-पुराना कर्ज चुकाने के लिए 2.62 लाख करोड़ का नया लोन, चक्रव्यूह में फंसा सूबे का वित्तीय प्रबंधन
-आम आदमी पर 20% का अतिरिक्त टैक्स डाका, मकान की रजिस्ट्री और गाड़ियां खरीदना हुआ बेहद महंगा
-जीएसटी की रफ्तार तेज तो वाणिज्यिक कर क्यों पस्त? विभागों की सुस्त कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
-केंद्र की रिकॉर्ड मदद और राजस्व वृद्धि के बाद भी बेकाबू हुए हालात, विधानसभा में तारांकित प्रश्न के जवाब से खुली पोल
जयपुर। राजस्थान सरकार पर सार्वजनिक ऋण का बोझ लगातार पैर पसार रहा है। जो आंकड़े सामने हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 तक राज्य पर कुल बकाया कर्ज बढ़कर 5,65,814.94 करोड़ (करीब 5.65 लाख करोड़) हो गया है। अगर दो साल पहले की स्थिति देखें, तो 31 मार्च 2024 को यह कर्ज 4,46,651.63 करोड़ था। यानी महज दो साल के भीतर ही राज्य पर करीब ₹1.19 लाख करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लाद दिया गया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि राज्य सरकार पुराने कर्ज की अदायगी करने के लिए भी नया कर्ज लेने को मजबूर है।
पुराना चुकाने के लिए 2.62 लाख करोड़ का नया लोन:-
आंकड़े बताते हैं कि साल 2025-26 में कर्ज का यह मर्ज और ज्यादा बढ़ गया है। इस वित्तीय वर्ष में सरकार को 2,62,542.41 करोड़ का नया ऋण लेना पड़ रहा है। इसमें से 1,99,124.02 करोड़ की राशि पुराने कर्ज की अदायगी (repayment) में ही चली जाएगी। इसके बाद सरकार के पास शुद्ध बढ़ोतरी के रूप में केवल 63,418.40 करोड़ ही बचेंगे। साफ है कि राज्य पूरी तरह से कर्ज के ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है जहां पुराना चुकाने के लिए नया रास्ता तलाशना पड़ रहा है।
जनता की जेब पर डाका, रजिस्ट्री और गाड़ियां खरीदना हुआ 20% तक महंगा:-
एक तरफ सरकार कर्ज के दलदल में डूब रही है, तो दूसरी तरफ इसका सीधा खामियाजा प्रदेश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। सरकार का राजस्व तो बढ़ रहा है, लेकिन वह सीधे आम आदमी की जेब से निकाला जा रहा है। 2023-24 की तुलना में 2025-26 में राज्य के स्वयं के कर राजस्व में 20.68% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। स्टाम्प एवं पंजीयन (जमीन-मकान की रजिस्ट्री) में 35% का जबर्दस्त उछाल आया है। यह राजस्व 9,181.49 करोड़ से बढ़कर 12,400.54 करोड़ तक पहुंच गया है। यानी अब मकान-जमीन खरीदना बेहद महंगा हो गया है। गाड़ियों पर लगने वाला टैक्स 6,703.59 करोड़ से बढ़कर 8,325.03 करोड़ हो गया है। इन प्रमुख मदों में मनमानी बढ़ोतरी के कारण आम जनता की जेब पर सीधे तौर पर 20% से अधिक का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा है।
जीएसटी की रफ्तार तेज तो वाणिज्यिक कर क्यों पस्त?
राजस्व वसूली का पूरा ब्योरा: विभिन्न सरकारी विभागों से होने वाली तीन साल की कर वसूली प्रदेश के आर्थिक असंतुलन को साफ बयां करती है:
-जीएसटी (GST): वर्ष 2023-24 में 38,015.97 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 45,052.42 करोड़ तक पहुंच गया।
-वाणिज्यिक कर: वर्ष 2023-24 में यह 23,473.19 करोड़ था, लेकिन अगले ही साल इसमें भारी गिरावट आई और वर्ष 2024-25 में यह सिर्फ 24,746.24 करोड़ तक ही पहुंच पाया।
-उत्पाद शुल्क: आबकारी विभाग से राजस्व 13,224.81 करोड़ से बढ़कर 16,401.88 करोड़ हुआ।
-खनिज राजस्व: माइनिंग सेक्टर में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 7,460.48 करोड़ से बढ़कर 10,381.52 करोड़ हो गया।
-कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान: जब जीएसटी और खनिज जैसे विभागों में बंपर कमाई हो रही है, तो वाणिज्यिक कर विभाग की रफ्तार इतनी सुस्त क्यों है? यह विसंगति सीधे तौर पर विभाग की रिकवरी व्यवस्था और ढीले प्रवर्तन तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
केंद्र की रिकॉर्ड मदद और राजस्व वृद्धि के बाद भी बेकाबू हुए हालात:-
राज्य सरकार अपनी नाकामी का ठीकरा केंद्र पर नहीं फोड़ सकती, क्योंकि केंद्र से मिलने वाले फंड में लगातार रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2023-24 में केंद्र से 89,897.74 करोड़ मिले।
वर्ष 2024-25 में यह राशि बढ़कर 1,00,437.54 करोड़ हुई।
वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा और ऊपर चढ़कर 1,08,072.33 करोड़ तक पहुंच गया।
बढ़ते राजस्व के बीच खड़े हैं तीन बड़े कदम: इस वित्तीय संकट से निपटने के लिए अब सरकार तीन मोर्चों पर काम करने का दावा कर रही है—अवैध शराब और कर चोरी रोकने के लिए नई आबकारी नीति, टैक्स लीकेज रोकने के लिए डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार और सुस्त विभागों से जबरन वसूली के लिए डेटा आधारित कड़ी निगरानी व प्रवर्तन तंत्र।
विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों से खुली पोल:-
केंद्र से हर साल एक लाख करोड़ से ज्यादा की मदद मिलने और आम जनता पर टैक्स का भारी बोझ लादने के बावजूद प्रदेश का वित्तीय ढांचा चरमरा गया है। वित्तीय कुप्रबंधन और कर्ज के इस खतरनाक दलदल का यह पूरा काला चिट्ठा किसी और ने नहीं, बल्कि खुद सरकार ने 16वीं विधानसभा के पंचम सत्र में तारांकित प्रश्न के लिखित जवाब में स्वीकार किया है।
‘Expose Now’ का तीखा सवाल: जब केंद्र से पर्याप्त मदद मिल रही है और आम जनता से भी टैक्स के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है, तो फिर यह सवा पांच लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज किसके स्वार्थ और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ रहा है? सरकार जवाब दे!
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now