-खाकी को सलाम: पुलिस के ‘ऑपरेशन गरिमा’ और ‘ऑपरेशन खुशी’ से हजारों परिवारों की लौटी मुस्कान, 11 हजार से ज्यादा बालिकाओं की सुरक्षित घर वापसी
-सिस्टम के लिए चुनौती बनीं 466 मासूम: आखिर कहां गुम हो गईं ये बेटियां? क्या मानव तस्करी गैंग का हुईं शिकार? एक्सपोज नाउ की स्पेशल रिसर्च रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
जयपुर। बेटियां किसी भी घर का आंगन होती हैं, लेकिन जब वही बेटियां अचानक लापता हो जाएं, तो परिवारों पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। वर्तमान में राजस्थान के हालातों और कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन ‘Expose Now’ की विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिसर्च में प्रदेश की बालिकाओं के लापता होने को लेकर बेहद चौंकाने वाले और सनसनीखेज आंकड़े सामने आए हैं। जनवरी 2024 से लेकर दिसम्बर 2025 तक के महज 2 सालों के भीतर, पूरे राजस्थान प्रदेश से कुल 11,762 बालिकाएं लापता हुईं। यह आंकड़ा अपने आप में डराने वाला है और समाज की वर्तमान स्थिति पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
लेकिन इस खौफनाक मंजर के बीच एक बेहद सुखद और राहत भरी तस्वीर भी है, जो सीधे तौर पर राजस्थान पुलिस के अथक प्रयासों, जज्बे और उनकी कार्यप्रणाली की सफलता की कहानी बयां करती है। इन 11,762 लापता बालिकाओं में से राजस्थान पुलिस की मुस्तैदी के चलते 11,296 बालिकाओं को सकुशल बरामद (दस्तायाब) कर लिया गया है। इतनी बड़ी संख्या में बेटियों को वापस उनके घर पहुंचाकर पुलिस ने हजारों परिवारों को उजड़ने से बचाया है, जिसके लिए राजस्थान पुलिस की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। हालांकि, पुलिस के इस शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के बावजूद 466 बालिकाएं आज भी लापता हैं, जो प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
राजस्थान पुलिस का ‘मिशन रिकवरी’, जब खाकी ने निभाया अपना फर्ज:-
वर्तमान में प्रदेश के अंदर बालिकाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में जब कोई बच्ची लापता होती है, तो पुलिस पर भारी दबाव होता है। ‘Expose Now’ की रिसर्च के अनुसार, राजस्थान पुलिस ने बालिकाओं को खोजने के लिए सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं की, बल्कि जमीनी स्तर पर कई विशेष अभियान चलाए। पुलिस मुख्यालय के निर्देशन में समय-समय पर ‘ऑपरेशन गरिमा’, ‘ऑपरेशन उमंग’ और ‘ऑपरेशन खुशी’ जैसे विशेष अभियान चलाए गए।
इन अभियानों का ही नतीजा है कि पुलिस 11,296 बालिकाओं को सकुशल उनके परिजनों तक पहुंचाने में कामयाब रही। लापता बालिकाओं को खोजने के लिए राजस्थान पुलिस ने थानों से लेकर एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग (ए.एच.टी.) यूनिट तक का एक मजबूत जाल बिछा रखा है।
गोल्डन आवर (24 घंटे) का मास्टरप्लान और कड़ा SOP:-
पुलिस की इस भारी सफलता के पीछे उनका मजबूत ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (S.O.P.) है। पुलिस मुख्यालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि बालिका के गुम होने की सूचना मिलते ही पहले 24 घंटों (Golden Hour) को सबसे महत्वपूर्ण माना जाए और बिना किसी देरी के एफ.आई.आर. (F.I.R.) दर्ज की जाए।
-बालिका के गायब होने की सूचना मिलते ही पुलिस कंट्रोल रूम के जरिए पूरे जिले के थानों, मोबाइल गश्त, और बस स्टैंड चौकियों को तुरंत अलर्ट कर दिया जाता है।
-सबसे पहले सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगाले जाते हैं और मोबाइल की लोकेशन निकालकर रूट चार्ट तैयार किया जाता है।
-तलाश के लिए ‘मिशन वात्सल्य’ वेब पोर्टल पर गुमशुदा बालिका का पूरा विवरण और फोटो अपलोड कर दिया जाता है।
