Expose Now एक्सक्लुसिव रिपोर्ट: पौधारोपण के नाम पर 127.78 करोड़ की भारी-भरकम ‘बंदरबांट’, 11.57 करोड़ पौधों की जियो-टैगिंग का दावा, लेकिन धरातल पर सिर्फ 1.36 करोड़ ही जीवित, वो भी कागजों में!

-डिजिटल आंकड़ों का मायाजाल: 11.57 करोड़ पौधों की जियो-टैगिंग के बाद भी करीब 9.88 करोड़ पौधे भौतिक जांच से बाहर क्यों?

-आंकड़ों का विरोधाभास: कागजों में 80.83% जीवित रहने का दावा, लेकिन कुल रोपे गए पौधों में वास्तविक संख्या मात्र 11.82% ही जीवित

-72 विभागों का विशाल तंत्र और 127.78 करोड़ का बजट: सार्वजनिक धन के प्रभावी उपयोग और प्रशासनिक जवाबदेही पर उठते गंभीर सवाल!

जयपुर। ‘Expose Now’ की विशेष रिसर्च टीम ने पर्यावरण संरक्षण और हरित आवरण बढ़ाने के नाम पर चलाए जा रहे पौधारोपण अभियानों की जमीनी हकीकत का बड़ा ‘भंडाफोड़’ किया है। सरकारी फाइलों में हर साल करोड़ों पौधे रोपकर हरियाली की नई इबारत लिखने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब ‘Expose Now’ की टीम ने सरकारी आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण और पोस्टमार्टम किया, तो करोड़ों रुपये के बजट को ठिकाने लगाने का एक संगठित खेल उजागर हुआ। देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान का भौगोलिक परिदृश्य अत्यधिक विषम और चुनौतीपूर्ण है। राज्य का लगभग 61 प्रतिशत भूभाग ‘थार के मरुस्थल’ (शुष्क व अर्ध-शुष्क अंचल) से घिरा हुआ है, जहां कम वर्षा, भीषण ग्रीष्मकालीन तापमान (45°C से 50°C तक), तीव्र भू-जल क्षरण, और रेतीले धोरों की प्रतिकूल परिस्थितियां हैं। अरावली पर्वतमाला की पथरीली पहाड़ियों से लेकर हाड़ौती व पश्चिमी रेतीले मैदानों तक, राजस्थान की इस कठोर भौगोलिक बनावट में हरियाली बढ़ाना निसंदेह एक बेहद जटिल और खर्चीला कार्य है। लेकिन इसी विषम भौगोलिक परिस्थिति, थार के रेगिस्तान और पानी की कमी का बहाना बनाकर वन विभाग और सरकारी मशीनरी पौधारोपण के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा करते हुए करोड़ों रूपए का भ्रष्टाचार कर रही है। यदि अकेले वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों पर ही गौर कर लिया जाए तो एक बड़ा खेल उजागर होता है। कैसे कागजों में करोड़ों पौधे लगाने के बाद उन्हें कागजों में ही सुखा दिए गए और 127.78 करोड़ के भारी-भरकम बजट को ठिकाने लगा दिया गया।

जियो-टैगिंग का ‘डिजिटल मायाजाल’, 11.57 करोड़ पौधों का ढिंढोरा, पर भौतिक सत्यापन सिर्फ 1.69 करोड़ का:-

‘Expose Now’ की रिसर्च के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 11 करोड़ 57 लाख 72 हजार 615 पौधों को जियो-टैग करने का बढ़ा-चढ़ाकर दावा किया गया। जनता और प्रशासनिक अमले को यह दिखाया गया कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके पारदर्शी तरीके से पौधारोपण हुआ है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जब इन पौधों के भौतिक सत्यापन (Physical Verification) की बात आई, तो केवल 1 करोड़ 69 लाख 35 हजार 195 पौधों (मात्र लगभग 14.6%) का ही सत्यापन कराया गया। सवाल यह उठता है कि बाकी बचे लगभग 9.88 करोड़ पौधे कहां गए? क्या वे सिर्फ कागजों और डिजिटल आंकड़ों में ही रोपे गए थे? बिना धरातल पर जांच किए 11.57 करोड़ पौधों की जियो-टैगिंग की झूठी चमक दिखाकर जनता को गुमराह किया गया और करोड़ों के बजट को आपस में मिलकर बंदरबांट कर ली गई।

