-सरकारी फाइलों से खुला महाघोटाला—आंखों देखी ‘जादूगरी’ से जारी हुए लाखों फिटनेस प्रमाण-पत्र, न ब्रेक जांचे, न लाइट और न ही धुआं
-24 महीनों में लाखों ‘कागजी प्रमाणपत्रों’ की रेवड़ी, 59 दफ्तरों का कच्चा-चिट्ठा और हाईकोर्ट के डंडे से लगी ब्रेक
-सड़कों पर खून के छींटे और कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों की चुप्पी—आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन?
जयपुर। राजस्थान की सड़कों पर हर दिन लाखों व्यावसायिक और भारी वाहन बेधड़क दौड़ते हैं। बसें, ट्रेलर्स, डंपर, स्कूल वैन, खतरनाक रसायनों से लदे टैंकर और ओवरलोडेड ट्रक। जब ये सड़कों पर निकलते हैं, तो आम नागरिक यह मानकर चलता है कि सरकार के जिम्मेदार महकमे—परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग—ने इन गाड़ियों की तकनीक, इनके ब्रेक की क्षमता, स्टेयरिंग का संतुलन, हेडलाइट का फोकस और प्रदूषण स्तर की बारीकी से जांच की होगी। लेकिन ‘Expose Now’ के हाथ लगे आधिकारिक एवं पुख्ता प्रशासनिक दस्तावेजों ने पूरे परिवहन तंत्र के सबसे काले, गैर-जिम्मेदाराना और जानलेवा सच का पर्दाफाश कर दिया है। सरकारी पत्रावलियों और परिवहन विभाग के संयुक्त शासन सचिव स्तर से जारी अधिकृत दस्तावेजों में विभाग ने खुद यह चौंकाने वाला सच स्वीकार किया है कि प्रदेश के प्रादेशिक (RTO) और जिला परिवहन कार्यालयों (DTO) में वाहनों की वैज्ञानिक और तकनीकी फिटनेस जांच के लिए जरूरी उपकरण—जैसे रोलर ब्रेक टेस्टर, हेडलाइट टेस्टर, एक्सल वेट मशीन, सस्पेंशन टेस्टर और हाई-टेक एमिशन एनालाइजर—मौजूद ही नहीं हैं!
दस्तावेजों में स्वीकार किया गया है कि फिटनेस का पूरा काम बिना किसी वैज्ञानिक और आधुनिक मशीनरी के, सिर्फ और सिर्फ मोटर वाहन निरीक्षकों (RI) और उप-निरीक्षकों द्वारा “मैनुअल आधार पर केवल भौतिक निरीक्षण” (भौतिक तौर पर आंख से देखकर) की खानापूर्ति करके निपटाया जा रहा था।
सोचिए, 40 टन वजनी भारी ट्रेलर, 60 सवारियों से भरी बस या बच्चों को ले जाने वाली स्कूल बस के ब्रेक सही काम कर रहे हैं या नहीं, उसका एक्सल लोड सहने लायक है या नहीं, उसकी हेडलाइट रात में सामने से आ रही गाड़ी को अंधा तो नहीं कर देगी—यह सब किसी आधुनिक सेंसर या मशीन से नहीं, बल्कि अफसरों की ‘सरसरी नजर’ और दस्तखत से तय किया जाता रहा। सड़कों पर चलने वाले वाहनों को बिना किसी पुख्ता तकनीकी जांच के केवल कागजी प्रमाण-पत्र जारी किए जाते रहे। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सड़कों पर बेगुनाह राहगीरों की जिंदगी को दांव पर लगाने वाला खुला सरकारी अपराध है।
59 परिवहन दफ्तरों का कच्चा-चिट्ठा—24 महीनों में लाखों वाहनों को बांटी गई कागजी फिटनेस की रेवड़ियां:-
विभाग के गोपनीय परिशिष्ट और आधिकारिक आंकड़ों का गहन विश्लेषण बताता है कि पूरे राज्य के 59 RTO, DTO और सब-सेंटरों में पिछले दो वित्तीय वर्षों (FY 2024-25 एवं 2025-26) के दौरान लाखों वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट बिना वैज्ञानिक जांच के जारी किए गए।
Expose Now द्वारा जुटाए गए आधिकारिक आंकड़ों के प्रमुख बिंदु:
-हर महीने 20 हजार से 37 हजार फिटनेस सर्टिफिकेट जारी:
सरकारी रिकॉर्ड्स के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में जहां हर महीने औसतन 6,000 से 12,000 फिटनेस प्रमाण-पत्र बांटे जा रहे थे (उदा. अप्रैल 2024 में 7,736; मार्च 2025 में 12,524), वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 की शुरुआत होते ही यह संख्या एकाएक आसमान छूने लगी।
-अप्रैल 2025 में 24,309 फिटनेस सर्टिफिकेट जारी हुए।
-मई 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 32,764 पहुंच गया।
-जून 2025 में 34,131 गाड़ियों को ‘फिट’ घोषित कर दिया गया।
-जुलाई 2025 में 37,771 और आगे के महीनों में लगातार 35 हजार से अधिक वाहनों को आंख मूंदकर कागजी क्लीन चिट दी गई।
प्रमुख जिलों में अंधाधुंध रेवड़ी की तरह बांटे गए सर्टिफिकेट:-
दस्तावेज बताते हैं कि जिन दफ्तरों में सबसे ज्यादा व्यावसायिक वाहन आते हैं, वहां बिना आधुनिक उपकरणों के मशीनी गति से सर्टिफिकेट बांटे गए:
-जयपुर (फर्स्ट व सेकंड RTO तथा जगतपुरा ARTO): अकेले जयपुर के केंद्रों पर हर महीने 1,000 से 3,000 से अधिक वाहनों को पास किया जाता रहा।
-जोधपुर RTO: यहां मई 2025 में 2,497, जून 2025 में 2,656, जुलाई 2025 में 2,815 और सितंबर 2025 में 3,028 वाहनों को फिटनेस जारी की गई।
-उदयपुर RTO: मई 2025 से अक्टूबर 2025 तक हर महीने 1,800 से 2,226 वाहनों को बिना आधुनिक ऑटोमेशन के फिटनेस बांटी गई।
-अलवर, भीलवाड़ा, बीकानेर, कोटा और अजमेर: इन औद्योगिक और खनन बहुल जिलों में भारी डंपरों और ट्रकों को प्रतिमाह 1,000 से 2,000 से अधिक फिटनेस प्रमाण-पत्र दिए जाते रहे।
हाईकोर्ट की फटकार के बाद लगा ब्रेक:-
परिवहन विभाग की यह खुली मनमानी तब तक चलती रही जब तक कि न्यायपालिका ने इस पर सख्त संज्ञान नहीं लिया। आधिकारिक दस्तावेज साफ स्वीकार करते हैं कि माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर द्वारा डीबी एसएडब्लू (DB SAW 1560/2026) में दिनांक 07.01.2026 को सख्त आदेश पारित किया गया, जिसके बाद परिवहन कार्यालयों में वाहनों के फिटनेस नवीनीकरण का यह मैनुअल कार्य बंद करना पड़ा। सवाल उठता है कि जिस सिस्टम को खुद जनता की सुरक्षा का पहरेदार होना चाहिए था, उसने हाईकोर्ट की फटकार और रोक से पहले खुद अपनी मर्जी से यह जानलेवा खेल क्यों नहीं रोका?
विभाग का सफेद झूठ—’कोई शिकायत नहीं मिली’:-
दस्तावेजों में जब यह सवाल दर्ज हुआ कि क्या परिवहन कार्यालयों में फर्जी या बिना जांच के फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी करने की शिकायतें मिली हैं, तो विभाग ने बड़ी बेशर्मी से एक लाइन में जवाब लिख दिया—“परिवहन कार्यालयों में फर्जी तरीके से फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी किये जाने की कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।” जब विभाग खुद मान रहा है कि उसके पास ब्रेक, लाइट और एक्सल जांचने की बुनियादी मशीनें ही नहीं थीं, तो फिर जारी किए गए लाखों प्रमाण-पत्र फर्जीवाड़े और आंखों में धूल झोंकने के सिवा और क्या थे? शिकायत का इंतजार कौन कर रहा था, जब व्यवस्था खुद कानून का उल्लंघन कर रही थी?