अगले 3 से 7 दिनों के भीतर पुलिस तकनीकी साक्ष्यों जैसे कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का विश्लेषण करती है, अनाथालयों व नारी निकेतनों में तलाश करती है और बालिका व संदिग्धों के आधार कार्ड (Aadhar Card) अपडेशन से लेकर बैंक खातों तक की पूरी जन्मकुंडली खंगाल लेती है। इस साइंटिफिक और त्वरित अनुसंधान का ही परिणाम है कि राजस्थान में 96% से ज्यादा लापता बालिकाओं को पुलिस ने ढूंढ निकाला है।
50 बच्चे ढूंढने वाले पुलिसकर्मियों को विशेष प्रमोशन:-
पुलिसकर्मियों के इसी जज्बे को बरकरार रखने के लिए पुलिस विभाग ने एक बेहतरीन प्रोत्साहन योजना भी लागू की है। ऐसे कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल या सहायक उप निरीक्षक जो 12 महीने के भीतर 18 साल से कम उम्र के 50 बच्चों (जिनमें 14 वर्ष से कम आयु के 25 बच्चे हों) को बरामद करते हैं, उन्हें विशेष पदोन्नति (आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन) देने का प्रावधान किया गया है। वहीं, 20 बच्चे ढूंढने वाले कार्मिकों को महानिदेशक पुलिस प्रशस्ति रोल से सम्मानित किया जाता है। जमीनी स्तर के पुलिसकर्मियों को दिया जाने वाला यह इनाम उनकी मेहनत का असली सम्मान है।
‘Expose Now’ के अहम सवा, कहां हैं 466 बेटियां:-
पुलिस के शानदार काम की सराहना के बीच हम उन 466 परिवारों का दर्द नहीं भूल सकते, जिनकी आंखों के तारे आज भी लापता हैं।
-आखिर 2 साल बीत जाने के बाद भी इन 466 बालिकाओं का सुराग क्यों नहीं लग पाया?
-क्या ये मासूम बच्चियां किसी अंतरराज्यीय मानव तस्करी (Human Trafficking) गिरोह के हत्थे चढ़ गई हैं?
-क्या उन्हें बाल मजदूरी या किसी अन्य घिनौने अपराध की भट्टी में झोंक दिया गया है?
वर्तमान में राजस्थान के बॉर्डर इलाकों और हाईवे से सटे जिलों में ऐसे कई गिरोह सक्रिय होने की आशंका बनी रहती है, जो मासूम बच्चियों को अपना शिकार बनाते हैं। जिन बालिकाओं का तीन महीने तक कोई सुराग नहीं लगता, उनके परिजनों के डीएनए (DNA) प्रोफाइलिंग के जरिए भी शिनाख्त के प्रयास किये जाते हैं। लेकिन इन 466 मामलों में कहीं न कहीं शातिर अपराधियों ने पुलिस के डिजिटल और मैन्युअल नेटवर्क को चकमा दिया है।
Expose Now की रिसर्च के प्रमुख बिंदु (फैक्ट शीट):
-कुल गुमशुदा: जनवरी 2024 से दिसम्बर 2025 के मध्य प्रदेश में कुल 11,762 बालिकाएं लापता हुईं।
-पुलिस की सफलता: पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 11,762 में से 11,296 बालिकाओं को बरामद कर लिया। शेष लापता: तमाम कोशिशों के बावजूद 466 बालिकाएं अब भी लापता हैं, जिनकी तलाश जारी है।
-विशेष अभियान: इन बालिकाओं को ढूंढने में ‘ऑपरेशन गरिमा’, ‘ऑपरेशन उमंग’ और ‘ऑपरेशन खुशी’ की सबसे अहम भूमिका रही।
-तकनीकी तंत्र का इस्तेमाल: पुलिस ने मिशन वात्सल्य, सीसीटीवी फुटेज, और सीडीआर जैसी तकनीकी मदद से इन बालिकाओं को मौत और अंधेरे के मुंह से वापस निकाला।
466 बेटियों की तलाश में जारी रहे खाकी का ‘ऑपरेशन’:-
राजस्थान पुलिस ने 11 हजार से ज्यादा बच्चियों को खोजकर यह साबित कर दिया है कि अगर प्रशासन दृढ़ संकल्प ले ले, तो कोई भी अपराधी कानून की पहुंच से बाहर नहीं हो सकता। पुलिस की इस तत्परता ने आमजन में सुरक्षा का एक बड़ा संदेश दिया है। जरूरत इस बात की है कि जिन 466 बालिकाओं का अब तक सुराग नहीं लगा है, उनके लिए एक नई सिरे से स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (S.I.T.) का गठन किया जाए। राजस्थान के वर्तमान हालातों में बालिकाओं की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक प्रदेश की एक-एक बेटी सुरक्षित अपने घर नहीं लौट आती, तब तक सिस्टम को चैन से नहीं बैठना चाहिए।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now