Expose Now एक्सक्लूसिव: राजस्थान के सरकारी खजाने का महा-ऑडिट, कमाई के दावे ध्वस्त, कर्ज का ब्याज चुकाने में हांफ रही सरकार, विकास योजनाओं के हाथ खाली

-टैक्स वसूली का बड़ा गैप, अनुमानों से हजारों करोड़ पीछे छूटा जीएसटी और वैट, बजट के गणित पर उठे सवाल

-कर्ज और पेंशन का चक्रव्यूह, विकास से ज्यादा भारी पड़ा ब्याज का बोझ, 38 हजार करोड़ से ज्यादा सिर्फ सूद चुकाने में स्वाहा

-इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कैंची, निर्माण और पूंजीगत विकास के बड़े बजट केवल कागजों में सिमटे, धरातल पर खर्च सुस्त

-शिक्षा-स्वास्थ्य का हिसाब, सामाजिक सुरक्षा और वेलफेयर पर अरबों का आवंटन, लेकिन योजनाओं में वास्तविक असर कितना?

जयपुर। वित्तीय आंकड़ों के आधिकारिक विश्लेषण से सरकारी खजाने की जमीनी हकीकत सामने आ गई है। राजस्व वसूली में तय किए गए दावों और जमीनी हकीकत के बीच हजारों करोड़ रुपये की भारी खाई देखने को मिली है। वहीं दूसरी ओर, विकास और बुनियादी ढांचे पर पूंजीगत खर्च के मुकाबले कर्ज का ब्याज और पेंशन का बोझ राजकोष को लगातार जकड़ता जा रहा है।

  1. कमाई के बड़े दावों की खुली पोल: न मिला टैक्स का अनुमानित पैसा, न आई केंद्र की पूरी मदद:-

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राजस्व वसूली के बड़े लक्ष्यों के मुकाबले वास्तविक प्राप्तियों में भारी अंतर दर्ज किया गया:

-स्टेट जीएसटी (SGST) में बड़ा झटका: सरकार ने बजट में राज्य वस्तु एवं सेवा कर से 55,800 करोड़ (55,80,000 लाख रुपये) की वसूली का अनुमान लगाया था, जिसे संशोधित कर 52,100 करोड़ किया गया, लेकिन वास्तविक वसूली सिर्फ 42,518.23 करोड़ (42,51,823.81 लाख रुपये) पर सिमट गई। यानी बजट अनुमान से करीब 13,281 करोड़ कम प्राप्त हुए।

-बिक्री कर (VAT/Sales Tax): 29,000 करोड़ के अनुमान के मुकाबले खजाने में सिर्फ 23,369.11 करोड़ ही जमा हो सके।

-आबकारी (State Excise): शराब और उत्पाद शुल्क से 17,100 करोड़ जुटाने का लक्ष्य था, जिसके मुकाबले कुल 15,103.78 करोड़ की ही वसूली हुई।

-स्टाम्प एवं पंजीयन: 11,000 करोड़ के अनुमान के मुकाबले 10,541.88 करोड़ की वसूली हुई।

-वाहन कर: 8,100 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 7,573.90 करोड़ मिले।

-केंद्रीय सहायता अनुदान में बड़ी कमी: केंद्र सरकार से सहायता अनुदान (Grant-in-aid) के रूप में 36,683.95 करोड़ (संशोधित अनुमान 37,675 करोड़) मिलने का अनुमान था, लेकिन वास्तविक रूप से केवल 22,889.78 करोड़ ही प्राप्त हुए।

-प्राकृतिक संसाधन (खनन व पेट्रोलियम): खनन उद्योग से 9,500 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 9,228.39 करोड़ और पेट्रोलियम राजस्व में 4,000 करोड़ के अनुमान के मुकाबले केवल 2,688.90 करोड़ की वसूली हो सकी।

  1. ब्याज और पेंशन का चक्रव्यूह, विकास से ज्यादा पुराना कर्ज और रिटायरमेंट देनदारी चुकाने पर बहा पैसा:-

खजाने से होने वाले खर्चों का विश्लेषण बताता है कि राजस्व का बड़ा हिस्सा विकास योजनाओं के बजाय पूर्ववर्ती देनदारियों, ब्याज और वेतन-पेंशन को संभालने में जा रहा है:

-ब्याज अदायगी का भारी बोझ: केवल लिए गए कर्जों का ब्याज चुकाने में 38,344.64 करोड़ (38,34,464.14 लाख रुपये) खर्च हो गए। 2025-26 के लिए यह भार बढ़कर 42,960.67 करोड़ तक पहुंचने का संशोधित अनुमान है।

