-मौत की हाइवे रिपोर्ट: हर साल 11,000 मौतें… 2020 से 2025 तक सड़कों पर बहते खून का खौफनाक ग्राफ! ‘डेथ जोन’ में चीखती जिंदगियां, मौतों के आंकड़ों पर सोया प्रशासन!
-लापरवाही की इंतहा: सरकारी तिजोरी में जंग खा रहे हैं 536 करोड़… सुरक्षा निधि खर्च नहीं कर पाया लाचार तंत्र!
-‘मौत के कुएं’ बने ब्लैक स्पॉट्स: न संकेतक, न कानून की पालना… आखिर इन खूनी हादसों का असली कातिल कौन?
जयपुर। क्या प्रदेश में इंसानी जिंदगियों की कीमत कागजी फाइलों और बजट के आंकड़ों से भी सस्ती हो चुकी है? जब सड़कों पर हर दिन दर्जनों लोग तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे हों, तब क्या सरकारी व्यवस्था केवल हादसों के बाद आंकड़े जुटाने तक सीमित रह जाएगी? ‘Expose Now’ की विशेष रिसर्च टीम ने जब सड़क सुरक्षा और हादसों के पिछले 6 सालों के आंकड़ों की परतें खोलीं, तो एक ऐसा भयावह सच सामने आया जो पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करता है। सवाल यह है कि क्या प्रदेश का तंत्र सड़कों पर हो रही मौतों को लेकर रत्ती भर भी गंभीर है या फिर हमारी सड़कें ही ‘मौत का जाल’ बन चुकी हैं? उससे भी बड़ा सवाल यह कि जब सड़क सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत होता है, तो वह पैसा सरकारी तिजोरियों में बंद क्यों पड़ा रह जाता है और जिंदगियां सड़कों पर दम तोड़ देती हैं?
- मौतों का खौफनाक ग्राफ, 6 सालों में 66,000 से अधिक मौतें
‘Expose Now’ की रिसर्च के मुताबिक, वर्ष 2020 से 2025 के बीच प्रदेश की सड़कों पर हादसों और मौतों का ग्राफ किसी महामारी की तरह लगातार ऊपर चढ़ा है। 6 वर्षों के भीतर कुल 1,36,848 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 66,018 बेकसूर लोगों की जान चली गई।
वर्षवार आंकड़ों का विश्लेषण करें तो:

चौंकाने वाला सच: 2020 में जहां सालाना मौतों का आंकड़ा 9,250 था, वहीं 2025 तक पहुंचते-पहुंचते यह बढ़कर 12,069 हो गया। यानी 6 सालों में हादसों के कारण होने वाली मौतों में 30.4% का भयानक इजाफा हुआ है। यह साबित करने के लिए काफी है कि धरातल पर सड़क सुरक्षा के तमाम सरकारी दावे पूरी तरह हवा-हवाई साबित हो रहे हैं।
- 53,600 लाख का बजट सरेंडर, जिंदगी पर भारी लालफीताशाही:-
जब भी किसी सड़क दुर्घटना की बात आती है, तो संसाधनों या बजट की कमी का रोना रोया जाता है। लेकिन ‘Expose Now’ के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि असली वजह बजट की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का शून्य होना है। सड़क सुरक्षा निधि (Road Safety Fund) के तहत स्वीकृत राशि का आधा हिस्सा भी सिस्टम खर्च नहीं कर पा रहा है।
5 सालों का कुल संशोधित बजट (2020-2025): 81,114.10 लाख (811.14 करोड़ रु.)
वास्तविक रूप से खर्च की गई राशि: 27,450.08 लाख (274.50 करोड़ रु.)
बिना उपयोग के सरेंडर बजट: 53,664.02 लाख (536.64 करोड़ रु.)
