EXPOSE NOW SPECIAL INVESTIGATION: हाईकोर्ट ने ACB को 5 साल के टेंडरों की जांच के दिए थे आदेश, लेकिन रसूखदारों को बचाने में जुटा है पूरा सिस्टम, हजारों करोड़ के टेंडरों से जुड़ा है मामला, अब तक जांच अधूरी!

-हाईकोर्ट की सख्त फटकार के बाद भी एसीबी की जांच ठंडे बस्ते में, रसूखदारों को बचाने के लिए रची जा रही साजिश

-विभागीय जांच में रंगे हाथों पकड़े गए थे अफसर, पर FIR की जगह थमा दिया गया महज कागजी नोटिस

-जनता के खून-पसीने की कमाई पर निजी कंपनियों की मौज, आईटी विभाग में अलमारी से मिले सोने-नकदी के बाद भी नहीं थमी टेंडरों की लूट

जयपुर। प्रदेश के सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग (DoIT&C) और राजकॉम्प (RISL) में सरकारी खजाने की खुली लूट और टेंडरों में फर्जीवाड़े का एक ऐसा महाघोटाला सामने आया है, जहां हजारों करोड़ रुपये के सरकारी प्रोजेक्ट्स पर रसूखदारों ने कुंडली मार रखी है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को पिछले 5 वर्षों में जारी और स्वीकृत किए गए सभी टेंडरों की गहराई से जांच करने के सख्त निर्देश दिए गए थे, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद यह जांच कछुआ चाल से भी धीमी गति से चल रही है और जमीन पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। ‘Expose Now’ की विस्तृत पड़ताल में सामने आया है कि पूरे प्रशासनिक अमले और जांच तंत्र ने मिलकर अदालत के आदेशों की धार को कुंद कर दिया है, ताकि विभाग में बैठे आला अफसरों और उनके चहेते कॉरपोरेट सिंडिकेट पर आंच न आ सके।

उच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी, “कानून से ऊपर कोई नहीं, 5 साल के सभी टेंडरों की हो जांच”:-

जब प्रशासनिक तंत्र ने आंखें मूंद लीं, तो मामला न्याय के दरवाजे तक पहुंचा। राजस्थान उच्च न्यायालय ने आपराधिक रिवीजन याचिका (संख्या 1224/2024) की सुनवाई के दौरान विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया। माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान ऐतिहासिक जैन हवाला केस का हवाला देते हुए दो टूक कहा:-

Rajasthan High Court

“Be You Ever So High, the law is always above you” (आप चाहे कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हों, कानून हमेशा आपसे ऊपर है)। कोर्ट ने नोबेल पुरस्कार विजेता रिगोबर्टा मेन्चू के कथन को उद्धृत करते हुए दर्ज किया कि बिना मजबूत निगरानी तंत्र के भ्रष्टाचार का साम्राज्य खड़ा होता है और भ्रष्टाचारियों को मिलने वाली खुली छूट जब तक खत्म नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार विरोधी सारे प्रयास व्यर्थ हैं। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीतिक व प्रशासनिक प्रभाव के चलते भ्रष्ट लोग बच निकलते हैं, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में आम जनता का भरोसा टूट रहा है।

अदालत की इस तल्खी के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के शीर्ष नेतृत्व को अदालत में पेश होना पड़ा। अदालत के निर्देश और सहमति के बाद एसीबी को सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा पिछले 5 वर्षों में जारी किए गए और दिए गए समस्त टेंडरों की गहन जांच करने का आदेश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि टेंडर प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार की पुष्टि होती है, तो एसीबी तुरंत एफआईआर दर्ज करे और किसी भी रसूखदार को बचाने की कोशिश को अदालत सीधे तौर पर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का कृत्य मानेगी।

जांच कमेटी की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार का कच्चा-चिट्ठा, निजी कंपनियों का जाल, चहेतों को रेवड़ी:-

विभागीय स्तर पर गठित उच्चस्तरीय जांच समिति (जिसमें वित्त निदेशक, तकनीकी निदेशक और मुख्य लेखाधिकारी शामिल थे) ने जब राजकॉम्प और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के भीतर चल रहे गोरखधंधे की पड़ताल की, तो भ्रष्टाचार के चौंकाने वाले सबूत सामने आए। जांच रिपोर्ट से यह तथ्य पुख्ता हुआ कि विभाग में आधार प्रमाणीकरण और तकनीकी सहायता से जुड़ी अहम परियोजनाओं की कमान संभाल रहे सिस्टम एनालिस्ट (संयुक्त निदेशक स्तर) के अधिकारी रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी का खुला दुरुपयोग किया।