-पेंशन और सेवानिवृत्ति पर खर्च: पेंशन और सेवानिवृत्ति हितलाभों पर वास्तविक खर्च 29,317.77 करोड़ रहा, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान में बढ़कर 35,174.01 करोड़ हो गया।

-ऋण परिहार (Debt Redemption): वर्ष 2024-25 में ऋण परिहार के लिए 1,834.51 करोड़ का वास्तविक विनियोजन किया गया।

  1. प्रमुख जन-कल्याण और प्रशासनिक विभागों पर खर्च का हिसाब-किताब:-

वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान विभिन्न जनोपयोगी एवं प्रशासनिक मदों पर वास्तविक व्यय इस प्रकार रहा:

-सामान्य शिक्षा: शिक्षा विभाग पर सर्वाधिक 53,030.54 करोड़ (53,03,054.11 लाख रुपये) का वास्तविक राजस्व व्यय हुआ। वहीं, शिक्षा व खेलकूद के पूंजीगत निर्माण पर 1,135.78 करोड़ खर्च किए गए।

-ऊर्जा (बिजली): बिजली क्षेत्र में राजस्व व्यय के तहत 32,571.65 करोड़ खर्च हुए, जबकि बिजली परियोजनाओं के पूंजीगत मद में सिर्फ 170 करोड़ का वास्तविक खर्च दर्ज हुआ।

-चिकित्सा एवं लोक स्वास्थ्य: चिकित्सा सेवाओं पर 17,852 करोड़ का राजस्व व्यय और अस्पतालों व स्वास्थ्य ढांचे के पूंजीगत निर्माण पर 3,242.90 करोड़ खर्च हुए। परिवार कल्याण मद में 4,583.10 करोड़ खर्च किए गए।

-सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण: सामाजिक पेंशन व सहायता मदों में 14,987.88 करोड़ खर्च हुए।

-गृह एवं पुलिस प्रशासन: पुलिस बल के संचालन पर 9,072.80 करोड़ और पुलिस के पूंजीगत विकास (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर मात्र 94.76 करोड़ खर्च किए गए।

-न्याय एवं जिला प्रशासन: न्याय प्रशासन पर 2,187.93 करोड़ और जिला प्रशासन पर 809.68 करोड़ का व्यय हुआ।

  1. बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और ग्रामीण विकास की हकीकत:-

राजकोषीय दस्तावेजों के अनुसार स्थायी संपत्तियों और निर्माण कार्यों पर हुए व्यय का विवरण:

-सड़कें एवं पुल: सड़कों और पुलों के पूंजीगत परिव्यय (सड़क निर्माण/अपग्रेडेशन) के तहत 9,621.18 करोड़ (9,62,118.29 लाख रुपये) का वास्तविक खर्च हुआ। सड़क परिवहन मद में 3,221.39 करोड़ व्यय हुए।

-पेयजल व स्वच्छता: जल आपूर्ति और स्वच्छता के नियमित संचालन पर 5,376.31 करोड़ और नई पाइपलाइन/परियोजनाओं के पूंजीगत परिव्यय पर 5,154.24 करोड़ खर्च किए गए।

-सिंचाई परियोजनाएं: मुख्य सिंचाई के संचालन पर 2,446.33 करोड़ तथा मुख्य सिंचाई परियोजनाओं के पूंजीगत निर्माण पर 4,067.18 करोड़ खर्च हुए। लघु सिंचाई परियोजनाओं पर 1,131.15 करोड़ खर्च किए गए।

-ग्रामीण विकास व रोजगार: ग्रामीण रोजगार मद में 2,609.87 करोड़ तथा अन्य ग्राम विकास कार्यक्रमों पर 10,032.75 करोड़ का राजस्व व्यय हुआ। ग्राम विकास के पूंजीगत कार्यों पर 1,000.03 करोड़ खर्च दर्ज किए गए।

-शहरी विकास: शहरों के विकास कार्यों के राजस्व मद में 7,632.81 करोड़ और पूंजीगत निर्माण में 2,229.58 करोड़ का वास्तविक उपयोग हुआ।

सरकारी दस्तावेजों से साफ है कि राजकोषीय गणित की यह तस्वीर केवल आंकड़ों का उलटफेर नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के भटकने का स्पष्ट प्रमाण है। जब खजाने का एक बड़ा हिस्सा विकास और बुनियादी ढांचे के बजाय केवल पुराने कर्जों का ब्याज और देनदारियां चुकाने में ही स्वाहा हो रहा हो, तो राज्य के दीर्घकालिक विकास पर सवाल उठना स्वाभाविक है। टैक्स वसूली के धराशायी होते लक्ष्यों और केंद्र से मिलने वाली सहायता में हजारों करोड़ की कटौती के बीच बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में भी विकास केवल कागजों तक सीमित रहेगा या फिर वित्तीय अनुशासन की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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