वर्षवार नाकामी का रिपोर्ट कार्ड:-
2020-21: 5,035 लाख के बजट में से 2,398.65 लाख (47.6%) अनप्रयुक्त रहा।
2021-22: 31,544.49 लाख का विशाल बजट मिला, लेकिन तंत्र केवल 7,510.07 लाख (23.8%) ही खर्च कर सका। करीब 240.34 करोड़ बिना खर्च हुए पड़े रहे।
2022-23: 16,130.85 लाख के संशोधित बजट में से सिर्फ 3,943.05 लाख खर्च हुए और 121.87 करोड़ धूल खाते रहे।
2023-24: 12,982.76 लाख में से 5,699.41 लाख अनप्रयुक्त रहे।
2024-25: 15,421.00 लाख में से मात्र 6,077.26 लाख खर्च हो पाए और 93.43 करोड़ का बजट लैप्स हो गया।
कुल बजट का लगभग 66% हिस्सा (536.64 करोड़ रु.) सरकारी विभागों की ढिलाई और प्रक्रियात्मक विलंब की भेंट चढ़ गया।
- ब्लैक स्पॉट और नियमों का मज़ाक: हादसों व मौतों के लिए असली जिम्मेदार कौन?
‘Expose Now’ की गहन पड़ताल से स्पष्ट होता है कि एक्सीडेंट और मौतों की बढ़ती संख्या के लिए सीधे तौर पर 3 बड़ी खामियां जिम्मेदार हैं:
-सड़कों की इंजीनियरिंग और खस्ताहाल निर्माण: राजमार्गों और जिला सड़कों पर चिन्हित दुर्घटना संभावित क्षेत्रों (Black Spots) को सुधारने के लिए ‘वृहद निर्माण’ एवं ‘सुदृढ़ीकरण’ मद में मिलने वाले बजट का सही समय पर इस्तेमाल ही नहीं होता। वर्ष 2024-25 में इस महत्वपूर्ण मद पर बेहद निराशाजनक खर्च देखने को मिला।
-लापरवाह Enforcement और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी: ओवरस्पीडिंग, बिना हेलमेट/सीटबेल्ट और ड्रंक एंड ड्राइव को रोकने के लिए जरूरी मशीनरी, स्पीड गन, इंटरसेप्टर और सीसीटीवी कैमरे खरीदने में भारी ढिलाई बरती गई। प्रचार-प्रसार व जागरूकता मद में भी बजट को सही ढंग से नियोजित नहीं किया गया।
-अंतर विभागीय तालमेल की कमी: सड़क सुरक्षा कोष के अप्रयुक्त रहने के पीछे मुख्य कारण विभिन्न हितधारक विभागों (पुलिस, पीडब्ल्यूडी, परिवहन, स्वास्थ्य) से समय पर प्रस्ताव प्राप्त न होना और संचालन समिति द्वारा चयनात्मक अनुमोदन में महीनों की देरी करना है।
- क्षेत्रीय असमानता: जिलों में बने ‘डेथ ज़ोन’:-
‘Expose Now’ द्वारा जिलावार आंकड़ों के विश्लेषण से यह भयावह सच सामने आया है कि प्रदेश के कई जिले ‘डेथ जोन’ में तब्दील हो चुके हैं:
-जयपुर कमिश्नरेट व ग्रामीण क्षेत्र: जयपुर (ग्रामीण, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) मिलाकर हर साल 1,200 से अधिक लोग सड़कों पर जान गंवा रहे हैं। जयपुर ग्रामीण अकेले 2025 में 426 मौतों के साथ प्रदेश में सबसे ऊपर रहा।
-दक्षिण व पश्चिमी राजस्थान: उदयपुर में वर्ष 2025 में 515 मौतें हुईं। इसके अलावा सीकर (533 मौतें), बीकानेर (461 मौतें), पाली (325 मौतें), चित्तौड़गढ़ (317 मौतें) और नागौर (309 मौतें) में मौतों का ग्राफ लगातार डरावना रूप ले रहा है।
Expose Now का सीधा सवाल, कब जागेगा सोया हुआ सिस्टम?
आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि जब तक सड़क सुरक्षा निधि का शत-प्रतिशत पारदर्शी उपयोग नहीं होगा, ब्लैक स्पॉट्स का युद्धस्तर पर सुधार नहीं होगा और ट्रैफिक नियमों की कड़ाई से पालना नहीं कराई जाएगी, तब तक सड़कों पर यह खूनी खेल बंद नहीं होगा। ‘Expose Now’ की यह विशेष रिपोर्ट शासन-प्रशासन के लिए एक खुली चेतावनी है कि मौतों के इन आंकड़ों को केवल कागजी संख्या न समझें—इनके पीछे उजड़ते हुए परिवार और सिसकती जिंदगियां भी हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now
