जयपुर: राजस्थान की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के कैबिनेट मंत्री रहे वरिष्ठ नेता महेश जोशी को बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज मामले में शीर्ष अदालत ने महेश जोशी और सह-आरोपी मुकेश पाठक की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए नियमित जमानत मंजूर कर ली है। इस फैसले के बाद पूर्व मंत्री के 5 महीने बाद जेल की सलाखों से बाहर आने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
12 अक्टूबर को सुरक्षित रखा था फैसला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने महेश जोशी की जमानत याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 12 अक्टूबर को अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए अदालत ने पूर्व मंत्री और सह-आरोपी को राहत प्रदान की।
राजस्थान हाईकोर्ट ने खारिज की थी याचिका
इससे पहले अगस्त 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट (जस्टिस विपिन गुप्ता की एकलपीठ) ने अपराध की गंभीरता और सरकारी खजाने को हुए भारी आर्थिक नुकसान का हवाला देते हुए महेश जोशी, पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल सहित कुल 8 आरोपियों की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए महेश जोशी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी।
मई 2026 में ACB ने की थी दूसरी गिरफ्तारी

महेश जोशी को इस पूरे प्रकरण में दोहरी जांच का सामना करना पड़ा है:
- ईडी की कार्रवाई (2025): प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत 24 अप्रैल 2025 को महेश जोशी को गिरफ्तार किया था। लगभग 7 महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद 3 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी आयु (71 वर्ष) और लंबी हिरासत अवधि को देखते हुए नियमित जमानत दी थी।
- एसीबी की कार्रवाई (2026): ईडी मामले में राहत मिलने के कुछ महीनों बाद ही 7 मई 2026 को राजस्थान एसीबी ने 900 करोड़ रुपये से अधिक के टेंडर आवंटन घोटाले और कमीशनखोरी के सिलसिले में उनके जयपुर आवास से उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया था। इस मामले में वे पिछले 5 महीनों से जेल में थे।
क्या है जल जीवन मिशन (JJM) घोटाला?
केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘हर घर जल’ के तहत राजस्थान में ग्रामीण परिवारों तक नल से जल पहुंचाने के लिए हजारों करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार:
- फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों और जाली दस्तावेजों के आधार पर चहेती कंपनियों को टेंडर आवंटित किए गए।
- घटिया गुणवत्ता के पाइप और निर्माण सामग्री का इस्तेमाल कर सरकारी धन की बंदरबांट की गई।
- निविदा आवंटन और बिल पास कराने के एवज में राजनेताओं, वरिष्ठ नौकरशाहों और बिचौलियों के सिंडिकेट द्वारा करोड़ों रुपये के कमीशन और रिश्वतखोरी का लेनदेन हुआ।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमित जमानत दिए जाने के बाद अब कानूनी औपचारिकताएं पूरी होते ही पूर्व मंत्री जेल से रिहा हो सकेंगे। राजनीतिक विश्लेषक इसे राजस्थान की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम मान रहे हैं।