आज यदि शिक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है, निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर है, फीस लूट का माध्यम बन चुकी है, विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है, शिक्षा माफिया खुलेआम कानूनों को चुनौती दे रहे हैं और अभिभावकों का आत्मविश्वास लगातार टूट रहा है, तो इसके लिए केवल सरकार, प्रशासन या निजी स्कूल ही जिम्मेदार नहीं हैं। एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इस पूरे संकट के सबसे बड़े और प्रथम जिम्मेदार स्वयं अभिभावक हैं।
यह सुनने में कठोर लग सकता है, लेकिन वास्तविकता यही है कि जब अन्याय को देखकर भी कोई व्यक्ति चुप रहता है, गलत को गलत कहने का साहस नहीं करता, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करता है, तब वह केवल पीड़ित नहीं रहता बल्कि उस अन्याय का सहभागी भी बन जाता है। आज अभिभावकों की मूर्खता, लालच, अहंकार, आपसी मतभेद, वैचारिक कट्टरता, जाति-धर्म के भेदभाव, अमीरी-गरीबी के विभाजन और व्यक्तिगत स्वार्थों ने शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिस एकता की आवश्यकता बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए थी, वहां अभिभावक छोटे-छोटे समूहों, व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक दिखावे में बंट गए।
जब किसी स्कूल द्वारा अवैध फीस वसूली जाती है, तब कुछ अभिभावक विरोध करने वालों को ही गलत साबित करने लगते हैं। जब किसी विद्यार्थी के साथ अन्याय होता है, तब अधिकांश लोग यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि “हमारे बच्चे के साथ तो नहीं हुआ”। जब कोई परिवार स्कूल की मनमानी से परेशान होकर संघर्ष करता है, तब दूसरे अभिभावक तमाशबीन बने रहते हैं। यही मौन समर्थन शिक्षा माफियाओं की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।
आज स्थिति यह है कि शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा हो गया है। नियम-कानूनों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। विद्यार्थियों पर अनावश्यक बोझ डाला जा रहा है। मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। स्कूल परिवहन, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े हैं। लेकिन इन सबके बावजूद यदि अभिभावक संगठित नहीं होंगे तो कोई भी व्यवस्था उन्हें न्याय नहीं दिला सकती।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कई अभिभावक स्वयं अपने बच्चों के भविष्य से अधिक अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावे और व्यक्तिगत हितों को महत्व देने लगे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जिस व्यवस्था के अन्याय पर आज वे चुप हैं, कल उसी अन्याय का शिकार उनका अपना परिवार भी बन सकता है।
संयुक्त अभिभावक संघ का स्पष्ट मानना है कि किसी भी विद्यार्थी की शिक्षा से जुड़ी दुर्घटना, अव्यवस्था, शोषण, मानसिक प्रताड़ना या अधिकारों के हनन के लिए केवल संस्थान या प्रशासन ही नहीं, बल्कि वह समाज और वह अभिभावक वर्ग भी नैतिक रूप से जिम्मेदार है जो सब कुछ देखकर भी मौन रहता है। अन्याय को सहना और अन्याय के खिलाफ खड़े न होना, दोनों ही समान रूप से खतरनाक हैं। आज आवश्यकता किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा के पीछे चलने की नहीं है, बल्कि बच्चों के अधिकारों के लिए एकजुट होने की है। यदि अभिभावक आज भी नहीं जागे, यदि वे जाति, धर्म, राजनीति, अमीरी-गरीबी और व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर संगठित नहीं हुए, तो आने वाले समय में शिक्षा पूरी तरह व्यापारिक तंत्र के हाथों में चली जाएगी और उसके सबसे बड़े शिकार हमारे बच्चे होंगे।
यह समय आत्ममंथन का है। यह समय दूसरों पर दोष मढ़ने का नहीं, बल्कि स्वयं से प्रश्न पूछने का है कि
- क्या हम अपने बच्चों के भविष्य के प्रति वास्तव में जिम्मेदार हैं?
- क्या हम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस रखते हैं?
- क्या हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हर बच्चे के अधिकारों के लिए खड़े हो सकते हैं?
यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर केवल आक्रोश व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है कि अन्याय करने वालों से अधिक नुकसान उन लोगों ने पहुंचाया है, जिन्होंने अन्याय होते हुए भी चुप रहना स्वीकार कर लिया।
याद रखें, जरूरत इस बात की है कि अभिभावक जागें, संगठित हों, अपने अधिकारों के प्रति सजग बनें और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए सामूहिक संघर्ष का हिस्सा बनें। क्योंकि यदि अभिभावक ही नहीं जागेंगे, तो शिक्षा माफिया कभी नहीं हारेंगे और इसकी सबसे बड़ी कीमत हमारे बच्चों को चुकानी पड़ेगी।

✍🏻 अभिषेक जैन बिट्टू
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता & मीडिया प्रभारी
संयुक्त अभिभावक संघ, जयपुर
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.
