राजस्थान अब देशभर में लोकल के लिए वोकल का बड़ा मॉडल स्टेट बनने वाला है। तरीका बहुत सिंपल, खरीदी में ‘मेक इन इंडिया’ प्रोडक्ट को प्राथमिकता। मतलब ये कि राजस्थान सरकार अब विभागों में खरीदे जाने वाले सामान, माल सप्लाई और टेंडर में ‘मेक इन इंडिया’ प्रोडक्ट को तवज्जो देगी। इसके लिए वित्त विभाग ने सर्कुलर जारी कर प्रावधान लागू किए हैं। वित्त विभाग ने हर विभाग से साफ-साफ कह दिया है कि टेंडर की शर्तें इस तरह तय करें जिससे लोकल सप्लायर्स और देसी कंपनियों को फायदा मिले।
नहीं अपनाया लोकल वाला फंडा तो चलेगा डंडा
प्रावधान में ये व्यवस्था की गई है कि अगर उन्हें नहीं माना गया तो एक्शन तय है। टेंडर की शर्तों में स्वदेशी कंपनियों, लोकल सप्लायर्स के साथ भेदभाव और प्रतिबंध वाली शर्तें रखी तो दोषी अफसरों के खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई होगी। यानि प्रावधानों का सभी विभागों को सख्ती से पालन करना ही होगा। इसका असर बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर भी पड़ेगा क्योंकि इनमें कई विदेशी कंपनियां भी भाग लेती हैं।
प्रावधान के HIGHLIGHTS
टेंडर की शर्तों में विदेशी सर्टिफिकेट मांगना स्थानीय कंपनियों से भेदभाव होगा
टेंडर की शर्तें ऐसी हों जिससे स्थानीय कंपनियां बाहर ना हो
Make In India को वरीयता देने का उल्लेख हो
10 करोड़ से ज्यादा के टेंडर पर स्थानीय सामग्री का प्रमाण पत्र अनिवार्य
सर्टिफिकेट झूठा निकला तो फर्म 2 साल के लिए ब्लैक लिस्टेड

जानिए क्या कहते हैं सर्कुलर के प्रावधान…
विदेशी सर्टिफिकेशन की डिमांड स्थानीय कंपनियों से पक्षपात
सरकारी विभागों में निकाले जाने वाले टेंडर में कंपनी, फर्म का टर्नओवर, काम का अनुभव, उत्पादन और वित्तीय क्षमता से जुड़ी शर्तों को इस तरह तय करना होगा जिससे स्वदेशी कंपनियां अनावश्यक रूप से बाहर नहीं हों। टेंडर डॉक्यूमेंट्स में विदेशी प्रमाण-पत्रों, अनुचित टेक्निकल स्पेशिफिकेशन, ब्रांड, मॉडल का उल्लेख करना स्थानीय कंपनियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक और भेदभावपूर्ण होगा। यदि किसी स्थिति में भारतीय मानक उपलब्ध नहीं होते तो विदेशी प्रमाण पत्रों का प्रावधान बिना सक्षम स्तर से मंजूरी के नहीं रखा जाएगा।
‘मेक इन इंडिया’ का डॉक्यूमेंट में उल्लेख MUST
सरकारी विभागों में सप्लाई होने वाले आइटम्स में लोकल कंटेंट कम से कम 50% होगा। मेक इन इंडिया को तरजीह देने की प्रक्रिया का उल्लेख करना होगा। टेंडर प्रक्रिया में इसे लेकर कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा।
स्थानीय सामग्री का सर्टिफिकेट अनिवार्य
10 करोड़ से ज्यादा के टेंडर में सप्लाई करने वाली फर्म को चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से स्थानीय सामग्री की मात्रा का सर्टिफिकेट देना होगा। हर टेंडर में भाग लेने वाली कंपनी या फर्म को सेल्फ डिक्लेरेशन देना होगा कि उसके प्रोडक्ट ‘मेक इन इंडिया’ हैं। इन दावों की जांच की जाएगी।
सर्टिफिकेट झूठा निकला तो ‘ब्लैक लिस्ट’
बिड लगाते समय विक्रेता फर्म को स्थानीय सामग्री की पात्रता का डिक्लेरेशन देना होगा। 10 करोड़ से अधिक की खरीद के टेंडर में कंपनी के वैधानिक ऑडिटर (स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट) , कॉस्ट ऑडिटर या चार्टर्ड अकाउंटेंट से स्थानीय सामग्री का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होगा। डिक्लेरेशन सर्टिफिकेट झूठा पाए जाने पर फर्म को 2 साल तक के लिए ब्लैक लिस्ट कर दिया जाएगा।
स्थानीय सामग्री की परिभाषा भी तय की गई है। किसी टेंडर में एक से ज्यादा चीजों की खरीद होनी है और उसकी दरें अलग-अलग हैं, तो स्थानीय विक्रेता फर्म, उस फर्म को माना जाएगा, जिसके कम से कम 50% आइटम भारत में बने हुए हैं।
विदेश से चीजें मंगवाकर रिफर्बिश करना, लोकल आइटम नहीं
ये साफ कर दिया गया है कि विदेश से चीजें मंगवाकर रिफर्बिश यानि पुराने प्रोडक्ट की मरम्मत करने को लोकल आइटम नहीं माना जाएगा। वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि रिफर्बिश का मतलब आयातित उत्पाद की मरम्मत या उसे सुधार कर ठीक करना है लेकिन ये मैन्युफैक्चरिंग के समान नहीं है। चूंकि इसके जरिए कोई नया माल अस्तित्व में नहीं आता इसलिए इसे स्थानीय सामग्री में नहीं माना जाएगा। साथ ही, विदेश से आयात चीजों को रिसेल करने वालों को भी लोकल आइटम नहीं माना जाएगा।
केंद्र सरकार की गाइडलाइन के बाद जारी हुआ सर्कुलर
‘मेक इन इंडिया’ प्रोडक्ट को तवज्जो देने को लेकर केंद्र सरकार पहले ही गाइडलाइन जारी कर चुकी है। केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट्स में पहले से ही स्थानीय कंपनियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान लागू है। केन्द्र की तर्ज पर ही अब राज्य सरकार ने भी स्वदेशी कंपनियों को सरकारी कामों के टेंडर और सरकारी खरीद में तवज्जो देने का सर्कुलर जारी किया है।