दूध बेचने वाले से वायुसेना के जांबाज पायलट और फिर देश के दिग्गज राजनेता बनने तक का सफर, ऐसे थे राजेश पायलट

जयपुर: भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे चेहरे हुए हैं जिन्होंने अपनी मेहनत, ईमानदारी और सादगी के दम पर करोड़ों लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी है। ऐसा ही एक अविस्मरणीय और प्रेरणादायक नाम है राजेश पायलट (Rajesh Pilot)। एक बेहद साधारण किसान परिवार में जन्म लेने, दिल्ली की सड़कों पर दूध बेचने से लेकर भारतीय वायुसेना के जांबाज फाइटर पायलट बनने और फिर देश के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री (आंतरिक सुरक्षा) के रूप में देश की राजनीति को प्रभावित करने तक का उनका सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। जमीनी पकड़ और जनता के प्रति उनके असीम जुड़ाव के कारण आज भी उन्हें एक सच्चे जननायक के रूप में याद किया जाता है।

Video : सचिन पायलट ने दी श्रद्धांजलि

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष: दूध बेचने से वायुसेना की उड़ान तक

राजेश पायलट का मूल नाम राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी था। उनका जन्म 10 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) के वैदपुरा गांव में एक साधारण गुर्जर किसान परिवार में हुआ था। जब वे बेहद छोटे थे, तभी उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। इसके बाद वे अपने भाई के साथ दिल्ली आ गए और शुरुआती दिनों में गुजारे के लिए अपने चाचा की डेयरी में हाथ बंटाते हुए दिल्ली के वीआईपी बंगलों में दूध बेचने का काम किया। संघर्ष के इन दिनों के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उनका सपना आसमान छूने का था, जिसे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर सच कर दिखाया। वे भारतीय वायुसेना (IAF) में भर्ती हुए और फ्लाइंग स्कूल से ट्रेनिंग पूरी कर एक कुशल पायलट बने। उन्होंने साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक बॉम्बर पायलट के रूप में दुश्मनों के छक्के छुड़ाए और देश की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वायुसेना में वे स्क्वाड्रन लीडर के पद तक पहुंचे।

राजनीति में प्रवेश: इंदिरा गांधी से मुलाकात और ‘बिधूड़ी’ से ‘पायलट’ बनने की कहानी

राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के साथ राजेश पायलट

वायुसेना में रहते हुए उनके मित्र राजीव गांधी (जो खुद भी एक पायलट थे) के माध्यम से उनका झुकाव जनसेवा की ओर हुआ। साल 1979 में उन्होंने देश की तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी से मुलाकात की और देश की मुख्यधारा की राजनीति में आने की इच्छा जताई। इंदिरा गांधी उनकी साफगोई और जज्बे से बेहद प्रभावित हुईं और उन्होंने राजेश्वर प्रसाद को चुनाव लड़ने का टिकट थमा दिया। चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने वायुसेना के प्रतिष्ठित पद से इस्तीफा दे दिया।

साल 1980 के लोकसभा चुनाव में जब वे राजस्थान की भरतपुर सीट से चुनावी मैदान में उतरे, तो गांवों में यह चर्चा फैल गई कि “कोई पायलट चुनाव लड़ने आ रहा है।” ग्रामीणों के इसी उत्साह और जुड़ाव को देखते हुए उन्होंने चुनावी हलफनामे में अपना उपनाम ‘बिधूड़ी’ से बदलकर हमेशा के लिए ‘राजेश पायलट’ कर लिया। अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने भरतपुर की पूर्व महारानी को हराकर देश की संसद में कदम रखा। इसके बाद वे राजस्थान की दौसा (Dausa) लोकसभा सीट पर आए और वहां की जनता से ऐसा अटूट रिश्ता बनाया कि दौसा और राजेश पायलट एक-दूसरे के पूरक बन गए। वे दौसा से लगातार कई बार सांसद चुने गए।

सांगठनिक और प्रशासनिक कुशलता: जब संभाली देश की आंतरिक सुरक्षा

राजेश पायलट केवल एक लोकप्रिय सांसद नहीं थे, बल्कि देश के कुशलतम प्रशासकों में से एक थे। केंद्र सरकार में उन्हें कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई:

  • सतह परिवहन मंत्री (1985-1989): राजीव गांधी सरकार में परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की स्थापना और मोटर वाहन अधिनियम में सुधार जैसे ऐतिहासिक कदम उठाए।
  • दूरसंचार मंत्री (1991-1993): पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार में उन्होंने दूरसंचार के क्षेत्र में शुरुआती सुधारों की नींव रखी।
  • आंतरिक सुरक्षा मंत्री (1993-1995): बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश के बेहद संवेदनशील हालातों के बीच उन्हें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री (आंतरिक सुरक्षा) बनाया गया। उन्होंने कश्मीर और पूर्वोत्तर (North-East) के उग्रवाद को थामने के लिए बेहतरीन रणनीतियां बनाईं। असम आंदोलन के शांत होने और झारखंड स्वायत्त क्षेत्र परिषद विधेयक के निर्माण में उनकी मध्यस्थता ऐतिहासिक रही।
  • ‘जय जवान जय किसान’ ट्रस्ट: उन्होंने साल 1987 में इस ट्रस्ट की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य जवानों के परिवारों और गरीब किसानों के बच्चों को शिक्षा और सहायता प्रदान करना था।

एक सड़क हादसे में देश ने खो दिया अपना ‘पायलट’

राजेश पायलट देश के उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो अपनी ही सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ खड़े होने का साहस रखते थे। वे हमेशा किसानों, जवानों और गरीबों की आवाज बुलंद करते रहे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 11 जून 2000 को अपने संसदीय क्षेत्र दौसा के दौरे से जयपुर लौटते समय एक भीषण सड़क दुर्घटना में इस जनप्रिय नेता का महज 55 वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन हो गया। उनके असमय चले जाने से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। आज उनके बेटे सचिन पायलट (Sachin Pilot) उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते हुए उनकी राजनीतिक विरासत और विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं।

Share This Article
Leave a Comment