36 दिन तक खाई ठोकरें, नहीं मिला एक भी बांग्लादेशी! फालतू का सियासी हल्ला या बेकार एजेंसियां? अब ‘लाठी मार रही’ खाकी!

जयपुर। राजस्थान में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर पुलिस की 36 दिन की विशेष मुहिम सवालों के घेरे में आ गई है। 25 अगस्त से 30 सितंबर तक चले प्रदेशव्यापी अभियान में एक भी अवैध बांग्लादेशी नागरिक नहीं मिलने की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब पुलिस मुख्यालय ने जिलों से जवाब-तलब करने के अंदाज में हर सप्ताह कार्रवाई की रिपोर्ट मांगने का फैसला किया है। यानी जिस अभियान में पुलिस को संदिग्ध लोगों की पहचान और दस्तावेजों की जांच करनी थी, उसकी समाप्ति पर सामने आया आंकड़ा ‘शून्य’ रहा।


अब पुलिस मुख्यालय ने कार्रवाई का दायरा बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। जिलों को केवल घरों और सामान्य आवासीय इलाकों तक सीमित नहीं रहने, बल्कि निर्माण स्थलों, ईंट-भट्टों, औद्योगिक इकाइयों, कारखानों, होटल, ढाबों और श्रमिक बहुल इलाकों तक पहुंचकर लोगों का सत्यापन करने को कहा गया है। साथ ही हर सप्ताह यह बताना होगा कि कितने लोगों का सत्यापन हुआ, कितने संदिग्ध मिले और कितने ऐसे लोगों को चिन्हित किया गया जिनके दस्तावेज अथवा राज्य में रहने की वैधता संदिग्ध है।

36 दिन की मुहिम और नतीजा शून्य, उठे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रदेश में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर पहले भी गिरफ्तारियां और डिपोर्टेशन होते रहे हैं, तो अगस्त-सितंबर में चलाए गए 36 दिन के अभियान में एक भी व्यक्ति क्यों नहीं मिला?
क्या अभियान के दौरान वास्तविक श्रमिक बस्तियों और बाहरी इलाकों तक पुलिस पहुंची? क्या निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों और ईंट-भट्टों में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के दस्तावेजों की जांच की गई? क्या ठेकेदारों और श्रमिक सप्लायरों से भी जानकारी जुटाई गई? ‘जीरो’ आंकड़ा इन सवालों को और गंभीर बनाता है। अब पुलिस मुख्यालय ने खुद अभियान का दायरा बढ़ाकर संकेत दिया है कि पहले की कार्रवाई केवल पर्याप्त स्थानों तक नहीं पहुंची थी या सत्यापन की प्रक्रिया को और व्यापक बनाने की जरूरत है।

अब घर नहीं, काम की जगह पर भी होगी पड़ताल

नई व्यवस्था में पुलिस को उन स्थानों पर विशेष निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं, जहां दूसरे राज्यों और देशों से आए श्रमिक बड़ी संख्या में काम करते हैं। निर्माणाधीन इमारतें, सड़क निर्माण स्थल, ईंट-भट्टे, औद्योगिक इकाइयां, कारखाने, होटल, ढाबे और अन्य श्रमिक बहुल स्थान अब पुलिस की जांच के दायरे में होंगे। इन स्थानों पर श्रमिकों की पहचान, पते और उपलब्ध दस्तावेजों का सत्यापन किया जाएगा। उद्देश्य यह पता लगाना है कि कोई व्यक्ति बिना वैध दस्तावेजों के तो नहीं रह रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि यदि ऐसे स्थानों की जांच अब की जा रही है तो पिछली 36 दिन की मुहिम में इन जगहों को कितनी गंभीरता से कवर किया गया था?