सड़कों पर खून के छींटे और कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों की चुप्पी—आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन:-
हर साल देश और प्रदेश की सड़कों पर होने वाले भीषण सड़क हादसों में हजारों लोग अपनी जान गंवाते हैं। पुलिस और प्रशासन की रिपोर्टों में अकसर दर्ज होता है—‘ब्रेक फेल होने से हुआ हादसा’, ‘असंतुलित होकर पलटा ट्रेलर’, ‘रात के अंधेरे में खराब हेडलाइट के चलते आमने-सामने की भिड़ंत’। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि जिस वाहन का ब्रेक सरेराह फेल हुआ, उसे आरटीओ दफ्तर के किस अफसर ने कुर्सी पर बैठकर ‘फिट’ होने का तमगा दिया था?
‘Expose Now’ के पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करने वाले सीधे और तीखे सवाल :-
-सवाल 1: जब केंद्रीय मोटर वाहन नियमों (CMVR) और आधुनिक मानकों में स्पष्ट है कि ब्रेक, सस्पेंशन और स्टीयरिंग की जांच वैज्ञानिक मशीनों पर होनी चाहिए, तो राजस्थान का परिवहन विभाग इतने वर्षों तक केवल ‘भौतिक निरीक्षण’ के नाम पर जनता को गुमराह क्यों करता रहा?
-सवाल 2: क्या किसी मोटर वाहन निरीक्षक की आंखों में एक्स-रे या कम्प्यूटर लगा है जो वह 20 टन वजनी ट्रक को केवल बाहर से देखकर यह बता दे कि उसके ब्रेक लाइनर घिस चुके हैं या सही हैं?
-सवाल 3: विभाग दस्तावेजों में दावा करता है कि उसने 02.07.2025 को कार्यालय आदेश 5/2025 जारी कर ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (ATS) की स्थापना और संचालन के दिशा-निर्देश तय किए। सवाल यह है कि दशकों से जब लाखों वाहन सड़कों पर दौड़ रहे थे, तब तक यह आधुनिक टेस्टिंग स्टेशन क्यों नहीं बने? क्या सरकार हादसों और मौतों का इंतजार कर रही थी?
-सवाल 4: जिन लाखों अनफिट, खटारा और तकनीकी रूप से खतरनाक वाहनों को विभाग के दफ्तरों ने धड़ल्ले से फिटनेस प्रमाण-पत्र बांट दिए, क्या उनकी वजह से सड़कों पर हुए हादसों और अनाथ हुए परिवारों की जिम्मेदारी परिवहन विभाग के उच्चाधिकारी लेंगे?
-सवाल 5: अगर 7 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट का आदेश नहीं आता, तो क्या यह जानलेवा कागजी खेल आज भी बदस्तूर जारी नहीं रहता?
कागजी फिटनेस पर दौड़ते ‘चलता-फिरता टाइम बम’:-
सड़कों पर होने वाले हादसों को अक्सर ‘चालक की लापरवाही’ या ‘किस्मत का खेल’ बताकर पुलिस केस की फाइल बंद कर दी जाती है। लेकिन एक्सपोज नाउ के इस खुलासे ने साबित कर दिया है कि असल लापरवाही सड़कों पर नहीं, बल्कि परिवहन विभाग के उन कमरों में हुई है जहां बिना जांचे-परखे गाड़ियों को सड़कों पर दौड़ने का कानूनी लाइसेंस थमा दिया गया। यह केवल प्रशासनिक सुस्ती या कागजी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि लाखों मानव जीवन के साथ किया गया अक्षम्य अपराध है। जिन खटारा, बिना ब्रेक और असंतुलित गाड़ियों को अफसरों ने अपनी कलम की एक नोक से ‘फिट’ घोषित कर दिया, वे गाड़ियां सड़कों पर चलते-फिरते ‘टाइम बम’ की तरह घूम रही हैं। ऐसे में जब तक बिना मशीनों के फिटनेस बांटने वाले जिम्मेदार चेहरों की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक सड़कों पर दौड़ता हर दूसरा भारी वाहन आम जनता के लिए किसी ‘चलता-फिरता टाइम बम’ से कम नहीं है।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now