JJM महाघोटाला: भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का खेल बेनकाब, 53 चार्जशीट अटकीं, अब ‘रक्षक’ ही आएंगे रडार पर!

जयपुर। जल जीवन मिशन (JJM) में जनता की गाढ़ी कमाई को डकारने वाले भ्रष्ट तंत्र का एक और सनसनीखेज सच सामने आया है। नियमों और ईमानदारी को ताक पर रखकर बिना काम किए ही 55 करोड़ का फर्जी पेमेंट डकारने वाले महकमे में अब गुनहगारों को बचाने की बड़ी साजिश चल रही है। “Expose Now” को मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, विभाग के आला अधिकारियों ने घोटाला करने वाले इंजीनियरों और कर्मचारियों की 53 चार्जशीट (आरोप-पत्र) को अटका कर रखा है। लेकिन अब इस सुरक्षा कवच को भेदने के लिए सरकार ने सीधे दखल दिया है और लेटलतीफी करने वाले बड़े अफसरों पर भी गाज गिरना तय हो गया है।

प्रमुख सचिव का कड़ा रुख, फाइल दबाने वाले अफसरों की तय होगी जवाबदेही:-

जानकारी के अनुसार जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के प्रमुख सचिव हेमंत गेरा ने इस पूरे मामले पर गहरी नाराजगी जताते हुए जेजेएम के चीफ इंजीनियर से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। प्रमुख सचिव ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी भी स्तर पर जानबूझकर फाइलों को दबाया गया या देरी की गई, तो उन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

-39 राजसेवकों के खिलाफ तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई के प्रस्ताव भेजे जाएं।

-13 ऐसे राजसेवकों की पहचान और वर्तमान पदस्थापन स्पष्ट करने को कहा गया है, जिनका ब्यौरा अब तक गायब है।

छुट्टी के दिन भी खुली थी खिड़की, फिर क्यों रुकी चार्जशीट:-

इस महाघोटाले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभाग ने कुल 139 अधिकारियों और कर्मचारियों को नोटिस जारी किए थे। मुख्यालय में अवकाश (छुट्टी) के दिनों में भी विशेष कैंप लगाकर चार्जशीट थमाने का काम किया गया था। इसके बावजूद, भ्रष्ट लॉबी के रसूख के चलते 53 अधिकारियों की चार्जशीट अब तक जारी नहीं की जा सकी है, जिससे सरकार की जीरो-टॉलरेंस नीति को खुली चुनौती मिल रही है।

कैसे हुआ 55 करोड़ का खेल:-

जलदाय विभाग के भ्रष्ट इंजीनियरों और चहेते ठेकेदारों (मैसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी व मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी) ने मिलकर जनता के पैसों की जमकर बंदरबांट की:

-कागजों पर बिछी पाइपलाइन: जमीनी स्तर पर कोई काम ही नहीं हुआ, लेकिन माप पुस्तिका (MB) में फर्जी एंट्री दर्ज कर ठेकेदारों को करोड़ों का भुगतान कर दिया गया।

-प्लास्टिक को बताया ‘डक्टाइल आयरन’: गांवों में सस्ती प्लास्टिक की पाइपलाइन डाली गई, लेकिन बिलों में उन्हें महंगी डक्टाइल आयरन (DI) दिखाकर चार गुना ज्यादा पेमेंट उठाया गया।

-फोटोकॉपी बिलों का मायाजाल: मूल दस्तावेजों के बजाय सिर्फ फोटोकॉपी बिलों के आधार पर ही करोड़ों रुपयों के वारे-न्यारे कर दिए गए।

-TPIA की आपत्तियां दरकिनार: थर्ड पार्टी निरीक्षण एजेंसी (TPIAE) की गंभीर आपत्तियों और चेतावनियों के बावजूद ठेकेदारों की जेबें भरी जाती रहीं।

-फर्जी सर्टिफिकेट पर टेंडर: अनुभव के फर्जी और जाली प्रमाण पत्रों के दम पर इन पसंदीदा कंपनियों को टेंडर के वर्क ऑर्डर बांटे गए थे।

कहां, कितना हुआ फर्जी पेमेंट:-

डिवीजन का नाम फर्जी भुगतान की राशि

महुआ 14.50 करोड़
जमवारामगढ़ 8.50 करोड़
बहरोड़ 8.00 करोड़
पावटा 6.50 करोड़
सीकरी 4.50 करोड़
नीमकाथाना 4.29 करोड़
जयपुर ग्रामीण द्वितीय 3.00 करोड़
अलवर ग्रामीण द्वितीय 1.82 करोड़

Expose Now का सवाल: जब घोटाले के सारे सबूत और डिवीजनवार आंकड़े साफ हैं, तो आख़िर वो कौन से ‘रसूखदार’ हाथ हैं जो इन 53 भ्रष्ट चेहरों को बचाने के लिए फाइलें दबाए बैठे हैं? क्या प्रमुख सचिव के कड़े आदेश के बाद इन ‘फाइल चोरों’ पर एफआईआर दर्ज होगी? हमारी नज़र इस मामले की हर एक फाइल पर बनी रहेगी।

स्पेशल रिपोर्ट, Expose Now


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