जीवित पौधों का ‘फर्जी प्रतिशत खेल’, 80.83% जीवित का दावा, जबकि हकीकत में 11.82 ही हैं जीवित:-

रिपोर्टों में बड़े गर्व से दावा किया गया है कि रोपे गए पौधों की जीवित रहने की दर (Survival Rate) 80.83 प्रतिशत है। लेकिन ‘Expose Now’ की पड़ताल बताती है कि यह आंकड़ा पूरी तरह से आंकड़ों की बाजीगरी और छलावा है। 80.83% का यह बाजीगरी आंकड़ा कुल 11.57 करोड़ पौधों पर नहीं, बल्कि केवल सत्यापित किए गए 1.69 करोड़ पौधों के आधार पर निकाला गया है। सत्यापित 1.69 करोड़ पौधों में से भी 32 लाख 46 हजार 426 पौधे मृत पाए गए और केवल 1 करोड़ 36 लाख 88 हजार 769 पौधे ही जीवित बचे। यदि कुल जियो-टैग किए गए 11.57 करोड़ पौधों की तुलना में जीवित पौधों (1.36 करोड़) का असली गणित देखें, तो वास्तविक जीवित दर मात्र 11.82% बैठती है! यानी कागजों में 80% से अधिक पौधे जीवित दिखाकर जनता की आंखों में धूल झोंकी जा रही है, जबकि हकीकत में 88% से अधिक पौधों का कहीं कोई वजूद ही नहीं है।

72 विभागों की आड़ में 127.78 करोड़ के बजट की बंदरबांट:-

‘Expose Now’ की रिसर्च से यह खुलासा भी हुआ है कि पौधारोपण का यह काम किसी एक विभाग तक सीमित नहीं था, बल्कि कुल 72 अलग-अलग विभागों और एजेंसियों के माध्यम से इस पूरे खेल को अंजाम दिया गया। इन पौधों के रोपण, रखरखाव और नाममात्र की जियो-टैगिंग के नाम पर कुल 127 करोड़ 78 लाख का भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहा दिया गया। वन विभाग और संबंधित एजेंसियों ने करोड़ों रुपये का बजट ठिकाने लगा दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो पौधे बचे और न ही हरियाली दिखी। 72 विभागों में बजट बांटकर जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर टालने का सुनियोजित तंत्र बनाया गया। अब सवाल उठता है कि जब 127.78 करोड़ रुपये जनता के टैक्स के गाढ़े पसीने की कमाई से खर्च हुए, तो उसका 88% हिस्सा सूखे गड्डों और कागजी फाइलों में क्यों दफन हो गया? इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष वित्तीय जांच होनी चाहिए ताकि फर्जी आंकड़ों की आड़ में हुई इस बजट की बंदरबांट के दोषियों को बेनकाब किया जा सके।

पौधारोपण के वो सरकारी आंकड़े, जिनसे खुल रही है करोड़ों के फर्जीवाड़े की पोल:

“आंकड़ों का डिजिटल मायाजाल और 80.83 प्रतिशत उत्तरजीविता का कागजी ढिंढोरा आखिरकार किसके लिए? जब 11.57 करोड़ पौधों में से 9.88 करोड़ पौधों का भौतिक सत्यापन ही नहीं हुआ और कुल रोपे गए पौधों में से केवल 1.36 करोड़ ही सांसें ले रहे हैं, तो 127.78 करोड़ रुपये के बजट की सार्थकता पर सवाल उठना लाजमी है। पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य केवल कागजी आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि वास्तविक हरियाली लाना है। अब देखना यह होगा कि क्या संबंधित प्रशासनिक महकमा इन जमीनी वास्तविकताओं से सीख लेकर व्यवस्था में सुधार करेगा या फिर हर साल की तरह यह फाइलें भी अगली ग्रीष्म ऋतु की धूप में सूखते पौधों के साथ दफन हो जाएंगी।”

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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