समिति की विस्तृत जांच में उजागर हुआ कि अधिकारी के प्रभाव में वर्ष 2017 में ‘कोरऑप्स टेक्नोलॉजीज एलएलपी’ (Coreops Technologies LLP) नामक एक निजी फर्म बनाई गई, जिसमें शुरुआत में अधिकारी की पत्नी मंजू रानी और उनके भांजे सुनील कुमार जांगिड़ को पार्टनर बनाया गया। इस फर्म का पता भी अधिकारी द्वारा अपने अचल संपत्ति विवरण (IPR) में दर्ज पते से मेल खाता था। कंपनी की वेबसाइट पर उन्हीं संवेदनशील तकनीकी सेवाओं—जैसे कि आधार-आधारित उपस्थिति प्रणाली, डेटा वॉल्ट, ई-साइन और हार्डवेयर सिक्योरिटी मॉड्यूल (HSM)—को बेचा जा रहा था, जिनकी जिम्मेदारी सरकार में उक्त अधिकारी के पास थी।

यही नहीं, जुलाई 2021 में पत्नी की जगह प्रिया तांबी को इस निजी फर्म में नया पार्टनर बनाया गया, जो खुद ‘स्पीड ई-सॉल्यूशंस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ की डायरेक्टर थीं। इसके तुरंत बाद स्पीड ई-सॉल्यूशंस कंपनी को तकनीकी अनुभव न होने के बावजूद निविदा की शर्तों में तोड़-मरोड़ कर राजकॉम्प से करोड़ों का कार्यादेश थमा दिया गया। साथ ही, एक अन्य कंपनी मैसर्स अतिशय लिमिटेड को भी यूआईडी प्रोजेक्ट के तहत काम दिया गया, जबकि कोरऑप्स एलएलपी की बैलेंस शीट में अतिशय लिमिटेड से 4,10,000 रुपये का ऋण/लेन-देन साफ तौर पर दर्ज था। जांच समिति ने 22 जुलाई 2024 को दी गई अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) अधिनियम और नियमों के तहत यह सीधे-सीधे ‘निजी स्वार्थ’ और ‘पद का दुरुपयोग’ का गंभीर अपराध है, जिसे अधिकारी ने जानबूझकर छिपाया। मगर इतने गंभीर खुलासों और साक्ष्यों के बाद भी सक्षम अधिकारियों ने FIR दर्ज कराने के बजाय मामले को सीसीए नियम-16 के कागजी नोटिसों में उलझाकर दबाने का प्रयास किया।

जांच समितियों के ‘क्लीन चिट’ उद्योग पर भी गंभीर सवाल:-

सिस्टम की मिलीभगत का आलम यह है कि विभाग के भीतर जब भी किसी बड़े घोटाले की शिकायत पहुंचती है, तो अंदरूनी कमेटियां बनाकर मामलों को रफा-दफा करने का खेल शुरू हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, विभाग की अन्य संयुक्त निदेशक स्तर की अधिकारी मोनिका चौधरी के खिलाफ ‘राजकिसान साथी’ परियोजना में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत दर्ज हुई थी। लेकिन विभाग ने आनन-फानन में आंतरिक जांच कमेटी बैठाकर अधिकारी को दोषमुक्त करार दे दिया और फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसी तरह, करोड़ों के भामाशाह डिजिटल पेमेंट किट घोटाले में एसीबी में परिवाद (संख्या 281/2019) दर्ज होने के बावजूद विभागीय समिति ने ‘कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं’ की आड़ लेकर क्लीन चिट का रास्ता तैयार कर दिया। भ्रष्टाचार की शिकायतों को दबाने और अपने ही महकमे के चहेते अफसरों को बचाने के लिए बनाई जाने वाली ये विभागीय जांच समितियां आज खुद सवालों के घेरे में हैं।

ACB Rajasthan

हजारों करोड़ के टेंडर, पर जांच के नाम पर सिर्फ चुप्पी:-

हाईकोर्ट के इस दो-टूक आदेश के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि हजारों करोड़ रुपये के टेंडरों की यह जांच आज भी फाइलों के मकड़जाल में उलझी हुई है। जब अदालत ने ACB को पिछले 5 सालों के टेंडरों की व्यापक जांच के निर्देश दिए थे, तो अब तक किन-किन कंपनियों और अफसरों पर शिकंजा कसा गया? जब विभागीय समिति अपनी जांच में निजी फर्मों के जरिए टेंडरों की बंदरबांट और ‘पद के दुरुपयोग’ की पुष्टि कर चुकी है, तो फिर मुख्य आरोपियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने में देरी क्यों की जा रही है? ‘Expose Now’ सीधे तौर पर यह सवाल उठाता है कि क्या जांच एजेंसियों पर सत्ता और नौकरशाही के रसूखदारों का कोई गुप्त दबाव है? क्या सरकारी खजाने को लूटने वाले सफेदपोशों के सिंडिकेट को बचाने के लिए समय खरीदा जा रहा है? जब तक हाईकोर्ट के आदेश की भावना के अनुरूप इस पूरे प्रकरण में दोषियों पर सख्त आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होते, तब तक यह साफ है कि पूरा ‘सिस्टम’ भ्रष्टाचारियों की ‘ढाल’ बना हुआ है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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