कोटा। कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पिछले दिनों हुई पांच प्रसूताओं की मौत के बेहद संवेदनशील मामले में राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं नियंत्रक चिकित्सालय समूह, कोटा के प्रधानाचार्य डॉ. नीलेश कुमार जैन की ओर से आधिकारिक स्थिति स्पष्ट की गई है। चिकित्सा विशेषज्ञों की राय और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर राज्य सरकार ने चिकित्सकों को बड़ी राहत देते हुए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को सीधे तौर पर इन मौतों का प्रत्यक्ष कारण मानने से इनकार कर दिया है।
विशेषज्ञों की राय: सेप्सिस और MODS बनीं मौत की जटिलताएं

मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. नीलेश कुमार जैन ने बताया कि उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड्स और विशेषज्ञों की गहन समीक्षा में यह स्पष्ट हुआ है कि मृत प्रसूताओं में मुख्य रूप से सेप्सिस (गंभीर संक्रमण) तथा मल्टी ऑर्गन डिसफंक्शन सिंड्रोम (MODS) जैसी गंभीर जटिलताएं पाई गई थीं।
रिकॉर्ड्स में ऐसा कोई स्पष्ट चिकित्सकीय प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के अप्रभावी होने के कारण अनियंत्रित रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage – PPH) हुआ या वही मृत्यु का सीधा कारण बना। मेडिकल कॉलेज के फार्माकोलॉजी विभागाध्यक्ष के अनुसार, यदि किसी दवा में कंटेंट शून्य या कम हो, तो वह दवा अपना काम करने में असमर्थ हो सकती है, लेकिन इससे मरीज को रीनल फेल्योर (किडनी खराब) हो जाए, यह चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से संभव प्रतीत नहीं होता।
37 में से केवल 1 सैंपल मिला ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’
दवाओं की जांच रिपोर्ट का ब्योरा देते हुए डॉ. जैन ने बताया कि औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा इस प्रकरण में उपयोग में ली गई विभिन्न दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के कुल 37 सैंपल जांच के लिए एकत्रित किए गए थे। इनमें से 28 सैंपल राज्य औषधि परीक्षण प्रयोगशाला, जयपुर तथा अन्य सैंपल राष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाओं को भेजे गए।

अब तक प्राप्त रिपोर्ट्स में लगभग सभी दवाएं मानक गुणवत्ता की पाई गई हैं। केवल ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन (ब्रांड नाम TOCIN, बैच नंबर I-7881) के एक सैंपल में निर्धारित घटक नहीं पाया गया, जिसके आधार पर उक्त विशिष्ट बैच को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी/स्प्यूरियस” घोषित किया गया है।
वैकल्पिक उपचार भी थे उपलब्ध
विशेषज्ञों ने यह भी साफ किया है कि प्रसवोत्तर रक्तस्राव (PPH) की स्थिति में ऑक्सीटोसिन के अतिरिक्त कई अन्य प्रभावी और स्थापित उपचार हमेशा उपलब्ध रहते हैं। इनमें मिसोप्रोस्टोल, कार्बोप्रोस्ट, मेथाइल अर्गोमेट्रिन, ट्रानेक्सेमिक एसिड, यूटेराइन टेम्पोनैड एवं आवश्यक सर्जिकल इंटरवेंशन शामिल हैं। उपलब्ध अभिलेखों में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि ऑक्सीटोसिन के प्रभावहीन रहने के कारण इन वैकल्पिक उपचारों की आवश्यकता विशेष रूप से उत्पन्न हुई हो।
दवा के स्टॉक पर रोक, सरकार की कार्रवाई जारी
भले ही तकनीकी रूप से दवा का मौतों से सीधा संबंध प्रमाणित नहीं हुआ है, लेकिन राज्य सरकार और औषधि नियंत्रण विभाग ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। संबंधित बैच (TOCIN, बैच नंबर I-7881) के समस्त उपलब्ध स्टॉक की बिक्री एवं उपयोग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही निर्माता, सप्लायर एवं वितरण श्रृंखला की विस्तृत जांच प्रारंभ कर दी गई है। इस प्रकरण में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
विपक्ष और जनता में उठ रहे सवाल
प्रधानाचार्य ने स्पष्ट किया है कि सिजेरियन डिलीवरी में इस इंजेक्शन के उपयोग को मृत्यु के प्रत्यक्ष कारण के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता और किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी चिकित्सकीय, प्रयोगशाला एवं प्रशासनिक जांचों का पूर्ण होना आवश्यक है।
हालांकि, पूरे मामले में सरकार की इस ‘क्लीन चीट’ पर सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर सवाल भी उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि एक तरफ संबंधित दवा के बैच को घटिया मानकर उस पर रोक लगाई गई है, और दूसरी तरफ मौतों से उसका संबंध न मानना विरोधाभास पैदा करता है। इस पर राज्य सरकार ने दोहराया है कि वह पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, वैज्ञानिक एवं पारदर्शी जांच के लिए प्रतिबद्ध है तथा दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति, संस्था अथवा कंपनी के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।