मुख्यालय ने साप्ताहिक रिपोर्ट से बढ़ाई जवाबदेही

अब पुलिस मुख्यालय ने मामले को नियमित निगरानी में लेने का फैसला किया है। प्रत्येक जिले को सप्ताहवार रिपोर्ट देनी होगी। इसमें कार्रवाई की संख्या के साथ-साथ सत्यापन किए गए लोगों का विवरण और संदिग्ध अथवा अवैध रूप से निवासरत पाए गए व्यक्तियों की जानकारी भी देनी होगी। इस व्यवस्था से जिला स्तर पर होने वाली कार्रवाई का आंकड़ा सीधे मुख्यालय तक पहुंचेगा। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन सा जिला अभियान को गंभीरता से चला रहा है और कहां कार्रवाई महज औपचारिकता तक सीमित है।

एसपी से लेकर सीआईडी तक जिम्मेदारी

आईजी इंटेलीजेंस विष्णुकांत की ओर से जारी आदेश में प्रदेश के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों, जयपुर और जोधपुर के पुलिस उपायुक्तों, संबंधित जोन अधिकारियों तथा सीआईडी के जैसलमेर और बाड़मेर में तैनात अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। संबंधित अधिकारियों को आपसी समन्वय से उपलब्ध सूचनाओं का सत्यापन करने और नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है। इससे अब जिम्मेदारी केवल थाने के स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों को भी कार्रवाई की निगरानी करनी होगी।

पुराने आंकड़े बता रहे हैं अलग कहानी

पुलिस के पुराने आंकड़ों को देखें तो ‘जीरो’ रिपोर्ट और भी सवाल खड़े करती है। वर्ष 2024 में 22 बांग्लादेशी नागरिकों की गिरफ्तारी और 14 के डिपोर्टेशन की जानकारी सामने आई थी। वर्ष 2025 में 23 गिरफ्तारियों और 16 डिपोर्टेशन का आंकड़ा बताया गया। इसके बाद अप्रैल-मई 2025 की राज्यव्यापी विशेष कार्रवाई में भी बड़ी संख्या में संदिग्ध अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई थी।
इसके अलावा 15 दिसंबर 2023 से 30 जून 2026 तक 1064 लोगों को पकड़े जाने और 1067 को डिपोर्ट किए जाने का आंकड़ा भी सामने आया है। ऐसे में अगस्त से सितंबर 2026 तक 36 दिन चले विशेष अभियान में एक भी व्यक्ति नहीं मिलना पुलिस की पिछली कार्रवाई के आंकड़ों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है।

सवाल सिर्फ ‘कितने मिले’ का नहीं, जांच कितनी हुई इसका भी

अवैध प्रवासियों की पहचान जैसे संवेदनशील मामले में केवल गिरफ्तारी का आंकड़ा ही सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि पुलिस ने कितने लोगों की जांच की, कितने दस्तावेजों का सत्यापन किया और कितने संदिग्ध लोगों की पृष्ठभूमि की जांच की।
अगर 36 दिन के अभियान में बड़ी संख्या में लोगों का सत्यापन किया गया और सभी वैध मिले तो ‘जीरो’ रिपोर्ट अभियान की सफलता भी हो सकती है। लेकिन यदि जांच सीमित रही और श्रमिक बहुल क्षेत्रों तक पुलिस पहुंच ही नहीं पाई तो यही ‘जीरो’ आंकड़ा अभियान की कमजोरी का संकेत भी माना जाएगा। इसीलिए अब मुख्यालय ने साप्ताहिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था की है। आने वाले सप्ताहों में आंकड़े बताएंगे कि पहले की ‘जीरो’ रिपोर्ट वास्तविक स्थिति थी या फिर जांच का दायरा ही अधूरा रह गया था।

गृह मंत्रालय की बैठक के बाद बढ़ा दबाव

16 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह सचिव की बैठक में राज्यों में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उनके निष्कासन को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए थे। इसके बाद राजस्थान में भी संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय और कार्रवाई को लगातार जारी रखने पर जोर दिया गया। अब देखने वाली बात यह होगी कि नई साप्ताहिक रिपोर्टिंग व्यवस्था के बाद राजस्थान पुलिस के आंकड़ों में क्या बदलाव आता है। फिलहाल 36 दिन की तलाश का ‘शून्य’ नतीजा पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है और मुख्यालय का सख्त आदेश इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश माना जा रहा है।


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