-केतु और सूर्य से जुड़े दोष वाले जातकों के लिए यह दिन सतर्कता व उपाय दोनों का समय है।
● पितृ दोष निवारण– कुंडली में पितृ दोष के प्रभाव को कम करने के लिए यह दिन सर्वोत्तम माना जाता है। इस दिन तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को शांति मिलती है।
● कालसर्प दोष से मुक्ति– जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु का अशुभ प्रभाव है, वे इस दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करके राहत पा सकते हैं।
● चंद्रमा और शनि देव की शांति– अमावस्या के स्वामी चंद्रमा हैं। कमजोर चंद्रमा वाले जातकों को इस दिन शिव जी की पूजा करनी चाहिए। साथ ही, पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि की ढैय्या और साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार उपाय–
● पौधारोपण से वास्तु सुधार– घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या बगीचे में नीम, तुलसी, पीपल, बरगद या बेलपत्र का पौधा लगाना सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।
● नकारात्मक ऊर्जा का निष्कासन– इस दिन घर की अच्छी तरह सफाई करें। जल में सेंधा नमक मिलाकर पोछा लगाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।
● मुख्य द्वार का वास्तु– संध्या काल में मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाने से देवी लक्ष्मी का आगमन होता है।
पूजा विधि और लाभ–
● स्नान व दान– सुबह किसी पवित्र नदी में स्नान करें या नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें।
● शिव पूजन– शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भस्म अर्पित करें।
● पितृ तर्पण– दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम से जल, काले तिल और कुश अर्पित करें।
● पीपल पूजा– पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करें और जल अर्पित करें।
● अन्नदान करें– इसे इस दिन का सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है
प्रमुख लाभ:
● पितृ दोष और ग्रह बाधाओं से मुक्ति।
● मानसिक शांति और पारिवारिक सुख-समृद्धि।
● प्रकृति संरक्षण और वास्तु दोषों का निवारण।
● NOTE- यह लेख ज्योतिष एवं वास्तु के दृष्टिकोण पर आधारित है और ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से लिखा गया है। नमस्कार, धन्यवाद।
